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स्मरण: वह एक फक्कड़ कवि

शायद अपने समय का वे एकमात्र ऐसे कवि थे, जिन्हें प्रबुद्ध और बौद्धिक जनों का भी भरपूर स्नेह मिला और सामान्य कविता-पाठक का प्यार भी। इस शहर के इस ‘बिगड़ैल’ मगर लाड़ले कवि का जन्म 1935 में वजीराबाद (अब गुजरात-पाकिस्तान) में हुआ था।

चंडीगढ़ के एक दिवंगत कवि एवं चिंतक इन दिनों दोस्तों और कविता दीवानों को ज्यादा याद आए।

चंडीगढ़ के एक दिवंगत कवि एवं चिंतक इन दिनों दोस्तों और कविता दीवानों को ज्यादा याद आए। सांप्रदायिक हिंसा और असहिष्णुता के वर्तमान माहौल में विकल की एक कविता को पढ़ना बेहद प्रासंगिक लगता है।यह कविता विकल ने तब लिखी थी जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था। उन्हें इस कविता पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। उन्हें जेल के सीखचों ने नहीं डराया। वे ‘सकते’ में सिर्फ तब आए जब ड्यूटी पर तैनात थानेदार ने उनकी जांच-पड़ताल के दौरान उनसे वह कविता सुनाने को कहा, जिस पर उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। ‘विकल’ ने पुलिस अधिकारी से हाथ जोड़ कर कहा, ‘आप चाहें तो मेरी भरपूर पिटाई कर लें, पर इस पुलिसिया माहौल में कविता सुनाने का हुक्म न दें।’ इस पर दो-चार गालियां देने के बाद जांच अधिकारी ने उन्हें वह कविता कागज पर लिख कर देने का आदेश दे डाला, ताकि जांच रिपोर्ट में उसे भी दर्ज किया जा सके।
पहचान यह जो सड़क पर खून बह रहा है/ इसे सूंघ कर तो देखो/ और पहचानने की कोशिश करो/ यह हिंदू का है या मुसलमान का/ किसी सिक्ख का या इसाई का, किसी बहन का या भाई का/ सड़क पर इधर उधर पड़े, पत्थरों के बीच दबे/ ‘टिफिन कैरियर’ से जो रोटी की गंध आ रही है/ यह किस जाति की है?/ क्या तुम मुझे यह सब बता सकते हो/ इन रक्त सने कपड़ों, फटे जूतों, टूटी साइकिलों/ किताबों और खिलौनों की कौम क्या है?/ क्या तुम मुझे बता सकते हो/ स्कूल से कभी न लौटने वाली बच्ची की प्रतीक्षा में खड़ी/ मां के आंसुओं का धर्म क्या है/ और अस्पताल में दाखिल/ जख्मियों की चीखों का मर्म क्या है?/ हां, मैं बता सकता हूं, यह खून उस आदमी का है/ जिसके टिफिन में बंद रोटी की गंध उस जाति की है/ जो घर और दफ्तर के बीच साइकिल चलाती है/ और जिसके सपनों की उम्र फाइलों में बीत जाती है/ ये रक्त सने कपड़े उस आदमी के हैं/
जिसके हाथ मिलों में कपड़ा बुनते हैं/ कारखानों में जूते बताते हैं, खेतों में बीज डालते हैं/ पुस्तकें लिखते, खिलौने बनाते हैं/ और शहर में अंधेरी सड़कों के लैंप पोस्ट जलाते हैं/ लैंप पोस्ट तो मैं भी जला सकता हूं, लेकिन/ स्कूल से कभी न लौटने वाली बच्ची की/ मां के आंसुओं का धर्म नहीं बता सकता/ जैसे जख्मियों के घावों पर/ मरहम तो  लगा सकता हूं/ लेकिन उनकी चीखों का मर्म नहीं बता सकता।’ सही और सामयिक मूल्यांकन होता तो शायद कुमार विकल को निराला, मुक्तिबोध व धूमिल की पंक्ति में चौथे स्थान पर रखा जाता।लगभग बीस वर्ष तक इस शहर की काव्यात्मक जिंदगी का पर्याय बने रहे कुमार विकल ने अपनी कबीराना और गालिबाना फक्कड़-मस्ती के बावजूद अपने लिए एक ऐसा मुकाम बना लिया था, जिसे न तो हाशिए पर सरकाना मुमकिन था और न ही उपेक्षा की अंधेरी गुफाओं में धकेलना।

