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किताबें मिलीं: प्रत्यंचा, माटी-पानी और सलीब पर सच

कवि की यह विषय विविधता उसे एक ऐसे सजग संवेदनशील रचनाकार के रूप में पाठकों के समक्ष लाती है, जो कविता के लिए किसी परहेज में विश्वास नहीं करता।

Author January 13, 2019 4:28 AM
माटी पानी बुक का कवर पेज।

प्रत्यंचा
यह छत्रपति शाहूजी महाराज की जीवनगाथा है। छत्रपति शाहूजी का जीवन खुद को और समाज को वर्गविहीन और जातिविहीन करने व सबको सामाजिक न्याय दिलाने के सतत संघर्ष का साक्ष्य है। राजनीतिक गुलामी से भी त्रासद होती है सामाजिक गुलामी। कुछ इसे मानते हैं, कुछ नहीं। जो मानते हैं उनमें भी इसका उच्छेद करने की पहल करने का नैतिक साहस बहुधा नहीं होता। औरों की तरह शाहूजी के जीवन में भी यह त्रासदी प्रकट हुई। राजा थे, चाहते तो आसानी से इससे पार जाने का मानसिक संतोष पा सकते थे। मगर नहीं, उन्होंने अपनी व्यक्तिगत त्रासदी को एक मुहूर्त और व्यक्तिमात्र में न देखकर पूरी शास्त्रीय और सांस्कृतिक परंपरा में देखा और इस सामूहिक त्रासदी में मनुष्य की आत्मा तक को जला और गला देने वाली इस मर्मांतक घुटन और पीड़ा को सामूहिक मुक्ति में बदलने की जिद के तहत उलटे नियमों को उलट देने का संकल्प लिया। शाहूजी के संकल्पित जाति उच्छेद और सामाजिक परिवर्तन की इसी कथा को सुख्यात कथाशिल्पी संजीव ने अपने इस नवीनतम उपन्यास ‘प्रत्यंचा’ में उठाया है। प्रत्यंचा अर्थात दोतरफा तनावों के बीच लक्ष्य का संधान! प्रत्यंचा अर्थात पराक्रम और प्रहार की प्रदीप्त दास्तान! प्रत्यंचा अर्थात दुर्दम्य प्रत्याख्यान का अभिनव आख्यान! मातृ ऋण, पितृ ऋण, गुरु ऋण, संतान ऋण और मित्र ऋण की तरह ही एक ऋण और होता है- समाज का ऋण। इस दुनिया और समाज की बेहतरी के लिए जिन्होंने जीवन समर्पित कर दिया, उनका ऋण! संजीव का यह उपन्यास उसी ऋणमुक्ति की एक विनम्र कोशिश है।
प्रत्यंचा : संजीव; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

माटी-पानी
‘मैं कविता की दुनिया का स्थायी नागरिक नहीं हूं/ मेरे पास नहीं है इसका कोई ग्रीन कार्ड/ कविता की दुनिया के बाहर/ इतने सारे मोर्चे हैं/ जिनसे जूझने में खप जाता है जीवन/ इनसे न फुरसत मिलती है, न निजात/ कि कविता की दुनिया की नागरिकता ले सकूं/ इसलिए जब तब/ आता जाता रहता हूं/ कविता की दुनिया/ बस पर्यटन है मेरे लिए।’ सदानंद शाही के काव्य संग्रह ‘माटी पानी’ की यह कविता बताती है कि वे कितनी सहज भाषा और गहरे कहन के कवि हैं। कविता में गद्यात्मकता काव्योत्कर्ष को उपलब्धि के उत्तुंग शिखर तक पहुंचाने में समर्थ होती है, वह इस (कवि) में देखते ही बनती है। सदानंद शाही की कविताओं में एक तरफ यदि सुंदर को सजाने और बचाने का भाव है तो दूसरी ओर असुंदर के सामने घुटने न टेकने की टेक भी है। यदि जीवन सौंदर्य को कवि ठोस स्थानों पर पकड़ता है तो उसका विकृति के प्रति विद्रोह भी वायवीय नहीं। उसे यह रहस्य ज्ञात है कि महानता के ढोंग को उसकी क्षुद्रता में पकड़ा जा सकता है। उनकी कविताओं का फलक बहुत व्यापक है। कवि की यह विषय विविधता उसे एक ऐसे सजग संवेदनशील रचनाकार के रूप में पाठकों के समक्ष लाती है, जो कविता के लिए किसी परहेज में विश्वास नहीं करता। उनकी कविताएं उनकी सत्यनिष्ठा और जन सामान्य के प्रति उदात्त भावना व शोषण अन्याय-अनीति के प्रति विरोध की कविताएं हैं।
माटी पानी : सदानंद शाही; लोकायत प्रकाशन, बी-2, सत्येंद्र कुमार गुप्त नगर, लंका, वाराणसी; 125 रुपए।

