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विमर्श- सिकुड़ता लेखक-पाठक संबंध

पिछले लंबे अरसे से यह समस्या साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति को परेशान किए है कि आम पाठक साहित्य से कट गया है और साहित्य उसकी प्राथमिकताओं में नहीं है।

Author December 3, 2017 5:51 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

शंभु गुप्त 

साहित्य और पाठक के बीच का रिश्ता बहुत आत्मीय और अन्योन्याश्रित होता है। साहित्य जब भी सबसे पहले आया होगा, श्रोता उसके सामने जरूर उपस्थित रहा होगा। बाद में जब साहित्य लिपिबद्ध हुआ और छापाखाना आया, श्रोता की जगह पाठक ने ले ली होगी। आज साहित्य अधिकतर सुना नहीं, पढ़ा जाता है, फिर भी कविता या कहानी की वाचिक परंपरा आज भी लगातार जीवित है। कविता या कहानी को उसके लेखक के मुंह से सुनना आज भी हमें रुचिकर लगता है और आए दिन काव्य-गोष्ठियां और कवि-सम्मेलन आयोजित होते रहते हैं। कवि/ कहानीकार के मुंह से उसकी रचना सुनना रचना-वस्तु के संप्रेषण का अलग ही कोण निर्मित करता है। साहित्य की दो प्रक्रियाएं होती हैं। एक रचना-प्रक्रिया और दूसरी अधिगम-प्रक्रिया। पहली का संबंध लेखक से है और दूसरी का पाठक से। ये दोनों प्रक्रियाएं परस्पर गहरे जुड़ी हैं। इनकी समांतरता एक-दूसरे को समृद्ध करती है। यह समृद्धि कथ्य के स्पष्ट और मजबूत होने के लिए होती है। यह वास्तविकता है कि एक रचना के संपूर्ण संप्रेषण में लेखक के साथ-साथ पाठक और श्रोता की भी बराबर की भूमिका होती है। मुक्तिबोध ने कला के दूसरे क्षण में खुद रचना-प्रक्रिया में पाठक की उपस्थिति का संकेत किया है। यह प्रक्रिया आगे बढ़ती हुई लेखक को संचालित करती और एक जनोन्मुख शिल्प की आधारभूमि बनती नजर आती है। रचना-प्रक्रिया में पाठक की उपस्थिति रचना को वस्तु और अंतर्वस्तु दोनों स्तरों पर गहरे प्रभावित करती है। लेखक यहां खुद को अपनी रचना के पाठक के रूप में भी कल्पित करता चलता है।

पिछले लंबे अरसे से यह समस्या साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति को परेशान किए है कि आम पाठक साहित्य से कट गया है और साहित्य उसकी प्राथमिकताओं में नहीं है। आज तो बदतर स्थिति यह है कि लेखक-लेखिकाएं ही एक-दूसरे को पढ़ते रहते हैं। आम लोगों को साहित्य में कोई रुचि नहीं है। उत्तर भारत और खासकर हिंदीभाषी प्रदेश में यह स्थिति ज्यादा है। गैर-हिंदी क्षेत्रों में लेखक सामान्यतया वहां की जातीय स्मृति का हिस्सा रहे हैं। हिंदी में ऐसा औसतन सबसे कम है। लेखक और पाठक के रिश्तों पर जब हम विस्तार में जाते हैं तो एक बड़ा पेचीदा सवाल हमसे रूबरू होता है कि हम साहित्य कैसे पढ़ें? साहित्य को पढ़ने के तरीके क्या और कौन-से हो सकते हैं? यहां हमारा सामना साहित्य के अभिग्रहण और प्रतिनिधित्व से संबंधित सिद्धांतों से होता है। साहित्य का ‘रिसेप्शन’ और साहित्य में ‘रिप्रेजेंटेशन’ संबंधी सिद्धांत और उन पर हुई बहसें। खासकर सबाल्टर्न स्टडीज और हाशिए के समाजों के यथार्थ के संदर्भ में। साहित्य में हाशिए के समाजों- स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और दूसरे कुछ और समाज; जिन्हें कथित राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया में लगातार हीनता और हतोत्साह की स्थितियों में डाला जाता रहा- के प्रति लेखक-लेखिकाओं का रवैया क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सवर्णवादी-ब्राह्मणवादी-पुरुषवादी-वर्चस्ववादी धारणाएं-अवधारणाएं अब भी प्रच्छन्न रूप से हमारे साथ छाया की तरह लगी हैं और हम जाने-अनजाने उन्हें आगे बढ़ाने के काम में लगे हैं!
यह साहित्यालोचन की गंभीरतम मुश्किलों में से एक है कि हम यह देख सकें कि लेखक या लेखिका अपनी रचनाओं में इन मामलों में कहां-कहां गच्चा खाते हैं! हिंदी में या तो ऐसी आलोचना-पद्धति और सैद्धांतिकी विकसित ही नहीं हुई और थोड़ी-बहुत विकसित भी हुई तो उसे लागू नहीं किया गया। हालांकि इसे विकसित और लागू करने के अपने खतरे हैं। क्योंकि कोई भी व्यक्ति सोलहों आने सच होने का दावा कतई नहीं कर सकता। हर व्यक्ति हमारी इसी राजनीतिक और समाजार्थिक व्यवस्था से निकल कर आया है।

