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इतिहास में गुम एक संघर्ष

थेरी गाथा बुद्ध साहित्य का प्रमुख अंग तो है ही, नारी-मुक्ति के आंदोलन और स्त्री विमर्श के लिए भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।

Author January 29, 2017 12:45 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

आज जब स्त्री आंदोलनों का एक पूरा दौर बीत चुका है और अब उसकी पुनर्व्याख्या भी की जा रही है, मुख्यतया स्त्री अध्ययन की बुनियाद के रूप में भक्ति आंदोलन को रेखांकित किया जाता है। अंडाल, पद्मावती (रामानंद की शिष्या) और मीरा के क्रांतिकारी स्वर इस अध्ययन का बीज माने जाते हैं। यह ठीक है कि इनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता, पर इन्हीं सबके बीच एक आवाज उन थेरियों की भी है, जिन्होंने धारा के विपरीत बहने का सफल प्रयत्न किया। अगर उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर इन थेरी गाथाओं का अध्ययन किया जाए तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय संदर्भों में यही स्त्री मुक्ति की पहली आवाज थी।
थेरी गाथा बौद्ध साहित्य का प्रमुख अंग है। बौद्ध धर्म के त्रिपिटकों में सुत्तपिटक का अलग महत्त्व है। सुत्तपिटक का एक भाग खुद्दक निकाय है। इसी निकाय में थेरीगाथाएं संग्रहित हैं। बुद्ध द्वारा निर्मित संघ में जो स्त्री प्रव्रज्या प्राप्त कर लेती थी वह थेरी कहलाती थी। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध की मौसी गौतमी अपने साथ लगभग पांच सौ स्त्रियों को लेकर प्रव्रजित हुई थीं। कुछ समय बाद इन भिक्षुणियों का अलग ही संघ बन गया। संघ की तिहत्तर थेरियों की लगभग पांच सौ गाथाओं को ही थेरीगाथा कहा गया। थेरीगाथा को खुद्दक निकाय के पंद्रह ग्रंथों में स्थान दिया गया है।

थेरियों की इन गाथाओं को स्त्रीजाति के प्रतिरोध का पहला स्वर कहा जा सकता है। यह ऐसा स्वर है, जिनमें स्त्रियों की अपनी अलग दुनिया है, उनके सुखों की अनुभूति है, दुखों का गान है, पीड़ा है, तड़प है, मुक्ति की चाह है तो मोक्ष प्राप्त करने की तीव्र आकांक्षा भी है। अपने बुरे कर्मों की स्वीकारोक्ति तो है ही, उनका पश्चाताप करने की उग्रता भी है। जीवन के सभी रंग इन गाथाओं में दिखाई देते हैं। इन गाथाओं के माध्यम से तत्कालीन समाज की रीतियों-कुरीतियों, आचारों-अनाचारों पर प्रकाश पड़ता है। ऐसे समय में जबकि स्त्री लेखन को अतिशय भावुकता और कल्पनाशीलता के आधार पर वैचारिक लेखन से दूर माना जाता है, ये गाथाएं अतिशय भावात्मक न होकर वैचारिक धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं।
तत्कालीन भारतीय सामाजिक परिवेश में बुद्ध द्वारा स्त्रियों को संघ में प्रवेश की अनुमति देना बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था। यद्यपि यह भी सत्य है कि पहले बुद्ध भी स्त्रियों के संघ में प्रवेश के खिलाफ थे और प्रारंभ में उन्होंने भी स्त्रियों को संघ में शामिल करने का निषेध किया। वे मानते थे कि स्त्रियों का संघ में प्रवेश उचित नहीं है, इससे संघ भ्रष्ट हो जाएगा। ऐसे समय में उनके भाई आनंद नें उनका हृदय परिवर्तन किया, तब उन्होंने अपनी मां गौतमी को संघ की पहली भिक्षुणी के रूप दीक्षा दी। तत्कालीन विषम परिस्थितियों में बुद्ध का यह कदम समाज के साथ बहुत बड़ा विद्रोह था।

विशेष बात यह थी कि स्त्रियों द्वारा संघ में प्रवेश लेने का कोई कड़ा नियम नहीं था। समाज के प्रत्येक वर्ग को इसमें समान रूप से भागीदारी करने की स्वतंत्रता थी। जो स्त्री इसमें स्वेच्छा से प्रवेश लेना चाहे उसके लिए कोई बंधन नहीं था। वह विवाहित हो या अविवाहित, वृद्धा हो या बालिका, किसी भी अवस्था में संघ में प्रवेश ले सकती थी। चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग की हो, अमीर हो या गरीब, गणिका हो या वेश्या, बुद्ध ने सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दिए।  संघ में प्रवृज्या प्राप्त स्त्रियां केवल उच्चकुल या प्रतिष्ठा प्राप्त कुलीन घरों की नहीं थीं, बल्कि एक बड़ा वर्ग उन स्त्रियों का भी था जो समाज के निम्न वर्ग से आती थीं। इनमें राजवंश और शाक्यकुल के साथ ही दास, बहेलिया, वेश्या, गणिका आदि से लेकर समाज के दीन-हीन परिवारों की महिलाएं तक संघ में शामिल थीं। संघ में प्रवेश से उनमें नवीन आत्मविश्वास का संचार हुआ और अपना स्त्रीत्व उनके लिए गौरव का विषय बन गया। जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के आधार पर विभाजित समाज में एक ऐसे संगठन की परिकल्पना ही आश्चर्यचकित कर देती है, जिसमें इस प्रकार की भिन्नताओं को सहज सामान्य रूप में स्वीकारोक्ति मिली हो।

