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बाखबर: ऐसो को उदार जग मांही

एलजीबीटी समुदाय हमेशा की तरह सतरंगा दिखा। इस बार इस समुदाय के बंदे बहुत खुश दिखे। लेकिन उनसे भी अधिक खुश हमें कई अंग्रेजी एंकर दिखे। एंकरों और चर्चकों की हमदर्दी भी साथ रही।

Author July 15, 2018 3:44 AM
दिल्ली पुलिस की माने तो अबतक की जांच में किसी तांत्रिक या बाहरी शख्स का रोल नजर नहीं आया है। (फोटो-पीटीआई)

हला दृश्य माला पहनाने का था, दूसरा वक्तव्य का। पहले दृश्य में मंत्री महोदय कुछ युवकों को सादर माला पहना रहे थे, मिठाई खिला रहे थे और फिर कह रहे थे कि वे घर आए थे। जो दोषी हैं, उनको सजा मिलनी चाहिए। कानून का सम्मान करता हूं। एनडीटीवी ने दिखाया, और चैनलों ने भी दिखाया और कइयों ने चर्चा कराई कि ‘आइवीलीग’ छाप मंत्री जी को यह क्या हुआ? बहसें कहने लगीं कि जो ‘लिंचिंग के कनविक्ट’ थे, उनका सम्मान किया। ये टुकड़े-टुकड़े छाप अंग्रेजी चैनल भारतीय संस्कृति को जानते होते, तो काहे अपना फजीता करवाते? जानते ही नहीं कि जब कोई घर आता है, तो आदर सत्कार किया ही जाता है। ध्यान रहे, ‘अतिथि देवोभव’ होता है। वे देवोभव ही तो थे। सज्जनों से मिलने की यह प्रतियोगिता तो बढ़नी ही थी और वह इतना बढ़ी कि लगे हाथ भाजपा के नेता गिरिराज सिंह भी दंगों के आरोपियों से जेल जाकर मिल कर आए और व्यथित सुर में उनके दुख में दुखी होकर बोलते दिखे। ये क्या हो रहा है? कई चैनल चीखे? ये चैनल भी क्या चीज हैं? क्यों ये सब सहज मानवीय व्यवहार करने वाले नेताओं के पीछे पड़ जाते हैं? कोई किसी से क्यों नहीं मिल सकता?
एक चैनल पर एक उदारवादी चर्चक बोला कि ऐसे मिलने से ऐसे लोगों का हौसला बढ़ता है। नेता ये करेंगे तो संदेश क्या जाता है?
ये टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले ज्यादा बोलने लगे हैं सर जी! तुम कसाब, अफजल के लिए रोओ ठीक, हम मिलें तो बेठीक। टुकड़े-टुकड़े गैंग कहीं के।
कांग्रेस की प्रवक्ता प्रियंका के पीछे कुछ हिंदुत्ववादी ट्रोलिस्तानी ऐसे पड़े कि सब बहसियाने लगे। इस वहशियाए समय में ऐसी बहसें शुभ नहीं लगतीं।
इन दिनों तो हर ट्रोलिस्तानी देखते-देखते देशभक्त और रणबांकुरा बन जाता है। वाट्सऐप का ये कर दो, वो कर दो, ये कर दो वो कर दो, लेकिन बंद न करो। बंद की बात करेंगे तो कहोेगे कि फासीवाद आ रहा है। अरे, हम ठहरे जनतंत्र के पहरुए। आपातकाल तो आपने लगाया था।

