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नन्ही दुनिया: कविता और शब्द-भेद

कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

फूलों के मेले में

पापा के संग पार्क गई थी,
लगी झूलने झूले में।

दौड़-दौड़ कर लगे झुलाने,
पापाजी थे झूला।
धक्का मार-मार कर झूला,
आसमान में ठेला।
आसमान में चिड़ियों से की,
बातें निपट अकेले में।

चिड़ियों से मिल कर वापस मैं,
जब धरती पर आई।
क्यारी के फूलों की मीठी,
बोली पड़ी सुनाई।
छोड़-छाड़ कर झूला पहुंची,
इन फूलों के मेले में।

फूलों का मेला क्या ये तो,
था मस्ती का सागर।
किया गुलों के सब झुंडों ने,
स्वागत, गीत सुना कर।
गीत सुना कर सब फूलों ने,
मुझे ले लिया गोले में।

सभी फूल हंस कर बोले, हो
तुम परियों की रानी।
मुझे सुनाओ परीलोक की,
कोई अमर कहानी।
अब तो मैं घबराई, सोचूं
पड़ी हूं कहां झमेले में।
शब्द-भेद
कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

चर्म / चरम

मनुष्य या किसी भी जीव के शरीर की त्वचा या चमड़ी को चर्म कहते हैं। यह शब्द मरे हुए पशुओं की खाल के रूप में रूढ़ हो चुका है। जबकि चरम का अर्थ होता है आखिरी पायदान, शीर्ष, सबसे ऊंचाई पर।

पुल / पूल

नदी के दो पाटों को जोड़ते हुए बनाए गए नदी को पार करने के रास्ते को पुल कहते हैं। आप इस शब्द से परिचित हैं। पर जब इसमें मात्रा गलत लग जाए तो यह अंग्रेजी का पूल यानी तालाब, नहाने के कुंड बन जाता है।

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