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छुट्टियों का रचनात्मक उपयोग, जानें अपने बच्चे की रुचि

गरमी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं। इस दौरान करीब दो महीने बच्चे घर में कैद होकर रह जाते हैं। दिन भर टीवी देख कर या वीडियो गेम खेल कर अपनी ऊब मिटाने का प्रयास करते हैं। इसलिए इन छुट्टियों में कई संस्थाएं बच्चों के लिए रचनात्मक गतिविधियों से संबंधित कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं। जागरूक माता-पिता उनमें अपने बच्चों को भेजते हैं। इसके बावजूद जो लोग अपने बच्चों को कार्यशालाओं में नहीं भेज पाते, वे घर में ही उन्हें रचनात्मक माहौल दे सकते हैं। बच्चों का समूह बना कर भी उन्हें रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ा जा सकता है। गरमी की छुट्टियों में बच्चों को कैसे रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ें, सलाह दे रहे हैं रवि डे।

Author May 13, 2018 4:47 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

गरमी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं। करीब दो महीने बच्चे घर पर रहेंगे। स्कूल से जो होमवर्क या गतिविधि आधारित काम मिलेगा, वे उन्हें पूरा करने की कोशिश करेंगे। मगर यह ऐसा काम नहीं होगा कि वे दिन भर उसमें उलझे रहें। इसलिए या तो वे दिन भर घर में टीवी देखेंगे, इंटरनेट पर वीडियो गेम खेलेंगे या फिर दोस्तों के साथ खेलेंगे। ऐसे में जिनके माता और पिता दोनों कामकाजी हैं, उनके लिए बड़ी समस्या रहती है कि बच्चों को कैसे संभालें। कुछ माता-पिता छुट्टियों में बाहर कहीं घूमने का कार्यक्रम बनाते हैं। ज्यादातर लोग पहाड़ों पर जाते हैं। पर माता-पिता अधिक लंबी छुट्टी नहीं ले पाते। अधिक से अधिक पंद्रह दिन की छुट्टी ले पाते हैं। उसी में सैर-सपाटा हो पाता है। कुछ बच्चे गांवों में अपने दादा-दादी या नाना-नानी के पास जाकर कुछ दिन रह आते हैं। पर इससे भी काम नहीं चलता। घर में उन्हें लंबा समय अकेले या घरेलू सहायक के साथ बिताना पड़ता है। इस तरह ज्यादातर बच्चे छुट्टियों में ऊब जाते हैं। इस ऊब से बचने का सबसे उत्तम तरीका है कि बच्चों को गरमी की छुट्टियों में चलने वाली किसी कार्यशाला में भेजा जाए। वह वहां न सिर्फ नए दोस्त बनाता है, कुछ नया सीखता है, बल्कि पढ़ाई-लिखाई से संबंधित कई बातें भी सीख पाते हैं। महानगरों में गरमी की छुट्टियों में विभिन्न संस्थाएं और गैर-सरकारी संगठन रचनात्मक गतिविधियों से संबंधित कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। इनमें अभिनय करना, चित्र बनाना, गायन-वादन, खेल-कूद, विज्ञान-गणित आदि से जुड़ी गतिविधियां सिखाई जाती हैं। इन कार्यशालाओं में फीस भी अधिक नहीं देनी होती। कई सरकारी संस्थान नाममात्र की फीस लेते हैं, तो कई गैरसरकारी संगठन प्रायोजकों की मदद से गतिविधियां और कार्यशालाएं आयोजित करते हैं, जिनके लिए कई बार कोई फीस नहीं देनी पड़ती। इन कार्यशालाओं में भेजना बच्चों के रचनात्मक कौशल के विकास में सहायक तो होता ही है, वे अपने पाठ्यक्रम संबंधी बातों को भी बहुत सहजता से उन गतिविधियों से जोड़ कर सीख लेते हैं।

जानें अपने बच्चे की रुचि
बच्चा जब छोटा होता है, वह नर्सरी या प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहा होता है, तब उसकी विभिन्न क्षेत्रों में रुचि होती है। वह चित्रकारी भी कर लेता है, गा भी लेता है, अभिनय भी कर लेता है। इसलिए बहुत सारे माता-पिता को लगता है कि उन्हें अपने बच्चे को हर गतिविधि में शामिल करना चाहिए। मगर यह ठीक नहीं है। सबसे पहले जानें कि आपके बच्चे की सबसे अधिक रुचि किस क्षेत्र में है। उसी के अनुसार गतिविधियों का चुनाव करें। अगर उसकी रुचि अभिनय में है तो विभिन्न संस्थाएं नाटक की कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, उसे उनमें भेजें। जैसे अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो वहां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और दिल्ली सरकार का संस्कृति विभाग अलग-अलग क्षेत्रों में नाटक की कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। उनमें उसका पंजीकरण करा सकते हैं। इसके अलावा कई स्वयंसेवी संगठन भी ऐसी कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। इसी तरह चित्रकारी, संगीत आदि से संबंधित कार्यशालाएं चलाई जाती हैं बच्चों की रुचि के अनुसार उनका चुनाव किया जा सकता है। अगर आप चाहते हैं कि बच्चा कार्यशालाओं में जाकर पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी बातें सीखे तो उसके लिए भी कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। जैसे रचनात्मक लेखन यानी कविता, कहानी, नाटक वगैरह लिखने का प्रशिक्षण देने की कार्यशालाएं भी आयोजित की जाती हैं। इसी तरह वैदिक गणित की कक्षाएं लगती हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय बच्चों को विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित गतिविधियां कराता है। वहां बच्चे रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली या बेकार मान ली गई चीजों से वैज्ञानिक उपकरण और कई उपयोगी वस्तुएं बनाना सीखते हैं। इस तरह खेल-खेल में उनमें विज्ञान के प्रति रुचि विकसित होती है। इसलिए केवल गरमी की छुट्टियों में बच्चों को बोरियत से बचाने के मकसद से किसी भी कार्यशाला में न डालें, उनकी रुचि का ध्यान रखते हुए ही कार्यशाला का चयन करें।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