शायद अपने समय का वे एकमात्र ऐसे कवि थे, जिन्हें प्रबुद्ध और बौद्धिक जनों का भी भरपूर स्नेह मिला और सामान्य कविता-पाठक का प्यार भी। इस शहर के इस ‘बिगड़ैल’ मगर लाड़ले कवि का जन्म 1935 में वजीराबाद (अब गुजरात-पाकिस्तान) में हुआ था। प्राइमरी तक वे रावलपिंडी में ही पढ़े। विभाजन के समय परिवार लुधियाना आ गया। यहां आर्य कॉलेज में उन्होंने इंटर तक तो पढ़ा, मगर परीक्षा नहीं दी। उसके बाद तीन वर्ष तक यायावरी की। 1956 में लाहौर बुक शॉप लुधियाना में नौकरी कर ली। 1962 में पंजाब विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग में नौकरी मिल गई। 23 फरवरी 1997 को उन्होंने इसी शहर में अंतिम सांस ली। मुझे कुमार विकल को करीब से जानने और उनके जीने के करीने को कई-कई दिन तक देखने-परखने का अवसर मिला है। हमारे परिवेश के कई लोग तमाशेबाज भी थे। मुझे कुमार में सदा एक बाल सुलभ मासूमियत के साथ-साथ गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। ऐसे तमाशाबीन दोस्तों की भी एक लंबी पंक्ति थी, जो उसे शराब की बोतलों के उपहार ला-लाकर देते थे, इस उम्मीद में वह शख्स, जम कर पीने के बाद उनकी हां में हां मिलाएगा और उन लोगों पर बरसेगा, जो दोस्तों की नजर में खलनायक थे। यानी वे लोग अपना गुस्सा, अपना क्षोभ, कुमार के माध्यम से निकालते थे। मगर कुमार किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं थे, वे एक व्यवस्था के खिलाफ थे।अपनी फकीराना और कबीराना तबीयत के बावजूद कुमार अपने समय के कई मिथक तोड़ते दिखते। उन्होंने कई बार तंत्र के खिलाफ अपना स्वर बुलंद करने के आरोप में दंड भी भुगता। कभी पंूजीवाद के खिलाफ, तो कभी आतंकवाद के खिलाफ। कभी ‘मुक्ति का दस्तावेज’ लिखते, तो कभी ‘रोटी की गंध’ और कभी ‘जनतंत्र और मैं’।उनकी कविताएं, उनके समकालीन तंत्र का संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज हैं।मुझे याद है, कॉलेज के दिनों में ‘वेटिंग फार गोदो’ के मंचन से पहले, पार्श्व से मैं कुमार विकल की एक कविता, ‘गोदो की प्रतीक्षा में’ पढ़ता था। एक बार दर्शकों की प्रथम पंक्ति में बैठे कुमार ने मेरे स्वर में अपनी वह कविता सुनी तो पार्श्व में आकर गले लगा लिया। ‘यार दिल करता है, लिखूं मैं और पढ़ो तुम। मगर तुम्हारी एक कमजोरी है। तुम दारू नहीं पीते और मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि दारू न पीने वाला कोई शख्स मेरी कविता का मंच से पाठ करे। मगर तुम्हें यह भी माफ। तुम इसी तरह पढ़ते रहो।’

एक बार देर रात सेक्टर 19 से अपनी अखबारी नौकरी के बाद जब दफ्तर से निकला तो बाहर खंभे के साथ कुमार को देखा। मैं करीब आया तो वे बोले, ‘तुम्हारे पास इसलिए नहीं आया कि मुझे शराब ला दो। वह तो काफी लोग हैं, जो ला देंगे। तुम मेरे साथ चलो। मैंने ‘टैगोर थिएटर’ की दीवार पर कोयले से एक कविता लिखी है। क्या करता मैं। मेरे पास उस वक्त न कागज था न पेन, पर कविता थी कि अटकती ही नहीं थी। अब तुम वह कविता कागज पर उतारो और मेरी जेब में ‘ठंूसो’। सुबह उसे कहीं
भेजूंगा। तुम देखना! भूचाल आ जाएगा।’ बहरहाल, कुमार के बारे में बहुत कुछ लिखने को है। इस शहर के परिवेश में यह ज्यादा जरूरी है कि उन्हें, इसी शहर का शायद सर्वाधिक लाड़ला और कार्बूजिए के बाद शायद सर्वाधिक सृजनशील और कल्पनाशील ‘चंडीगढ़िया’ माना जाए। आतंकवाद के खिलाफ उनका बयान मेरी एक संपादित कृति का हिस्सा बना था। ‘काली नदी के उस पार’ नामक उस संकलन के लिए उन्होंने वह कविता भेजी थी।

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