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बाल कहानी- छड़ी कबूतर

कबूतरों और अनुज के बीच यह लुका-छिपी इतनी बार हुई कि वह थक कर दूसरे कमरे में चला गया, तब तक ट्यूशन जाने का समय हो गया।
Author August 13, 2017 02:27 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

देवेंद्र कुमार

अनुज दोपहर में दो बजे स्कूल से लौटता है। आते ही मां गरम भोजन परोस कर कहती हैं- खाकर कुछ देर आराम कर लो।’ फिर उसे ट्यूशन जाना होता है- ठीक चार बजे।
इधर एक नई परेशानी खड़ी हो गई है- कबूतरों की। जिस कमरे में अनुज खाना खा कर आराम करता है, उसकी छत का कुछ प्लास्टर गिर गया है। वहां मरम्मत हो रही है, इसलिए अनुज को दूसरे कमरे में जाना पड़ा, लेकिन पहले ही दिन कबूतरों की गुटरगूं और पंखों की फड़फड़ के शोर ने उसे परेशान कर दिया। कबूतर कमरे के बाहर बालकनी में शोर कर रहे थे। अनुज लेटा न रह सका। उठ कर बालकनी का दरवाजा खोला तो कबूतर उड़ गए। अनुज ने सोचा- कबूतर अब नहीं आएंगे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही गुटरगूं और पंखों की फड़फड़ फिर सुनाई देने लगी। अनुज ने दरवाजा खोला तो कबूतर उड़ गए। कबूतरों और अनुज के बीच यह लुका-छिपी इतनी बार हुई कि वह थक कर दूसरे कमरे में चला गया, तब तक ट्यूशन जाने का समय हो गया।
दूसरी दोपहर भी कबूतरों ने वही किया। अनुज ने जैसे ही बालकनी का दरवाजा खोला कबूतर फड़फड़ करते उड़ गए, लेकिन पिछले दिन की तरह फिर लौट आए। अनुज समझ नहीं पाया कि इस मुश्किल से छुटकारा कैसे मिले। आखिर वह उसी कमरे में चला आया, जहां छत की मरम्मत हो रही थी।
मां ने पूछा- ‘क्या हुआ?’
‘कबूतर परेशान कर रहे हैं।’ अनुज ने बताया तो मां हंसने लगीं- ‘कबूतर तो शोर करते ही हैं। तुम आंखें बंद करके लेटो, तो नींद आ जाएगी।’
‘मैं भी परेशान करूंगा शैतान कबूतरों को।’ अनुज ने गुस्से से कहा और ट्यूशन के लिए चला गया।
जब वह घर लौटा तो शाम ढल चुकी थी। वह सीधा बालकनी में गया। वहां सन्नाटा था, कबूतर कहीं नहीं थे। उसने चैन महसूस किया। तभी उसकी नजर बांस की पतली छड़ी पर गई। अनुज ने तुरंत उसे उठा लिया। कुछ पल सोचता रहा फिर उसे हवा में इधर-उधर घुमाने लगा।
अगली दोपहर उसने बालकनी के पल्ले खोल कर पर्दा डाल दिया। फिर उसके पीछे छिप कर खड़ा हो गया। उसे छज्जे की रेलिंग दिखाई दे रही थी। उसने बांस की छड़ी को मजबूती से थामा हुआ था, उसने सोच लिया था कि जैसे ही कबूतर छज्जे की रेलिंग पर उतरेंगे, वह छड़ी से वार करेगा। पर वैसा कुछ नहीं हुआ, जैसा अनुज ने सोचा था। जैसे ही कबूतर रेलिंग पर उतरे, अनुज ने छड़ी से वार किया, लेकिन शायद किसी कबूतर को छड़ी की चोट नहीं लगी। अनुज ने कई बार छड़ी से वार किया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। बस छड़ी हर बार रेलिंग से टकरा कर रह जाती थी।
परेशान होकर अनुज बालकनी में निकल आया। हाथ की छड़ी हिलाते हुए वह इधर-उधर देखने लगा। उसका प्लान फेल हो गया था। शैतान कबूतर जीत गए थे। अब क्या करे?
कुछ पल इसी तरह खड़े रहने के बाद वह कमरे में जाने के लिए मुड़ने लगा तो किसी की हंसी सुनाई दी। उसने देखा तो सामने वाले ब्लॉक के फ्लैट की खिड़की में एक लड़का दिखाई दिया। वही हंस रहा था। नजर मिलते ही उसने कहा- ‘तुम्हारी छड़ी कबूतरों का कुछ नहीं कर सकती। मेरे पास एक तरकीब है।’
‘कैसी तरकीब?’ अनुज ने पूछा।
जवाब में उस लड़के ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर दिखाया। उसके हाथ में एक गुलेल थी।