समय पर कराएं पंजीकरण
गरमी की छुट्टियों में आयोजित होने वाली सभी कार्यशालाएं स्कूलों के बंद होने के बाद ही आयोजित होती हैं। इसलिए ज्यादातर कार्यशालाओं का समय जून के महीने में होता है। पर चूंकि इन कार्यशालाओं में कुशल प्रशिक्षकों की मदद ली जाती है और कार्यशालाओं के लिए जगहें पहले से बुक करानी पड़ती हैं, इसलिए उनमें सीमित संख्या में बच्चों का पंजीकरण किया जाता है। इसके लिए पंजीकरण पहले से शुरू हो जाता है। मई मध्य से पंजीकरण शुरू हो जाता है। इसलिए अगर आप अपने बच्चे को किसी कार्यशाला में भेजना चाहते हैं तो अभी से उसमें पंजीकरण के लिए तैयारी कर लें। ज्यादातर कार्यशालाओं से संबंधित जानकारियां वेबसाइट पर उपलब्ध होती हैं। वहां से जानकारी हासिल करें और तय करें कि बच्चे को कहां भेजना उचित रहेगा। ज्यादातर कार्यशालाओं में लोग शुरुआती एक-दो दिनों में ही पंजीकरण करा लेते हैं और सीटें भर जाती हैं। इसलिए देर करने पर उनमें पंजीकरण मुश्किल हो जाता है।

घर में बनाएं रचनात्मक माहौल
कई माता-पिता अपने बच्चों को गरमी की कार्यशालाओं में नहीं भेज पाते। उसकी कई वजहें हो सकती हैं। कई बार समय पर किसी संस्था में दाखिले की प्रक्रिया न शुरू कर पाने की वजह से ऐसा होता है, तो कई बार घर और कार्यशाला स्थल के बीच दूरी अधिक होने और आने-जाने की समुचित व्यवस्था न होने की वजह से भी वे बच्चे को भेजने में संकोच करते हैं। जो माता-पिता कामकाजी हैं, उन्हें अकेले बच्चे को कार्यशाला स्थल तक भेजने में एक स्वाभाविक भय बना रहता है। हालांकि इसके लिए कुछ बच्चे मिल कर आने-जाने की कोई साझा व्यवस्था कर सकते हैं, पर ऐसा नहीं हो पाता तो कोई बात नहीं। घर में भी रचनात्मक माहौल बनाया जा सकता है। बच्चों को कुछ बनाना, नया करना हमेशा अच्छा लगता है। इसलिए उन्हें घर पर ही मिट्टी से खिलौने, बर्तन वगैरह बनाने की प्रेरणा दी जा सकती है। इसी तरह चित्रकारी करने को प्रोत्साहित किया जा सकता है। अपने बच्चे के निकटतम दोस्तों की एक मंडली बना कर उन्हें सोसाइटी की कुछ गतिविधियों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। जैसे उनसे कहा जा सकता है कि रोज वे घूम कर देखें कि कहां ठीक से सफाई नहीं हो पाई है। किसके घर के सामने कूड़ा रखा रहता है। और वे सोसाइटी में रहने वाले लोगों से निवेदन करें कि साफ-सफाई में मदद करें। इसी तरह बच्चों का एक समूह बना कर उन्हें एक दैनिक समाचार पत्र निकालने की प्रेरणा दी जा सकती है। उसमें बच्चे खुद समाचार लिखेंगे, कविता, कहानी या अपने आसपास की समस्याओं पर लेख लिखेंगे और कंप्यूटर पर उसे अखबार की तरह प्रकाशित करेंगे। उस अखबार या पत्रिका को रोज सोसाइटी की साझा जगह पर लगाया जाए, ताकि लोग उसे पढ़ें और उनकी सराहना करें। इस तरह वे टीवी देखने और वीडियो गेम खेलने में अपना समय बर्बाद करने के बजाय कुछ रचनात्मक करके नई ऊर्जा हासिल करेंगे और उनका अपने समाज से बेहतर रिश्ता कायम होगा।

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