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कहानी- हंसी की सड़क

एक था जमींदार। वह बहुत अमीर था। उसके पास किसी बात की कमी नहीं थी, बस एक बात को छोड़ कर।

Author January 7, 2018 06:01 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

एक था जमींदार। वह बहुत अमीर था। उसके पास किसी बात की कमी नहीं थी, बस एक बात को छोड़ कर। वह बहुत गुस्सैल स्वभाव का था। किसी ने उसके चेहरे पर कभी हंसी नहीं देखी थी। नौकर उससे बहुत डरते थे। जमींदार जब लोगों को हंसते-खिलखिलाते हुए देखता तो और जल-भुन जाता। दरअसल उसका भी मन हंसने को करता था, लेकिन उसके चेहरे पर हंसी आती ही नहीं थी। सर्दी के दिन थे। जमींदार अपनी हवेली पर बैठा था। वहां से उसकी नजर सामने वाले मैदान पर गई। वहां एक फटी पोशाक पहने एक अजनबी बड़ी जोर-जोर से हंस रहा था। जमींदार उसे देख कर हैरान रह गया। उसने उस अजनबी के चारों ओर देखा, पर वहां आसपास कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसे देख कर हंसी आए। फिर वह व्यक्ति क्यों हंस रहा था? जमींदार को बहुत दिमाग लगाने पर भी यह बात समझ नहीं आई। आखिर उसने अपने नौकर को बुलाया।

नौकर अजनबी के पास पहुंचा। अजनबी उसे देख कर भी जोर-जोर से हंसता रहा। नौकर बोला, ‘भाई हंसते ही रहोगे या यह भी बताओगे कि तुम हंस क्यों रहे हो? तुम्हारे पास रहने को घर नहीं, तन पर पूरे कपड़े नहीं। फिर भी हंस रहे हो, कमाल है। इतनी गरीबी में भी कोई कैसे हंस सकता है? वाकई बड़ी हैरानी की बात है।’ उसकी बात सुन कर अजनबी बोला, ‘भैया, दरअसल मैं हंसने की कोशिश नहीं करता, बस हंसी अपने आप अंदर से निकलती है और मैं हंसने लगता हूं।’ नौकर बोला, ‘अरे तुम बिना बात भी हंस लेते हो और हमारे जमींदार को तो हंसी की बात पर भी गुस्सा आता है। मुझे बताओ न कि किस बात पर हंस रहे हो? जमींदार ने तुम्हारे पास मुझे यही जानने के लिए भेजा है।’ यह सुन कर अजनबी हंसते हुए बोला, ‘बात तो मैं तुम्हें बता दूंगा, पर यह नहीं कह सकता कि मेरी बात सुन कर तुम्हारे जमींदार को भी हंसी आ जाए। क्योंकि हर व्यक्ति को अलग-अलग बातों और कारणों से हंसी आती है।’

नौकर के बहुत जोर देने पर अजनबी बोला, ‘ठीक है, मैं तुम्हें बता ही देता हूं। रात मुझे एक सपना आया था। मैंने देखा कि मेरे सामने थाल में ढेर सारे लड््डू हंै। जैसे ही मैंने लड््डू लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाए, वे मेरी आंखों के सामने से उड़ गए। बस यही बात सोच कर मुझे हंसी आ रही है कि मैं कैसा व्यक्ति हूं, जो सपने में भी लड््डू नहीं खा सकता।’ यह सुन कर नौकर जमींदार के पास लौट आया। वह बोला, ‘सरकार, मैं समझ गया कि वह अजनबी कैसे हंसता है?’ इसके बाद नौकर ने लड््डू का थाल मंगवा कर जमींदार के सामने रख दिया और लड््डुओं को ऊपर उछालने लगा। फिर वह मालिक से बोला, ‘मालिक आप इन लड््डुआें को देखते रहिए और हंसते रहिए।’ वह अजनबी भी यही सोच-सोच कर हंसता है कि सपने में लड््डू उड़ते हैं। नौकर की बात सुन कर जमींदार ने उसे एक जोर का थप्पड़ लगाया और बोला, ‘यह क्या बकवास है?’ नौकर अपने गाले को सहलाते हुए बोला, ‘मालिक, उसने तो अपनी हंसी का यही कारण बताया था।’ यह सुन कर जमींदार चुप हो गया।

नौकर के जाने के बाद वह वहां रखे लड््डुओं के बारे में सोचता रहा, पर उसे उन लड््डुआें के बारे में सोच कर बिल्कुल हंसी नहीं आई। आखिर अकेले में जमींदार ने सबकी नजरें बचा कर उन लड््डुआें को उछाल कर भी देखा, लेकिन उसके चेहरे पर हंसी नहीं आई। जमींदार और परेशान हो गया।
वह अजनबी रोज वहां आकर जोर-जोर से हंसता और जमींदार उसे देख कर कुढ़ता रहता। एक दिन जमींदार ने अजनबी की शिकायत राजा से कर दी और कहा कि, ‘महाराज, मुझे हंसी नहीं आती, पर गांव में एक गरीब अजनबी मुझे दिखा-दिखा कर हंसता है। उसे इसके लिए दंड दिया जाए।’ राजा ने उस अजनबी को बुलवाया। अजनबी आते ही बोला, ‘महाराज, एक दिन मुझे यह सपना दिखा कि मेरे सामने लड््डुओं से भरा थाल है, लेकिन जैसे ही मैंने उन लड््डओं को खाने के लिए उठाना चाहा, वैसे ही लड््डू उड़ने लगे।’ बस यही सोच कर मुझे हंसी आती है कि मैं सपनों में भी लड््डू नहीं खा पाया। अब इसमें मेरा क्या दोष है?’

अजनबी की बात सुन कर राजा ने एक लड््डुओं का थाल मंगा कर अजनबी को कहा कि आप जी भर लड््डू खाइए और आज से राजदरबार में ही काम करिए। हमें ऐसे कर्मचारी की जरूरत है, जो मुसीबत के समय भी हंस कर काम करे।’ यह सुन कर जमींदार दंग रह गया। कहां तो वह अजनबी की शिकायत करने आया था और कहां अजनबी के दिन ही फिर गए! अगले दिन उसने देखा कि वही अजनबी उसके घर के नीचे खड़ा हुआ उसे बुला रहा है। जमींदार उसके पास गया तो अजनबी बोला, ‘जमींदार जी, मैं हंसी की सड़क पर दौड़ रहा हूं और आप उदासी के घर में बैठे हुए हैं। उससे बाहर निकलिए। हंसी मन से निकलती है। आप हर काम को मुस्कराते हुए करिए। दुख हो या सुख लेकिन मुस्कराहट को अपने होंठों पर हमेशा रखिए। ऐसा करने से हंसी आपके अंदर से खुद ही निकलेगी। आपको हंसने के लिए कारण नहीं ढूंढ़ना पड़ेगा।’ अजनबी की बात सुन कर उस दिन पहली बार जमींदार के होंठों पर मुस्कराहट आई। अजनबी बोला, ‘ये देखिए, आई… आई… आपके चेहरे पर हंसी आई।’ यह सुन कर जमींदार जोर से खिलखिला कर हंसने लगा। अब वह अक्सर हंसता हुआ नजर आता था। अब जमींदार का जीवन पहले से ज्यादा अच्छा और सुखी हो गया था, क्योंकि अब वह उदासी का घर छोड़ कर हंसी की सड़क पर जो भागने लगा था। इसके साथ ही अब अजनबी उसका बहुत अच्छा मित्र बन गया था, जो हर वक्त उसे हंसाता रहता था।

 

 

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