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बहरहाल, एनडीटीवी ने भाजपा के आइटी सेल के दो ‘एक्स-एक्सपर्ट्स’ के दर्शन कराए। उन्होंने जो कहा वह न हमने सुना, न समझा। अधिक समझने से अकल्याण होने का खतरा है, इसलिए हम पाठकों को भी नहीं बताएंगे कि उनने क्या कहा, क्योंकि क्या पता कोई हमारे ही पीछे पड़ जाए और ट्रोल पर चढ़ा-चढ़ा के मारे।
तभी हर रोज की तरह ठीक नौ बज कर पांच मिनट पर एक गुस्सैल अंग्रेजी एंकर चीखा : राहुल जवाब दें। राहुल माफी मांगें। ऐसा वह हर रोज करता है।
एक शाम एक लाइन ‘ब्रेक’ हुई कि राहुल मुसलिम बुद्धिजीवियों से मिलने वाले हैं। एक चैनल ने तीन लाइनें दोहरार्इं : ‘राहुल मीट्स मुसलिम बुद्धिजीवी। जोया हसन जावेद अख्तर मीटिंग विद राहुल!’ न्यूज एक्स ने एकदम मौलिक लाइन दी: ‘न्यू जिन्ना आन द रेंपेज’! एक चैनल के लिए मुसलिम बुद्धिजीवी उदारवादी थे, दूसरे के लिए नए जिन्ना!
ये क्या हो गया है हमारे अंग्रेजी पढ़े-लिखे एंकरों को कि हर बात पर ‘हाइपर’ होते नजर आते हैं। राहुल का नाम आते ही सब एक ही तरह से चीखने लगते हैं। ऐसी हर खबर पर राहुल के वही ‘स्टाक शॉट’ रिपीट होते हैं, जिनमें वे अपने कई लोगों को साथ आते-जाते रहते हैं।
बुराड़ी हत्या कांड हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी चैनलों का भी टीआरपी कमाऊ कांड रहा। उससे पीछा छुड़ाया बागपत जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या ने!
और इस कहानी से भी पीछा छुड़ाया समलैंगिकों की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों ने और जिनके ‘दुख-दर्द’ को पहचाना बड़े दिनों बाद देश की सबसे बड़ी अदालत ने। चैनलों ने लाइन दी : ‘इंडिया यूनाइट’!

एलजीबीटी समुदाय हमेशा की तरह सतरंगा दिखा। इस बार इस समुदाय के बंदे बहुत खुश दिखे। लेकिन उनसे भी अधिक खुश हमें कई अंग्रेजी एंकर दिखे। एंकरों और चर्चकों की हमदर्दी भी साथ रही। एलजीबीटी वाले अपराधी समझे जाते हैं और दुखी रहते हैं। एक न्यायालय के हवाले से उत्साहित एक चैनल बोला कि कई जानवर भी एलजीबीटी छाप होते हैं, यानी मामला नैसर्गिक ही है, तब कानून में अपराध क्यों? इसका निरपराधीकरण होना चाहिए। सेक्स की बातें चैनलों पर ‘हॉट केक’ की तरह बिकती हैं।
नाम और जांच दोनों कमाए ‘सेलीब्रेटेड’ आइएएस शाह फैजल ने ट्वीट करके कि ‘पितृसत्ता जमा जनसंख्या जमा असाक्षरता जमा पोर्न जमा अलकोहल जमा तकनीक बराबर रेपिस्तान!
तौबा तौबा! क्या बक दिया कश्मीरी छोरे ने? क्या ये देश रेपिस्तान है?
जो चैनल कल तक रेप की हर खबर पर दिल्ली को ‘रेप कैपीटल’, ‘रेप कंट्री’ कहते नहीं अघाते थे वही फैजल से नाराज थे, क्यों? एक अंग्रेजी चैनल पर तो लाइन ही लगा दी गई : ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग रशेज टू सपोर्ट फैजल’! फैजल ने ऐसा क्या कह दिया, जो नहीं कहा गया था सर जी?
अंत में सरकार कृपालु हुई। कई शिक्षा संस्थाओं को ‘ऐमीनेंट’ की सनद दी, साथ ही एक ‘प्रस्ताव’ पर समिति इतनी मुग्ध हुई कि अग्रिम सनद दे डाली! निंदक लाख करें चख चख! हम तो वो हैं जो ‘मजमून भांप लेते हैं लिफाफा देख कर’! और वह गाना तो सुना ही होगा कि :‘कोरे कागज पे लिख दे सलाम बाबू! वो जान जाएंगे पहचान जाएंगे!’ऐसो को उदार जग मांही!

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