‘गुलेल से क्या करोगे?’ अनुज ने पूछा।
‘गुलेल से निशाना लगाऊंगा तो किसी न किसी कबूतर को जरूर चोट लगेगी। फिर वे कभी तुम्हारी बालकनी की तरफ नहीं आएंगे।’ उस लड़के ने कहा और गुलेल का रबर खींचते हुए बोला तुम अंदर चले जाओ नहीं तो…।’
अनुज ने हड़बड़ा कर कहा- ‘अरे नहीं, ऐसा मत करना। गुलेल की चोट से कबूतर घायल हो सकते हैं। शायद कोई मर भी जाए।’
‘तो फिर कबूतर तुम्हें परेशान करना बंद नहीं करेंगे। तुम अपनी छड़ी से चाहे कितने भी वार क्यों न करो, कबूतरों का कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे।’ उस लड़के ने कहा।
‘रुको, अभी गुलेल मत चलाना।’ अनुज ने कहा। वह कुछ घबरा गया था। उसने सोचा, उस लड़के को रोकना होगा। उसने लड़के का नाम और फ्लैट नम्बर पूछ लिया। वह तुरंत उससे मिल कर कहना चाहता था। चलने से पहले उसने एक किताब ले ली। अनुज के जन्मदिन पर उसके मामाजी ने पुस्तकें उपहार में दी थीं। उसके पापा कहते थे- किसी के घर खाली हाथ कभी न जाओ। लड़के का नाम अजय था।
फ्लैट का दरवाजा अजय की मम्मी ने खोला। अजय खिड़की के सामने बैठा था। उसके पैर पर पट्टी बंधी थी। उसने बताया कि फिसल कर गिरने से चोट लग गई थी। अब पहले से ठीक है। पास ही गुलेल रखी थी। अनुज ने उसे किताब दी। कहा- ‘मेरे जन्मदिन पर मामाजी ने उपहार में दी हैं कई पुस्तकें।’ अजय किताब उलट-पलट कर देखने लगा। इतने में अनुज ने गुलेल उठा ली। वहां से अपने फ्लैट की बालकनी और रेलिंग पर बैठे कबूतर दिखाई दे रहे थे। अजय बोला- ‘देखो, यहां से कबूतरों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है।’
अनुज ने कुछ सोचा, फिर बोला- ‘मैंने तुम्हें किताब दी है। क्या तुम मुझे कुछ नहीं दोगे?
‘क्या दे सकता हूं मैं?’ अजय ने पूछा।
‘गुलेल।’ अनुज ने कहा।
‘गुलेल किसलिए? तुम क्या करोगे इसका?’ अजय ने अचरज से पूछा। और गुलेल अनुज को थमा दी।
‘कुछ तो जरूर करूंगा, लेकिन अभी नहीं बता सकता। अनुज ने कहा और मुस्करा उठा। ‘वादा करो कि गुलेल वापस नहीं मांगोगे और दूसरी खरीदोगे भी नहीं।’
‘तो तुम भी यह किताब वापस मत लेना।’ अजय ने कहा और मुस्कराने लगा।
‘यह किताब तुम्हारे लिए ही लाया हूं। अगली बार और पुस्तकें लेकर आऊंगा। मेरे पापा मेरे लिए नई-नई किताबें लाते रहते हैं। मेरे पास बहुत किताबें हैं। कभी आओ तो दिखाऊंगा, पढ़ने को भी दे सकता हूं।’ अनुज बोला। यह कहते हुए उसकी आंखें अपनी बालकनी पर टिकी थीं। वहां कई कबूतर रेलिंग पर बैठे थे। बार-बार उड़ते और फिर लौट आते। सचमुच अजय की खिड़की से कबूतरों को गुलेल से निशाना बनाया जा सकता था। लेकिन वह ऐसा कभी नहीं होने देगा।
अजय ने कहा- ‘पैर की चोट ठीक होने पर जरूर आऊंगा। तब देखूंगा तुम्हारी पुस्तकें।’
कुछ देर बाद अनुज वहां से चला आया। अपने घर की ओर चलते हुए उसने गुलेल का रबर निकाल कर फेंक दिया। फिर गुलेल भी नाली में डाल दी। गुलेल पानी में खो गई। घर लौट कर सीधा बालकनी में गया। वहां गुटरगूं करते कबूतर तुरंत उड़ गए। वह मुस्करा कर अजय के फ्लैट की ओर देखने लगा, वहां कोई नहीं था। उसे उम्मीद थी कि चोट ठीक होने पर अजय किताबों से मिलने आएगा।
कुछ देर बाद कबूतर फिर लौट आए थे। अनुज ने दरवाजा खोल कर कबूतरों को भगाने की कोशिश नहीं की। मां उसे समझाती हैं- कबूतर जो करते हैं वही करेंगे, तुम अपना काम करो। अनुज ने पापा से मिली नई किताब खोल ली। बाहर बालकनी में गुटरगूं हो रही थी। ’

 

 

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