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तीरंदाजः अंतर मांही गुरु

गुरु व्यक्ति नहीं, तत्त्व है जो हर व्यक्ति में निहित है। यह तत्त्व व्यक्ति को ईश्वरीय सिद्धांत और प्राकृतिक आचार से जोड़ता है। यह एक विशिष्ट योग प्रक्रिया भी है, जो हमारी दैनिक क्रियाओं में, सुप्त अवस्था में सम्मिलित रहती है। इसको सक्रिय करने पर गुरु-ज्ञान प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो जाता है।

वेद-पुराण-उपनिषदों आदि पर उन्होंने गुरुजी के हजारों व्याख्यान सुने थे और हर बार बड़े प्रभावित होकर बाताते थे कि गुरुजी आलौकिक रूप से ज्ञानी इंसान हैं।

गुरु व्यक्ति नहीं, तत्त्व है। यह विवेचना अष्टावक्र गीता में दी हुई है। साफ है कि ज्ञान, जीवन-दिशा और जिंदगी की उलझनों को सुलझाने के लिए अगर हमें किसी तलाश में निकलना है तो वह यात्रा अपने से बाहर नहीं, बल्कि अपने अंदर करनी पड़ेगी, क्योंकि अपने में निहित तत्त्व को बाहर खोजना व्यर्थ है। कुछ दिन पहले मुझे एक पुराने दोस्त मिले। सालों पहले उन्होंने अपने लिए एक गुरु की पहचान कर ली थी और अपने को उनकी सेवा में समर्पित कर दिया था। वे नियमित रूप से उनके आश्रम जाते थे, उनका प्रवचन बड़ी श्रद्धा से सुनते थे और गुरु की हर बात को वे पत्थर की लकीर मानते थे।

वेद-पुराण-उपनिषदों आदि पर उन्होंने गुरुजी के हजारों व्याख्यान सुने थे और हर बार बड़े प्रभावित होकर बाताते थे कि गुरुजी आलौकिक रूप से ज्ञानी इंसान हैं। उनका दिन गुरुजी से ही शुरू होता और उन पर ही खत्म होता था। मुझे अक्सर लगता था कि मित्र अपने काम और परिवार में समय बहुत कम लगाते हैं और गुरुजी पर बहुत ज्यादा। पर वे इतने समर्पित थे कि उनसे यह बात कहना मैंने ठीक नहीं समझा था। अबकी बार जब वे मित्र मिले तो अपने गुरु से बड़े निराश थे। बोले, मैंने आश्रम जाना छोड़ दिया है, कोई फायदा नहीं मिला मुझे। उनके अनुसार गुरुजी के होते हुए भी उनकी नौकरी में दिक्कतें आती रही थीं और घर-परिवार में भी टूटन आ गई थी। उन्होंने गुरुजी से तरह-तरह के उपाय करवाए थे, जिससे उनके निजी जीवन की परेशानियां दूर हो सकें, पर सब व्यर्थ गया था। उपायों से चमत्कारी फायदा होने के बजाय नुकसान हुआ था। वे बड़े असमंजस में थे कि इतने ज्ञानी-ध्यानी होने के बावजूद गुरुजी के नुस्खे क्यों चल नहीं पा रहे थे।

उन्होंने गुरुजी से पूछा भी था। ‘तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्म बाधा हैं’, उन्होंने बताया था। और गुरुजी का रोग निदान सुन कर जो उन्हें झटका लगा था, उससे वे आश्रम त्याग कर पुन: अपने निजी जीवन से जुड़ गए थे। गुरुजी से हट कर वे दफ्तर के काम में जुट गए और परिवार के साथ समय बिताने लगे थे। दोनों ही जगह उनकी स्थिति सुधरने लगी थी। दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर ले लिया था, अपनी समस्याओं के निदान के लिए खुद को सक्षम बनाने के लिए तैयार कर लिया था। उन्हें अब गुरुजी की जरूरत नहीं थी। वे समझ गए थे कि मात्र गुरु के आशीर्वाद और सत्संग से कुछ नहीं होना था, क्योंकि गुरु-आश्रित होकर वे कर्म करने से बच रहे थे।

पर इस उदहारण का मतलब यह नहीं है कि गुरु का महत्त्व नहीं है। जो अध्यात्म का मार्ग अपनाना चाहते हैं उनके लिए गुरु का होना उतना ही जरूरी है, जितना एक बच्चे के लिए स्कूल जाकर अपने अध्यापक से क, ख, ग सीखना और फिर धीरे-धीरे पूर्ण शिक्षा प्राप्त करना। गुरु की महिमा हमारे शास्त्रों में वर्णित है। उस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। हम और आप अपने सामान्य जीवन में भी देख सकते हैं कि हमारी सोच और क्रिया को अध्यापकों ने प्रभावित किया है, उसको आकार दिया है। ऐसे गुरुओं के प्रति श्रद्धा और समर्पण स्वाभाविक है।

