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चिंतन: नीर की निर्मलता

हमारे यहां ही नहीं दुनिया भर में जो यह माना जाता रहा है कि तन-मन दोनों निर्मल होने चाहिए, उसके पीछे की सोच यही तो रही है कि निर्मलता ही बड़ी चीज है, वही सच्चे अर्थों में, जीवनदायिनी हो सकती है।

Author December 9, 2018 6:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

निर्मलता का सबसे अच्छा दृष्टांत निर्मल नीर ही है, पारदर्शी होने की हद तक निर्मल नीर। वैसा निर्मल नीर, जो हम ‘कोरल द्वीपों’ में देखते हैं कि ऊपर से झांकिए, तो नीचे कोरल तो दिखते ही हैं, माटी/ रेती भी दिख जाती है। ऐसा निर्मल नीर हमने बचपन में गंगा का भी देखा है; यह बात अलग है कि अब उस निर्मल नीर के लिए आंखें तरस जाती हैं, जो पूरी तरह से निर्मल हो, जलाशयों, नदियों, झीलों में। दरअसल, निर्मल नीर की यह निर्मलता, मानो स्वच्छता का भी चरम है। और लगता है कि स्वच्छता को भी निर्मलता से जोड़ना जरूरी है। मान लीजिए, एक शहर में कूड़ा-करकट न हो, पर उसकी हवा स्वच्छ और निर्मल न हो, तो वह स्वच्छता हमारे काम आने वाली नहीं है। दिल्ली को ही देखिए, इसके कुछ इलाके आपको स्वच्छ ही दिखेंगे- नई दिल्ली वाले इलाके, मसलन चाणक्यपुरी का इलाका, पर हवा पूरी तरह स्वच्छ नहीं मिलेगी। प्रदूषण के कणों समेत ही मिलेगी।

हमारे यहां ही नहीं दुनिया भर में जो यह माना जाता रहा है कि तन-मन दोनों निर्मल होने चाहिए, उसके पीछे की सोच यही तो रही है कि निर्मलता ही बड़ी चीज है, वही सच्चे अर्थों में, जीवनदायिनी हो सकती है। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जैसे मुहावरे, लोकोक्तियां आदि भी इसी सोच का परिणाम हैं। पर, दिखाई यह पड़ रहा है कि न हमने नीर और वायु को निर्मल रहने दिया है, न आकाश की छाया को। गजानन माधव मुक्तिबोध ने बहुत पहले लिखी थी एक कविता ‘इस नगरी में’ शीर्षक से, जिसकी शुरुआती पंक्तियां थीं : ‘इस नगरी में चांद नहीं है सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है/ सिर्फ धुंए के बादल दल हैं/ और धुंआते हुए पुराने हवा-महल हैं’। और इसी में आगे लिखा था : ‘लाल निगाहें/ खोले अपनी उन्नति का/ ‘मुंदा झरोखा’।

कितना स्टीक है आजकल के लिए भी यह दृश्य-चित्र : मिलावट करने वाले मिलावट कर रहे हैं। बिल्डर अपना ‘लाभ’ कमा रहे हैं। रिश्वत की आशंका से लोग पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। ‘नगरी’ का आकाश मानो ऊपर भी काला है, नीचे भी काला है। बैंकों से कर्ज लेकर भाग चुके लोग, हैं, बच्चों का ‘मिड डे मील’ खा लेने वाली क्रूरताएं हैं। बलात्कार की घटनाएं- एक से एक शर्मनाक- मन को मानो चींथ डालती हैं। दहेज के लिए लड़कियां अब भी जलाई जा रही हैं। एक बड़ी गाड़ी से संतोष नहीं है, दर्जनों बड़ी और महंगी गाड़ियां रखने की चाह मुरझाती नहीं दिख रही है : ‘अपनी उन्नति का मुंदा झरोखा’ खोलने के लिए न जाने कितने ही तत्पर दिख रहे हैं, शादी-विवाह में धन-वैभव दिखाने की ‘होड़’ है। कुल मिलाकर यह कि वह निर्मलता नहीं है, ‘न जल’ की न मन की। दिल्ली की यमुना आंखों में आंसू ला देती है। महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती पर इसीलिए फिर याद करने लायक है, ‘भीतरी-बाहरी’ निर्मलता का आग्रह। गांधी के निर्मलता-स्वच्छता वाले आग्रह में, सादगी, सच्चाई, वाली जीवन-शैली का भी आग्रह था। आग्रह था, जितने में ‘सुखभरा’ काम चल जाए, उस पर मार तमाम चीजें लाद कर, जीवन को ‘दुख भरा’ न बना लिया जाए। यह कोई ‘संत वाणी’ भर नहीं थी। न ही कोई निरा प्रवचन। यह तो मनुष्य के निर्मल जीवन की तलाश का ही प्रतबिंबन था। निर्मलता, अगर अब एक सपने ही तरह लगने लगी है, और जो दृश्य सामने है, उसमें मानो उसका आग्रह एक विडंबना की तरह भी लगने लगा है, तो थोड़ी देर के लिए मान लेना पड़ता है कि, ‘यथार्थ’ मानो सामान्य समझ और सामान्य आकांक्षाओं पर भारी पड़ रहा है। पर, ‘थोड़ी देर बाद,’ उस सपने की ओर लौट आना ही ठीक लगता है, जिसमें निर्मलता पर ही जोर हो, सिर्फ स्वच्छता पर नहीं।

