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बाल कहानी- डायरी ने खोला भेद

स्कूल के एक कर्मचारी मुन्नालाल ने उसे छत पर कुत्ते के एक पिल्ले के साथ पकड़ा था। पिल्ले के मुंह पर सेलोटेप चिपका था। उसकी आगे की दोनों टांगें और पीछे वाले दोनों पैर आपस में बंधे हुए थे।
Author December 3, 2017 06:28 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राजेश बुरी तरह फंस चुका था। स्कूल ही नहीं, घर-घर में उसके कारनामे की चर्चा थी। इतनी भोली सूरत के पीछे इतना बड़ा शैतान! कुछ बच्चों के माता-पिता राजेश की बात करते हुए इस नतीजे पर पहुंचे थे कि कल वह किसी बच्चे की जान भी ले सकता है!  जब ये बातें हो रही थीं, राजेश के माता-पिता का सिर झुका हुआ था। माता-पिता को यकीन नहीं हो रहा था कि वह ऐसा कर सकता है। जब उन्हें स्कूल बुलाया गया तो उन्होंने प्रिंसिपल से कहा भी कि राजेश ने कभी घर में किसी को परेशान नहीं किया, कभी किसी चीज की मांग नहीं करता। घर में कभी कोई शैतानी नहीं की। कभी उसकी किसी शैतानी की शिकायत भी नहीं मिली। बस, थोड़ा गुमसुम रहता है।  प्रिंसिपल ने गौर से उनकी बात सुनी और बोले, ‘ऐसे बच्चे जो करते हैं, बहुत चुपचाप करते हैं और उन पर शक भी नहीं होता। दूसरे बच्चों के अभिभावक चिंतित हैं। फिलहाल, हम इसे एक हफ्ते के लिए स्कूल नहीं आने की सजा दे रहे हैं। आप लोग इसे समझाइए और किसी मनोचिकित्सक को भी दिखाइए। लेकिन एक हफ्ते बाद जब यह स्कूल आए तो अपनी गलती मानने को तैयार होकर आए।’

हुआ यों था कि स्कूल के एक कर्मचारी मुन्नालाल ने उसे छत पर कुत्ते के एक पिल्ले के साथ पकड़ा था। पिल्ले के मुंह पर सेलोटेप चिपका था। उसकी आगे की दोनों टांगें और पीछे वाले दोनों पैर आपस में बंधे हुए थे। मुन्नालाल ने राजेश के हाथ से पिल्ला छीन लिया। पिल्ला मर चुका था। वह राजेश को सीधा प्रिंसिपल के पास ले गया। यह सब सुन कर प्रिंसिपल दंग रह गए। हालांकि प्रिंसिपल के सामने भी राजेश ने मुंह बंद रखा। केवल एक बात कही थी कि उसने पपी को नहीं मारा। बस। देखते ही देखते यह बात पूरे स्कूल में फैल गई और घरों तक पहुंच गई। इस बीच उसके पिता को एक दिन अचानक याद आया कि उन्होंने एक बार बेटे को डायरी लिखने की नसीहत देते हुए एक डायरी दी थी। उन्होंने राजेश से वह डायरी दिखाने को कहा। उन्हें उम्मीद थी कि राजेश ने डायरी में ऐसा कुछ लिखा हो, जिससे उसे समझने में मदद मिले। पर उसने कह दिया कि डायरी नहीं मिल रही। आठवें दिन राजेश के पिता उसे हिदायतें देते हुए समय से पहले स्कूल छोड़ गए। उन्हें लौटता देख कर राजेश स्कूल के गेट से बाहर निकल आया। प्रिंसिपल ने उसे देख लिया था। वे खुद ही कुछ दूरी बनाते हुए राजेश के पीछे-पीछे चल दिए। कुछ दूर पहुंच कर राजेश एक जगह रुक गया। वहीं एक बिल्डिंग की आड़ लेकर वे भी खड़े हो गए। राजेश ने वहां पड़ी एक लकड़ी उठाई और गड्ढा खोदने लगा। फिर उसने अपने बैग से डायरी निकाल कर गड्ढे में दबा दी और मिट्टी डाल कर ऊपर एक भारी पत्थर रख कर लौटने लगा। प्रिंसिपल रास्ते से हट कर बिल्डिंग की दूसरी तरफ चले गए। जब राजेश लौट गया, तो उन्होंने पत्थर हटा कर वह डायरी निकाल ली।