शायद औपचारिक शिक्षा-व्यवस्था, जहां एक तरफ हमें सामान्य जीवन जीने की लिए बुनियादी कौशल से लैस करती है (जिसका अच्छी नौकरी हासिल करना एकमात्र लक्ष्य है), तो दूसरी तरफ हमें व्यावहारिक और भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं करती है। अमूमन हम पहली विपरीत परिस्थिति के उत्पन्न होते ही घबरा जाते हैं और अपने किए की जिम्मेदारी अपने पर न लेकर उसे भगवान पर लाद देते हैं या फिर किसी ‘चमत्कारी गुरु’ की शरण में चले जाते हैं। हम अपने पर, अपनी क्षमता पर भरोसा नहीं करते हैं, बल्कि किसी और से प्रार्थना-याचना करने लगते हैं कि वह हमारे संकट को टाल दे।

अगर समाज में डरे-सहमे, आत्मविश्वास-हीन व्यक्तियों की संख्या रोज बढ़ रही है, जो कि डेरे-आश्रमों की तरफ अपना रुख कर रहे हैं, तो यह समाज की गिरती गुणवत्ता का सबूत है। यह प्रकट करता है कि व्यक्ति, और ऐसे व्यक्तियों से मिल कर बना उनका समाज, उधार की जिंदगी जीने का आदी हो गया है। उसमें न तो आत्मविश्वास है और न ही बुनियादी समझ, कि दैविक शक्तियां उनके घर के भांडे मांजने नहीं आएंगी, उनको उन्हें खुद ही मांजना होगा। आम लोगों का मार्ग न तो अध्यात्म का है, न ही ज्ञान का। ऐसे में वे भक्ति मार्ग पकड़ लेते हैं, अपनी जिम्मेदारी खुद पर नहीं लेना चाहते हैं। वे अपने पर, दूसरे इंसानों पर, भरोसा करने की मशक्कत नहीं करते और पलायनवादी हो जाते हैं।

वे अपनी चुनौतियों का सामना करने के बजाय भक्ति करने में जुट जाते हैं। ऐसा भक्त-समाज आलसी, निष्क्रिय, निकम्मा, निरंतर भयभीत और विवेकहीन होता है। भगवान सब ठीक करेंगे या फिर गुरुजी की कृपा बनी रहे, कह कर ऐसा समाज अपने मोर्चे पर मुस्तैदी से नहीं डटा रहता है, बल्कि हथियार डाल कर हालात के गुबार में गुम हो जाता है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ईश्वरीय शक्ति में विश्वास करना और उस विश्वास से अपने आत्मविश्वास में वृद्धि करना एक अलग बात है और ईश्वर में विश्वास कर के अपने आत्मविश्वास को ध्वस्त करना एकदम दूसरी बात है। हम अमूमन सब कुछ ईश्वर/ गुरु को सौंप कर दूसरी बात पर ही अमल करते हैं, पर इसे स्वीकार नहीं करते हैं।

पाखंडी गुरुजन इसीलिए भक्त बनने पर जोर देते हैं। वे हमें निरंतर भक्ति मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं और हमको विवेकहीन, क्रिया-कर्मविहीन बनाने के लिए तमाम प्रयोजन रचते हैं। हमें निरीह और आश्रित बना देते हैं, जबकि सच्चा गुरु शिष्य में ज्ञान उत्पन्न करके उसे अपनी चुनौतियों से युद्ध करने के लिए सक्षम कर देता है। गुरु व्यक्ति नहीं, तत्त्व है जो हर व्यक्ति में निहित है। यह तत्त्व व्यक्ति को ईश्वरीय सिद्धांत और प्राकृतिक आचार से जोड़ता है। यह एक विशिष्ट योग प्रक्रिया भी है, जो हमारी दैनिक क्रियाओं में, सुप्त अवस्था में सम्मिलित रहती है। इसको सक्रिय करने पर गुरु-ज्ञान प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो जाता है। हम अपने आप को खुद दीक्षा दे सकते हैं।

दीक्षा शब्द दिक् से उत्पन्न है, जिसका मतलब दिशा देना है। दीक्षा मंत्र के माध्यम से दी जाती है, यानी मंत्र से उर्जा का हस्तांतरण होता है। खुद को मंत्र दें, दिशा और उर्जा पाएं। गुरु-तत्त्व से जुड़ें। ऐसा करने पर अपने में निहित सर्वशक्तिमान, सर्व-भूत, सर्वज्ञ ईश्वर स्वयं प्रकट हो जाएगा।

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