एक ऐसे समाज में जहां नारीत्व पूरी तरह से अभिशाप बन गया था और स्त्री एकमात्र भोग्या रूप में पहचानी जा रही थी, ये थेरियां मुक्ति और स्वतंत्रता की बात कर रही थीं। भिक्खुणी सुमंगल के कथन ‘मैं मुक्त नारी हूं! मेरी मुक्ति कितनी धन्य है!’ ने स्त्रियों में नई चेतना का संचार किया। भिक्षुणी सोया मानती हैं कि ज्ञान प्राप्ति में स्त्री होना किसी भी प्रकार से बाधक नहीं है। वह कहती है- ‘जब चित्त अच्छी तरह समाधि में स्थित है, ज्ञान नित्य विद्यमान है और अंतर्ज्ञान पूर्वक धर्म का सम्यक दर्शन कर लिया गया है, तो स्त्रीत्व इसमें हमारा क्या करेगा।’
राजपुत्री सुमेधा थेरी अपने माता-पिता के विरुद्ध जाकर संघ में प्रवेश लेती है और अपने पिता से निर्भीक होकर कहती है- ‘मैं तो प्रव्रजित होऊंगी। बार-बार जन्म लेने में क्या सार है? मैं प्रव्रज्या ही लूंगी या अपने प्राणों को त्याग दूंगी, यही मेरा एक वरण है।’

जिस मुक्ति पर सदियों से पुरुष का आधिपत्य था वह अब स्त्रियों को भी सुलभ थी। मुत्ता थेरी बेबाकी से कहती है कि ‘मैं आज जाति और मरण से भी मुक्त हो गई हूं। मेरी संसार-तृष्णा ही समाप्त हो गई है।’ विमला भिक्षुणी वैशाली में पैदा हुई गणिका थी। पद्मावती और आम्रपाली नगर की गणिकाएं थीं। पूर्णिका एक दासी की पुत्री थी। सुमंगला भिक्षुणी थी। ये सभी सामाजिक विषमताओं को त्याग कर एक ही पवित्र उद्देश्य से प्रेरित होकर संघ की सदस्याएं बन गई थीं। इन सभी के संघ में प्रवेश के कारण अलग-अलग थे। कुछ का उद्देश्य परम शांति की प्राप्ति था, तो कुछ मोक्ष प्राप्ति के प्रति कृतसंकल्प थीं।  अभी तक हिंदू धर्म में सभी अधिकारों का भोक्ता एकमात्र पुरुष हुआ करता था। घर-परिवार से लेकर बाहर के सभी निर्णयों पर एकमात्र उसी का अधिकार था। स्त्रियों के लिए ज्ञान प्राप्त करना वर्जित था। स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर-गृहस्थी ही माना जाता था। ऐसी सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों के आत्मबल की बात करना भी बेमानी हो जाती है। पर इन थेरियों की गाथाओं में आत्मविश्वास से लबरेज अभिव्यक्ति दिखाई देती है। इन अभिव्यक्तियों से पहले स्त्री के स्त्रीत्व को लेकर इतना ऐसी स्वीकारोक्ति मिलना दुर्लभ है।

थेरी गाथा बुद्ध साहित्य का प्रमुख अंग तो है ही, नारी-मुक्ति के आंदोलन और स्त्री विमर्श के लिए भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। भारतीय साहित्य में स्त्री अस्तित्व के स्वातंत्र्य की इतनी बेबाक स्वीकृति इससे पहले कहीं नहीं दिखाई देती। स्त्री कोई पराधीन जीव नहीं, बल्कि स्वाधीनता की चेतना से परिवेष्ठित है। इन थेरियों ने जिस साहस के साथ संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त समाज के विरुद्ध आवाज उठाई वह आज भी प्रेरणास्रोत है। थेरी गाथाएं तत्कालीन समाज में स्त्री की स्थिति की समझ के लिए महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, जो स्त्री जगत को न केवल मानसिक और शारीरिक, बल्कि बौद्धिक और आर्थिक गुलामी के प्रति विद्रोह की शिक्षा देती हैं। ये थेरी गाथाएं भारतीय समाज की शोषित और पीड़ित स्त्रियों की उन्मुक्त कथा है। इतिहास गवाह है कि आज तक जिस किसी ने भी समाज की चली आ रही व्यवस्था, उसके मूल्य और परंपराओं के विरुद्ध आवाज उठाई है, उसे क्रांतिकारी कहा गया है। इस दृष्टि से ये थेरियां भी क्रांतिकारी कही जा सकती हैं। यह संघर्ष-गाथा आज भले इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हैं, पर यह निश्चित है कि आने वाले समय में जब कभी स्त्री संघर्ष की बात की जाएगी, इन थेरियों का जिक्र अवश्य किया जाएगा, क्योंकि यही विद्रोह की वह पहली दबी आवाज थी, जिसने आज विमर्श का रूप ले लिया है। ०

 

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