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शख्सियत: पंडिता रमाबाई, पितृसत्ता से थी लड़ाई

रमाबाई का बचपन का नाम रमा डोंगरे था। उनके संस्कृत ज्ञान की वजह से उनके नाम के आगे पंडिता लगा। उन्हें संस्कृत और वेदों का अच्छा ज्ञान था। पिता की मृत्यु के बाद वे अपने भाई के साथ कलकत्ता गर्इं।

रमाबाई ने बचपन से ही ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को झेला था, इसलिए उन्होंने अपने जीवन के आगे के वर्षों में इससे लड़ती रहीं।

पंडिता रमाबाई ऐसी महिला थीं, जिनके विचारों ने समाज में हलचल पैदा कर दी। जिस समय में महिलाओं को कम पढ़ाया जाता था, विधवाओं की शादी नहीं कराई जाती थी और बाल विवाह की प्रथा थी, इन कुप्रथाओं पर सवाल खड़े करने वाली पंडिता रमाबाई थीं। वे भारतीय महिलाओं के उत्थान की समर्थक थीं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सा लिया।

व्यक्तिगत जीवन
रमाबाई के पिता अनंत शास्त्री एक समाजसुधारक थे। वे लड़कियों को पढ़ाने के समर्थक थे। जब अनंत शास्त्री ने अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत पढ़ाना चाहा तब भी उन्हें समाज का विरोध सहना पड़ा। ब्राह्मणवादी समाज में रहते हुए एक महिला का संस्कृत पढ़ना पुरुषों की सत्ता पर हमला था। इस वजह से अनंत शास्त्री को उनके परिवार के साथ गांव से बाहर निकाल दिया गया। शास्त्री को जंगल में जाकर रहना पड़ा। उन्हीं हालात में रमाबाई का जन्म हुआ। 1877 में अकाल के कारण रमाबाई के पिता, माता और उनकी छोटी बहन का देहांत हो गया। अब परिवार में केवल रमाबाई और उनके भाई ही रह गए थे।

संस्कृत ने दिलाई प्रसिद्धि
रमाबाई का बचपन का नाम रमा डोंगरे था। उनके संस्कृत ज्ञान की वजह से उनके नाम के आगे पंडिता लगा। उन्हें संस्कृत और वेदों का अच्छा ज्ञान था। पिता की मृत्यु के बाद वे अपने भाई के साथ कलकत्ता गर्इं। वहां उन्हें पंडितों ने भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था। 1878 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में उन्हें पंडिता और सरस्वती की उपाधि दी गई। 1880 में भाई की मृत्यु के बाद रमाबाई ने बिपिन बिहारी मेधवी से शादी कर ली। बिपिन पेशे से वकील थे। दोनों पति-पत्नी ने बाल विधवाओं के लिए विद्यालय खोलने की योजना बनाई थी, पर 1882 में उनके पति की मृत्यु हो गई।

आर्य महिला समाज की स्थापना
पति की मृत्यु के बाद भी रमाबाई ने जिंदगी से हार नहीं मानी। पुणे आकर उन्होंने आर्य महिला समाज की स्थापना की। वे बाद में मिशनरी गतिविधियों में भी शामिल हुर्इं। उनका इसाई धर्म में विश्वास अधिक बढ़ता जा रहा था और उन्होंने ईसाई धर्म को अपना लिया। 1882 में भारत सरकार ने शिक्षा में जांच के लिए एक आयोग गठित किया था, तब रमाबाई ने उसमें सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा शिक्षिकाओं के होने की मांग की। इसके अलावा उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसी बहुत सी परेशानियां महिलाओं को होती हैं, जिनके लिए महिला डॉक्टर का होना जरूरी है। उनकी ये बातें रानी विक्टोरिया तक पहुंचीं।

पितृसत्ता से थी लड़ाई
रमाबाई ने बचपन से ही ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को झेला था, इसलिए उन्होंने अपने जीवन के आगे के वर्षों में इससे लड़ती रहीं। देश-विदेश में भ्रमण के दौरान उन्होंने ‘द हाई कास्ट हिंदू वूमेन’ किताब लिखी। इस किताब में महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर प्रकाश डाला गया था। इसमें उन्होंने हिंदू महिलाओं की समस्याएं बतार्इं। बाल-विवाह, विधवा-विवाह और हिंदू महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों के बारे में भी इस किताब में लिखा। पंडिता रमाबाई मुक्ति मिशन आज भी सक्रिय है।

सम्मान और पुरस्कार
’समुदाय सेवा के लिए 1919 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया।
’1989 में भारतीय महिलाओं के उत्थान के लिए काम करने पर भारत सरकार ने रमाबाई पर एक स्मारक टिकट जारी किया।
’मुंबई में उनके नाम से एक सड़क का नाम भी है।
निधन : रमाबाई सेप्टिक ब्रोंकाइटिस से पीड़ित थीं। 5 अप्रैल, 1922 को उनका निधन हो गया।

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