ताज़ा खबर
 

सेहत: आत्ममुग्धता बड़ी बला

मनोविज्ञान के अनुसार एनपीडी एक स्तर के बाद भयंकर रोग बन जाता है। आपकी आत्ममुग्धता कब बीमारी बन जाती है। आपको खुद ही मालूम नहीं होता।

Author Published on: May 13, 2018 4:43 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अपनी तारीफ सुनने की ललक, दूसरों की खिल्ली उड़ा कर मौज लेना, दूसरों की निजी जिंदगी में अधिक दिलचस्पी लेना, अपनी आलोचना सुन कर गुस्से से लाल हो जाना, लोगों में खामियां निकालना ताकि आप खुद को सर्वश्रेष्ठ बता सकें… अगर आप भी ऐसी ही आदतों से पीड़ित हैं तो सतर्क हो जाइए क्योंकि आप आत्ममुग्धता यानी नार्सिस्टिक पर्सनालिटी डिसआॅर्डर (एनपीडी) के शिकार हैं। मनोविज्ञान के अनुसार एनपीडी एक स्तर के बाद भयंकर रोग बन जाता है। आपकी आत्ममुग्धता कब बीमारी बन जाती है। आपको खुद ही मालूम नहीं होता।

क्या है आत्ममुग्धता
जैसे कोई पागल खुद को पागल या चोर खुद को चोर नहीं कहता वैसे ही कोई आत्ममुग्ध व्यक्ति अपनी आत्ममुग्धता समझ ही नहीं पाता। वह इसी मुगालते में रहता है कि वह सबसे श्रेष्ठ है। दरअसल, आत्ममुग्धता कोई अचानक आई बीमारी नहीं है। इसका पालन-पोषण बचपन से होता है। आत्ममुग्धता दो प्रकार की होती है, जिसमें एक अच्छी होती है तो दूसरी खराब। अच्छी और सेहतमंद आत्ममुग्धता में व्यक्ति अपनी कमियों को दूर करने के लिए खुद में आत्मविश्वास जगाता और खुद को दुलारता यानी पैंपर करता है। आत्ममुग्धता समस्या तब बन जाती है, जब व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो जाता है। दूसरों की भावनाओं की कद्र नहीं करता। अपनी सिर्फ तारीफ सुनना पसंद करता है।

सोशल मीडिया और आत्ममुग्धता
हाल ही में हुए कुछ शोध बताते हैं कि फेसबुक की लत आत्मविश्वास में कमी और आत्ममुग्धता से संबंध को दर्शाती है। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पर हजारों लाइक्स मिल जाते हैं। व्यक्ति उसी में खुश रहता है कि उसे इतने लोग पसंद करते हैं। लेकिन ऐसे में वह अपने अंदर की खूबसूरती को नजरअंदाज कर भौतिक सुंदरता की ओर बढ़ता है। और जब यह तारीफ नहीं मिलती तब वह अवसाद में चला जाता है।

ऐसे बनते हैं आप शिकार
अक्सर लोग खुद से प्रेम में इतने लीन हो जाते हैं कि दुनिया के बाकी सारे इंसान उन्हें अपने आगे अदना लगने लगते हैं। जो लोग आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं वे थोड़ी-सी आलोचना से बिखर जाते हैं। उनका आत्मविश्वास खत्म होने लगता है। वे खुद को कमतर आंकने लगते हैं। दरअसल, यह स्थिति उन लोगों में अधिक पैदा होती है, जिन्होंने बचपन से अपनी सिर्फ तारीफ सुनी होती है। आलोचना के शिकार कम ही हुए हों। जिन लोगों को अपनी तारीफ सुनने की आदत हो जाती है उनके बहुत से गुण उनके चापलूस ही मार देते हैं। और एक वक्त ऐसा आता है जब वे खुद को सबसे कमजोर मानने लगते हैं। क्योंकि प्रतिस्पर्धा में जीत नहीं पाते। और खुद की कमियां एक साथ आगे आती हैं। इसलिए ज्यादा तारीफ भी अच्छी नहीं होती।

आत्मविश्वास और स्वाभिमान में है फर्क
अक्सर आत्ममुग्धता से भरे लोग खुद को आत्मविश्वासी और स्वभिमानी मान लेते हैं। आत्मविश्वासी व्यक्ति अपनी क्षमताओं और कमियों को जानता है। उसमें हमेशा कुछ नया सीखने की चाह रहती है। वह खुद को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता। उसे मालूम होता है कि दुनिया में वह अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं है। उससे कई गुणा अच्छे और ज्ञानी लोग हैं। स्वाभिमान और आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति जमीन से जुड़े लोग होते हैं, जिन्हें अपनी महानता पर घमंड नहीं होता। आत्मविश्वास और अति आत्मविश्वास, स्वाभिमान और अभिमान, गर्व और घमंड में फर्क होता है। इस फर्क को पहचान कर ही आप आत्ममुग्धता को समझ पाएंगे।

बचाव के उपाय
जो लोग इस रोग से पीड़ित होते हैं और जब उन्हें उनके मुताबिक तारीफ, मान-सम्मान नहीं मिलता तब वे कोफ्त में जीने लगते हैं। अवसाद और तनाव उन्हें घेर लेता है। इससे बचने का सबसे बेहतर उपाय है ध्यान यानी मेडिटेशन करना। ध्यान करने से आप खुद के बारे में जान पाते हैं। अपना मूल्यांकन कर इस बीमारी से बचा जा सकता है। हमें मालूम है कि हमारी कमियां क्या हैं और अच्छाइयां क्या हैं। इसलिए समय रहते खुद का मूल्यांकन करें। खुद को रचनात्मक कामों में लगाएं। अपनी तुलना किसी से न करें। आप जैसा दुनिया में एक ही है। अपनी सफलता का जश्न मनाएं, बस उसे सिर पर न चढ़ाएं। इन उपायों को अपना कर आप खुद को आत्ममुग्धता से बचा सकते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दाना-पानी: खीरा-शिमला मिर्च-गाजर, खीरा पछड़ी और राजमा-खीरा-सब्जियां
2 शख्सियत: बलराज साहनी, अभिनय से बनी पहचान
3 अभिनय, मुद्रा और भाव का संगम
ये पढ़ा क्या?
X