तेरा संगी कोई नहीं
कृषक जीवन की बुनियादी संरचना के तहत कृषि के निरंतर उपेक्षित, अभावग्रस्त और परेशानीपूर्ण बनते जाने के कारणों का राई-रक्स उजागर करता यह उपन्यास कृषक जीवन, कृषक समाज और कृषि समस्या का जीवंत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास आत्महत्या के पलायनवादी रास्ते के खिलाफ किसानों को सचेत करने का आह्वान करता है। कृषि के क्षेत्र में विकास और बदलाव के नाम पर सिर्फ कुछ योजनाएं ही प्रचारित हुई हैं। किसान और कृषि से जुड़ी उनकी समस्याओं का जमीनी स्तर पर समाधान प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे कृषि की समस्याएं सुलझने की अपेक्षा और उलझती ही गई हैं।
किसानों की जीविका के स्रोत कृषि और उनके पालतू पशु होते हैं, इस बात को अपने जीवंत कथ्य में प्रस्तुत करता यह उपन्यास इस बात से हमारा साक्षात्कार कराता है कि कृषि की समस्या निरंतर जटिल और कठिन होती जा रही है। नई कृषि पद्धति ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। कृषि से निरंतर दूर होती नई पीढ़ी की वजह से ही किसानों के खेत अब लगातार परती पड़ते जा रहे हैं। कृषि का यह सबसे बड़ा संकट है और कृषि समस्या को लेकर एक गंभीर यक्ष प्रश्न भी। एक मध्यवर्गीय किसान की त्रासद कथा के माध्यम से इस उपन्यास ने सही अर्थों में प्रतिनिधि कृषक चरित्र व कृषि जीवन से संबंधित वास्तविक समस्याओं को न सिर्फ चिह्नित किया है, बल्कि उन्हें जानने-समझने और एक सही अंजाम तक पहुंचाने के लिए सार्थक जमीन भी मुहैया करायी है।
तेरा संगी कोई नहीं : मिथिलेश्वर; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद; 350 रुपए।

सलीब पर सच
सुभाष राय की कविताएं जीवन की लय पर थिरकती, मचलती, मंथर गति से चलती और गुनगुन करती हैं। उनमें सुंदर को तलाशने, रोपने, उगाने और विकसित करने की चाह हर कदम दिखती है। इसलिए जब वे असुंदर पर भी लिखते हैं, तो वह विद्रूप होकर नहीं, वितृष्णा पैदा करता हुआ नहीं, बल्कि कोई सुंदर मुलायम रेशा उम्मीद का लिए आता है, झलक जाता है। बहुत सहज और सधे ढंग से वे शब्दों को चुनते हैं और बड़ी कुशलता से उन्हें सही जगह रखते हुए बातों का सिरा आगे बढ़ाते चलते हैं। किताब के शुरू में सुभाष राय कहते हैं कि कविता मेरे भीतर प्राण की तरह बसती है। यानी कविता उनके लिए जीवन की लय है। इसलिए उनकी कविताएं कहीं हड़बड़ी में या बहुत कोई बड़ी बात कहने की हुड़क में कहीं तल्ख नहीं होतीं, कहीं नारे की तरह मुट्ठी तानने का प्रयास नहीं करतीं या कभी किसी राजनीतिक बयान में तब्दील नहीं हो जातीं। वे कविताएं हैं और अपने पूरे स्वभाव में कविताएं हैं। वे अपनी पहली ही कविता में कहते हैं कि- ‘मेरा परिचय उन सबका परिचय है/ जो सोए नहीं हैं जनम के बाद।’ यह गहन संवेदना और व्यंजना है। जब वे राजनीतिक स्थितियों पर टिप्पणी करते हैं, तब भी कविता की स्वाभाविक बनावट, उसकी मुलायमियत कहीं नष्ट नहीं होती। जब वे कहते हैं कि ‘मुझे पसंद नहीं है/ फूलों का मनमाने रंगों में खिलना’ तो वे सहज ढंग से विडंबना को उभारते हैं, बिना किसी तल्खी के।


सलीब पर सच : सुभाष राय; बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर; 120 रुपए।

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