यह सच है कि ‘यथार्थ’ के आगे सभी विवश हो जाते हैं। कई मौकों पर स्वयं गांधी भी विवश हुए थे। पर, सपना देखना या जिसे वे ठीक मानते थे, उसे छोड़ देना उन्हें मंजूर नहीं हुआ था। चाहें तो इसे हठ ही मान लें, पर हठ क्यों न करें कि जो जल हम पिएं, जो जल हम देखें, वह निर्मल ही हो। सिर्फ मशीन से छन कर आने वाले पानी पर न रुक जाएं, उस पानी को भी देखें, जो नदियों और झीलों में बह रहा है, और उसकी निर्मलता की व्यवस्था करें। सच पूछें तो हम जैसों को बोतलों में भरा हुआ ‘रेल नीर’ या कोई अन्य नीर, बोतल भरा, जहां एक आश्वस्ति देता है कि शायद ठीक ही है यह जल, यह नीर, उसे पी लो, वहीं यह ‘पीर’ भी देता है कि वह अब नलकों से क्यों नहीं निकल रहा, जैसा कि हमारे बचपन में निकला करता था और बड़े-छोटे स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर उतर कर, समय की सुविधानुसार लोग अपने-अपने पात्र भर लिया करते थे, बिना इसकी चिंता किए कि कहीं वह प्रदूषित तो नहीं है। जो भी हो, नीर की निर्मलता की चाह मिटती नहीं है, न ही वह मनुष्य के मन से जाने वाली है, क्योंकि उसके पास उस समय की उन सदियों की ‘गवाही’ भी है, जब कुएं का, नदियों का पानी निर्मल तो होता ही था, वह ‘खारे और मीठे’ में भी विभाजित नहीं था, और केवल केरल-बंगाल में नहीं, उत्तर प्रदेश तक में लोग किसी जलाशय तक के पानी को गले से उतार लिया करते थे, उससे भोजन आदि तो बना ही लेते थे। स्नान के लिए यह सोचना नहीं पड़ता था कि ‘इस’ जलाशय या नदी में नहाएं या नहीं! पर, आज की दिल्ली की यमुना में कौन नहाना चाहेगा! हां, उसमें अपनी भी गंदगी फेंक कर पुण्य कमाने वालों की कमी नहीं है।

हम लोग ‘इस नगरी में’ इतनी विरोधाभाषी लगने वाली परिस्थितियों में दिन काट रहे हैं कि क्या कहा जाए। छोटी-छोटी बोतलों में भरा हुआ निर्मल नीर ही अब समारोहों, सेमिनारों की मेजों पर रखा हुआ दिखता है। और शहर के ऐन बीच से बहते हुए गंदे नाले, अपनी राह चलते रहते हैं। उन्हीं को और गंदला कर देने से लोग चूकते नहीं, बंद-खुले प्लास्टिक के थैले उनमें तैरते हुए भी दिख जाएंगे, और उनके ‘तटों’ पर पड़े हुए भी। ‘सम-विषम’ भी कई बार काम आता दिखता नहीं है, और निर्मल वायु, निर्मल पवन, में सांस भरने की इच्छा, कहीं सांसों के बीच ही अटक जाती है। रोज ही याद आते हैं अनुपम मिश्र, ‘निर्मल नीर’ की याद दिलाने वाले ही नहीं, भाषा की शुद्धता और निर्मलता की भी याद दिलाने वाले। निर्मल यादें भी बनी रहनी चाहिए।

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