दोपहर में उन्होंने राजेश के पिता को फोन किया, ‘क्या आप जानते हैं कि आपका बेटा डायरी लिखता था?’ ‘सर, पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकता। लेकिन पिछले साल मैंने उसे एक नीले रंग की डायरी दी थी। कहा था कि चुप रहने से अच्छा है अपने मन की बात डायरी में लिखा करो।’  प्रिंसिपल ने उन्हें फौरन स्कूल पहुंचने को कहा। राजेश के पिता बुरी तरह डर गए। वे अपनी पत्नी के साथ स्कूल पहुंचे। प्रिंसिपल के कमरे में तीन अन्य बच्चे और उनके माता-पिता पहले से बैठे हुए थे। कमरे में घुसते ही प्रिंसिपल ने अपनी मेज पर रखी डायरी दिखाते हुए पूछा, ‘यही डायरी आपने बच्चे को दी थी?’ राजेश के पिता ने केवल सिर हिलाया- जी सर। प्रिंसिपल ने डायरी का एक पन्ना खोला और ऊपर लिखी तारीख का उल्लेख करते हुए पढ़ना शुरू किया, ‘आज स्कूल के मुन्ना भैया मुझे पकड़ कर प्रिंसिपल सर के पास ले गए। मैंने पपी को नहीं मारा। मैं तो उसके मुंह पर लगा सेलोटेप हटा रहा था। मुझे पपी के मरने का बहुत दुख हो रहा है।’ प्रिंसिपल ने आगे पढ़ा, ‘मैं स्कूल की छत पर कभी नहीं जाता। मुझे पता था कि वहां सूरज, नितिन और प्रियांक जाते हैं और मोबाइल पर कुछ देखते हैं। बच्चों का कहना है कि वे तीनों वीडियो देखते हैं। मैं तो इसलिए पहुंच गया, क्योंकि मैंने तीनों की बात सुन ली थी। वे कह रहे थे, चलो छत में देखते हैं, पिल्ले के क्या हाल हैं। मुझे शक हुआ। मैं छत पर चला गया। पपी के मुंह से टेप हटा ही रहा था कि मुन्ना भैया आ गए।’

फिर आगे के पन्नों में दूसरी तारीख के साथ उसने माता-पिता को हुई शर्मिंदगी के बारे में लिखा था। आखिरी पन्ने में राजेश ने लिखा था- पापा कुछ दिन से डायरी मांग रहे हैं। यह डायरी उनके हाथ पड़ जाएगी तो सूरज, नितिन और प्रियांक फंस जाएंगे। वे तीनों फंस गए तो उनके माता-पिता को मेरे माता-पिता की तरह ही शर्मिंदा होना पड़ेगा। इसलिए सोचता हूं, आज इस डायरी को कहीं फेंक आऊं। प्रिंसिपल ने उस डायरी में लिखी बहुत-सी ऐसी बातें भी पढ़ कर सुनार्इं, जिसमें स्कूल का, घर का और बच्चों का जिक्र था। हर बात के सकारात्मक पहलू को उसने देखा और लिखा था। डायरी पढ़ते-पढ़ते प्रिंसिपल की आंखों से आंसू छलक आए। राजेश की मम्मी तो फफक-फफक कर रोने लगीं। यह सब सुनने के बाद वहां खड़े सूरज, नितिन और प्रियांक ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और माफी मांगते हुए बताया कि पिल्ले के मुंह और पैरों में सेलोटेप उन्हीं ने बांधा था। जब राजेश छत पर चढ़ने लगा तो उन्हीं ने मुन्नालाल को छत पर भेजा। उनके माता-पिता गरदन झुकाए सब सुनते रहे। तब राजेश के पिता ने प्रिंसिपल से कहा, ‘सर अब इस बात को यहीं खत्म कर दीजिए। इन तीनों बच्चों को माफ करिए।’ ०

 

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