उसके सामाजिकीकरण और सांस्कृतिकीकरण की प्रक्रिया इसी समाज और संस्कृति का पुनरुत्पादन है। यह सच है कि विचार, अवधारणा, सिद्धांत, आदि के रूप में औरों से हम बहुत-कुछ आयत्त करते हैं, लेकिन एक भयावह सच यह भी है कि हम अपने मूलबद्ध संस्कारों से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाते। जाने-अनजाने ये संस्कार हमारी कविता-कहानियों में आ ही तो जाते हैं! इनसे कैसे मुक्त हुआ जाए और कैसे हम डिकास्ट, डिक्लास, डिजेंडर हो सकें! ब्राह्मणवादी साम्यवाद या ब्राह्मणवादी दलितवाद या ब्राह्मणवादी स्त्रीवाद हमारे ही बीच से पैदा हुए प्रत्यय हैं। ये प्रत्यय दोगलेपन से भरी हमारी सामाजिकीकरण और सांस्कृतिकीकरण की प्रक्रिया की गवाही देते हैं। व्यक्तिगत जीवन में अगर थोड़े-से भी हम बेईमान हैं तो हमारी रचना में कहीं न कहीं किसी न किसी तरह वह झलक मारेगी, उभर कर सामने आएगी और हमें मुंह बिराएगी। हम उससे बच नहीं सकते। प्राय: हर जाति, वर्ग और जेंडर से जुड़े लेखक-लेखिका के लिए यह सच है। यह एक प्रकार का भीषण आत्मसंघर्ष है, जिससे हर स्त्री-पुरुष रचनाकार को अनिवार्यत: गुजरना होता है। इस आत्मसंघर्ष में कहीं न कहीं, कभी न कभी हम गच्चा खाते ही हैं, इसलिए ‘परकाया-प्रवेश’ वाली रचना-प्रणाली धीरे-धीरे अविश्वसनीय होती चली गई। ‘सहानुभूति’ और ‘समानुभूति’ वाली बहस इस दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस बहस का कुल नतीजा यह रहा कि जो जिस जाति, वर्ग और जेंडर से ताल्लुक रखता है, उसकी सबसे प्रामाणिक और ईमानदार तस्वीर केवल वही दे सकता है।

हाशिए के समाजों की वैचारिकी और रचना उन्हीं के बीच से पैदा हो, यही श्रेयस्कर है। पर जैसा कि हम देखते हैं और जैसा पिछले दिनों हुआ है, दलित, स्त्री, आदिवासी, अल्पसंख्यक, निर्वासित आदि की मानसिकता अनेकानेक वर्चस्ववादी मानसिकताओं, प्रथाओं, परंपराओं, मिथकों, चरित्रों आदि से अंदर तक भारी संक्रमित हुई है। हमें स्पष्टतया और दो-टूक रूप से इस सवाल से जूझना होगा कि वे कौन-से कारण और उपादान हैं, जो एक दलित रचनाकार की रचना को दलित ब्राह्मणवाद की ओर ले चलते हैं। वे कौन-से तत्त्व और अंतर्दृष्टि हैं, जो एक स्त्री-रचनाकार में ‘मेल गेज’ को हावी होने से रोक नहीं पातीं! इसी तरह आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि रचनाकारों पर भी बात की जा सकती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे लिखे का ज्यादा असर इसलिए नहीं हो पाता कि हम इस दृष्टि से अपने बारे में कभी विचार ही नहीं करते। हम अपने वैचारिक ‘मूसेड़’ में इस कदर दुबके रहते हैं कि हम यह देख ही नहीं पाते कि यथार्थ में नए परिवर्तन क्या हो रहे हैं या किस नए संक्रमण की चपेट में लोग आ गए हैं। खासकर हाशिए के समाजों के साथ यह ज्यादा होता है, क्योंकि उन पर कब्जा करने की वर्चस्ववादी तबकों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। उनकी दुरभिसंधियां ज्यों की त्यों जारी हैं और नए-नए पैंतरों के साथ, नए-नए संस्करण में नमूदार हो आती हैं। रचनाओं में ये पैंतरे तभी आ पाएंगे जब लेखक-लेखिकाएं इनके प्रति अपडेट होंगे। पाठक जब इन रचनाओं को पढ़ेंगे, तो वे भी अपडेट होंगे।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि साहित्य के पाठक कम हुए हैं। इसके और भी अनेक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक कारण हैं। राज्य की सांस्कृतिक नीतियां, समकालीन राजनीतिक अर्थशास्त्र, देशज परंपराएं, आम जनता की इतिहास-दृष्टि आदि। पर इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि रचना और रचनाकार उसे कितना और कैसे आकर्षित करते हैं! हिंदी में ही ऐसे अनेक लेखक हैं, जिन्हें पाठकों ने इतना प्यार दिया कि बड़े से बड़े पुरस्कार भी उसके सामने फीके पड़ गए। अनेक रचनाएं हिंदी में ऐसी हैं, जिनके अनगिनत संस्करण आ गए हैं और वे अब भी पढ़े जाने की क्रमिकता में हैं। ये रचनाएं यह सिद्ध करती हैं कि लेखक पाठक के अभिग्रहण और प्रतिनिधित्व की अपेक्षाओं को संतोषजनक ढंग से पूरा कर रहा है। लेखक ने अपने जाति, वर्ग, जेंडरगत और अन्य अंतर्निषेधों पर जीत हासिल कर ली है और एक वैकल्पिक राजनीतिक और सामाजिकार्थिक व्यवस्था की पहलधर्मी प्रस्तावना दे सकने की स्थिति में वह है।

 

 

 

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