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जानकारी- ऊंट

ऊंट-पालन के लिए लोगों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और मेलों आदि में इनके गलत उपयोग पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए।

ऊंट-पालन के लिए लोगों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और मेलों आदि में इनके गलत उपयोग पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए।

पशुपालन में राजस्थान अग्रणी प्रदेश है। वैसे आज आवागमन के साधन विकसित हो गए हैं, लेकिन फिर भी ऊंट राज्य के रेतीले इलाके में आवागमन में विशेष भूमिका निभा रहे हैं। ऊंट से यहां व्यापार, रक्षा-सुरक्षा और संदेश-डाक आदि का कार्य भी लिया जाता है।ऊंट खेती में भी बहुत काम आने लगे हैं। खेतों की बुआई और सिंचाई में ऊंटों का उपयोग यहां लंबे समय से किया जाता रहा है। ऊंट सच्चे अर्थों में उपयोगी और सामान्यतया भोला पशु माना गया है। यह घास-फूस और पत्ते खाकर अपना जीवन यापन कर लेता है। एक रात में एक ऊंट 60-70 किलोमीटर की यात्रा तय कर लेता है। ऊंट के बारे में प्रसिद्ध है कि वह बहुत भोला जानवर है और यह सही भी है कि एक हजार में से 999 ऊंट सीधे और भोले होते हैं। विश्व में उपलब्ध कुल ऊंटों में से अकेले भारत में करीब तेरह-चौदह लाख ऊंट हैं। इसमें से करीब छह लाख ऊंट अकेले राजस्थान में हैं। राजस्थान में पाए जाने वाले बीकानेरी, जैसलमेरी और मेवाड़ी ऊंटों में बीकानेरी नस्ल सबसे अच्छी मानी गई है। ऊंट बहुत मेहनती होता है।

ऊंट के बारे में अनेक भ्रांतियां हैं कि उसके पेट में दो थैलियां होती हैं, जिनमें पानी भरा रहता है और वह पानी वह मुश्किल के समय काम में लेता है। यह एकदम भ्रामक है। यह सही है कि ऊंट मरूस्थल में दस-पंद्रह दिन तक प्यासा रह सकता है, लेकिन इसके बाद वह प्यास से दम तोड़ देता है। उसके जो कूबड़ होती है, वह मोटापे की मांसपेशियों की तरह है। कई ऊंटों के दो कूबड़ें होती हैं जिनकी गांठनुमा मांसपेशियों में गांठें होती हैं। इन गांठों में पानी भरा रहता है, इनके सवार पहले जब रेगिस्तान में भटककर प्यास से देह त्यागने की स्थिति में पहुंच जाते थे, तब वे ऊंट का पेट फोड़कर उन थैलियों से पानी निकालकर पी लेते थे।

यह पानी बहुत ही बदबूदार, मैला और गाढ़ा होता है। दो कूबड़ वाले ऊंट भारत में बहुत कम हैं। ये ज्यादातर अरब देशों में पाए जाते हैं। कई लाख वर्ष पूर्व ऊंटों का पता चला था। दक्षिणी अमेरिका में कुछ खोजियों का मानना है कि ऊंट अरब से चलकर अमेरिका पहुंचे। और फिर एशिया में आए।ऊंटों के पांव गद्दीदार होते हैं। उसका चलन रेगिस्तानी थार के मैदानों में सभी तरह से उपयोगी रहा है। हमारे यहां अब हुई लड़ाइयों में राजस्थान सीमा पर सीमा सुरक्षा बलों और फौजियों को ऊंटों ने बहुत सहायता पहुंचाई है। ऐसे में जबकि टैंक और दूसरे वाहन रेत में धंस जाते हैं, ऊंट सरपट दौड़ निकलता है। ऊंट का सुरक्षा सेवाओं में समुचित उपयोग आज भी हो रहा है। सीमा सुरक्षा बलों के लोग ऊंटों से ही सीमाओं की सुरक्षा करते हैं। इसे रेगिस्तान का जहाज भी कहा जाता है।

ऊंट की पानी पीने की क्षमता बहुत होती है और वह एक बार में अपने वजन का कुल एक चौथाई पानी पी सकता है, लेकिन उसे ऐसा नहीं करने देना चाहिए। उसे बीच-बीच में चारा खिलाते रहने के बाद ही तीन-चार बार में पानी पिलाना चाहिए। ज्यादा पानी पीने के बाद उसकी कार्य करने की शक्ति घट जाती है, भारीपन से उसकी टांगों के टूटने की भी आशंका बनी रहती है। ऊंटनी का दूध गाय, बकरी और भैंस की ही तरह माना गया है। उसमें पर्याप्त मात्रा में पानी, वसा और प्रोटीन होते हैं। पूरे एक वर्ष तक मादा ऊंटनी दूध देती है जिसे उसका बच्चा पीता है। ऊंटनी की घ्राण शक्ति बहुत ही विलक्षण है। वह हजारों ऊंटों में से अपने बच्चे को पहचान लेती है और इसी प्रकार से उसका बच्चा भी मां को ढ़ूँढ़ लेता है। इसके अलावा ऊंट को पानी की भी गंध आती है, वह रेगिस्तान में भटकने के बाद प्यास लगने पर पानी की दिशा में अपने आप दौड़ने लगता है। ऊंट-पालन के लिए लोगों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और मेलों आदि में इनके गलत उपयोग पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए। ऊंट रेगिस्तानी इलाकों में मानवीय जीवन का आधार हैं।

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