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कविताएं: नींद का हासिल, पानी की बात और धोखा

जब मन टूटा तो बसा हुआ पहाड़ टूट गया, सबसे पहले खोया जमा किया अंतिम तक का सिक्का, जिसे रोज रोज बचाता था।

Author Published on: February 18, 2018 3:33 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

नींद का हासिल

यह एक बेचैन करने वाली रात है
जब तारे अबरख की तरह चमक रहे हैं

जब फड़फड़ाते हैं पक्षी सारी सारी रात
इस टहनी से उस पेड़ तक
सन्नाटा है अनवरत उस पंख से भरा
जो भागने की हड़बड़ी में झड़ गए

पोखर के पानी की सतह पर
जमी हरियाली की तरह हो गई है रात
और कोई बत्तख नहीं जो बहे और पानी को कंपा दे
अब रंग से भरी हंसी भी नहीं रही
जो सपनों में खोए चेहरे पर फैल जाती जलकुंभी थी

जाड़े की धूप की तरह जो कोमल, गरम और मुलायम हो
मैं उसी सपने की तलाश में हूं
ये सपने मैं सौंप देना चाहता हूं हर उस आंख को
जो इतनी हताश है कि मुद्धी में जहर लेकर घूम रही है।

पानी की बात
गिलास के पानी में जो परछार्इं है
वह मेरी नहीं है प्यास की परछार्इं है
वह प्यास जो सांस की तरह फेफड़े में भरी है
रक्त की तरह जो नस नस में बह रही है वही प्यास

ये हजारों साल पुरानी है
उतनी ही पुरानी है इसकी बेचैनी उतनी ही पुरानी है इच्छा
जो दबती रही उन जूतों के नीचे
जिनमें कील ठुकवाई जाती थी

जितनी प्यास है उससे बहुत कम आया हिस्से में पानी
और कहा गया कि अब सब पानी खत्म हो गया
इस तरह आज तक तड़प रही है मेरी प्यास
सिर्फ कंठ भर पानी के लिए!

धोखा
जब मन टूटा तो बसा हुआ पहाड़ टूट गया

सबसे पहले खोया जमा किया अंतिम तक का सिक्का
जिसे रोज रोज बचाता था
थाली की रोटी कम करने के बाद

फिर पसीने की बूंद का हिसाब बिगड़ गया
फिर भरोसा घटा कुएं के पानी की तरह
अब हर बार यातना मिली
हर बार अन्याय हुआ
गला दबा हर बार फंदे में फंसा कर

इस तरह मुझे धोखा हुआ
जैसे इस लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को हो सकता है
मैंने जिसे अपनी उम्र का सबसे कीमती दिन सौंपा
उसने मुझे खोखला हो जाने तक तबाह किया।

 

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