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बदला जमाना बदले खेल

यही वजह है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से कुछ अलग करती, करने का प्रयास करती, कुछ नया तलाशती-रचती-बरतती है। इसी वजह से खेल भी बदलते रहे हैं।
Author January 14, 2018 05:34 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

विकास जीवन का अनिवार्य चक्र है। यही वजह है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से कुछ अलग करती, करने का प्रयास करती, कुछ नया तलाशती-रचती-बरतती है। इसी वजह से खेल भी बदलते रहे हैं। खेलों के रंग-ढंग बदलते रहे हैं। गिल्ली-डंडा, कंचा-गोली, छुपम-छुपाई जैसे खेल एक समय बच्चों के प्रिय खेल हुआ करते थे। उनसे बच्चों का शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य दुरुस्त रहता था। मगर बदले जमाने में सूचना क्रांति के चलते खेलों ने भी संचार माध्यमों में अपनी घुसपैठ बना ली है। वीडियो गेमों का ऐसा चलन बढ़ा है कि बच्चे मैदानों में खेलने के बजाय घरों में दुबके रह कर अकेले ये खेल खेलते रहते हैं। इनका बच्चों के शरीर और मन पर क्या और कैसा असर पड़ रहा है विश्लेषण कर रही हैं नाज़ ख़ान।

समय के साथ कदमताल करती तकनीक ने जहां हर काम को आसान बनाया है, वहीं आदमी के सामने कुछ मुश्किलें भी खड़ी की हैं। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव ‘बचपन’ पर पड़ा है। एक ऐसी अवस्था में जब बच्चे सबसे ज्यादा अपने परिवार, समाज और दोस्तों के करीब होते हैं, वे अब अकेलेपन के शिकार होकर तकनीक के वशीभूत होते जा रहे हैं। कभी खेल के मैदान में घंटों समय बिताने वाले बच्चों को दोस्तों, साथियों की जगह कंप्यूटर और मोबाइल गेम का साथ भा रहा है। उनकी दुनिया मोबाइल, कंप्यूटर पर उपलब्ध खेलों तक ही सीमित हो गई है। साथी, दोस्त की कमी तकनीक ने ले ली है। इसके गंभीर नतीजे भी सामने आ रहे हंै। तकनीकी खेलों ने न सिर्फ बच्चों को एक सीमित दायरे का कैदी बना कर रख दिया है, बल्कि वे कई तरह की मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार भी बन रहे हैं।  बीते करीब डेढ़ दशक में बच्चों के खेलने के तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। आज करीब नब्बे फीसद बच्चे परंपरागत खेलों के बजाए टीवी, इंटरनेट, आॅनलाइन या आॅफलाइन गेम के साथ समय बिताते हैं। पहले जहां लुकाछिपी, गिल्ली डंडा, रस्सी कूद, क्रिकेट, फुटबाल, पतंग उड़ाने जैसे पारंपरिक खेल बच्चों को लुभाते थे, वहीं अब वे इंडोर गेम के प्रति ज्यादा आकर्षित हैं। शारीरिक व्यायाम और एकाग्रता वाले खेलों की जगह अब बच्चे हिंसक खेल ज्यादा पसंद करने लगे हैं। इससे उनका मानसिक और शारीरिक विकास बाधित हो रहा है और समाज से वे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं।

ज्यादा समय नहीं बीता जब बच्चों को किसी टॉफी, समोसे से बहलाना आसान था। बच्चों की जिद दायरे में थी। खुले मैदानों में बच्चे हो-हल्ला करते थे। मगर नब्बे के दशक के बाद से गैजेट्स का जमाना आया और बच्चों की इच्छाएं इन्हीं तक सीमित हो गर्इं। कमसिन हाथों में स्मार्टफोन दिखाई देने लगा। कुछ विशेषज्ञ स्मार्टफोन को एक ग्राम कोकीन के बराबर मानते हैं। यानी अपने बच्चे को स्मार्टफोन देना किसी नशे की लत को लगाने के बराबर है। जहां आज इससे बचपन बहल रहा है, वहीं कुछ समस्याएं भी पनप रही हैं। ‘बचपन’ पहले के मुकाबले कहीं पहले बड़ा हो गया है। कमसिनी में ही बच्चे हिंसक खेलों की दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। इन खेलों का सबसे बुरा प्रभाव यह है कि अब बच्चों का रुझान सामूहिक खेलों के बजाय अकेले खेले जाने वाले खेलों की तरफ ज्यादा हुआ है। इससे उनमें अकेलेपन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। बच्चों में खेल भावना खत्म और उनमें एक तरह की हिंसक प्रवृत्ति जन्म ले रही है। हालांकि इसके लिए सिकुड़ते खेल मैदान और कुछ हद तक माता-पिता का इस शंका से ग्रस्त रहना कि उनके बच्चे बाहर ज्यादा खेलेंगे तो बिगड़ जाएंगे जैसी सोच भी जिम्मेदार है। मगर पिछले साल ब्लू वेल जैसे घातक गेम की वजह से जब बच्चे लक्ष्य को पूरा करने को जान देते नजर आए तो ऐसे खेलों को लेकर नजरिया और गंभीर हो गया। वहीं आए दिन क्लास में बच्चों की हिंसक होते झगड़े और हत्या जैसी खबरों, बढ़ते बाल-अपराध ने भी इस ओर सोचने को मजबूर किया है।

दरअसल, शुरू से ही वीडियो गेम बच्चों की मानसिकता को हिंसक बनाते रहे हैं। इस संबंध में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी बड़ी वजह है बच्चों का ज्यादातर समय टीवी, वीडियो गेम और कंप्यूटर के संपर्क में रहना है। बच्चे इन गैजेट्स में जो भी देखते हैं, उसे कॉपी करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उनका जीवन घर और स्कूल तक ही सीमित होता है ऐसे में इसका असर भी इन्हीं जगहों पर ज्यादा देखने को मिलता है। इस तरह की मनमानी उन्हें हिंसक और निरंकुश बना रही है। लगातार हिंसक खेलों के संपर्क में रहने की वजह से बच्चे कमसिनी में ही संवेदनशीलता खोने लगते हैं। अक्सर खेलों को दृश्य रूप में देख कर बच्चे खुद को उस खेल का हिस्सा समझते हैं। ऐसे में ऐसे नकारात्मक खेल उन पर हावी हो जाते हैं और वे हिंसक होकर एक तरह की प्रतिस्पर्द्धा करने लगते हैं। उन्हें दूसरों को पीड़ित देख कर अच्छा लगता है। इस प्रवृत्ति का ज्यादा शिकार लड़के बनते हैं। लड़के कहीं न कहीं रचनात्मकता से दूर और काल्पनिक खेलों के दायरे में कैद होकर रह गए हैं। वे घंटों अकेले बैठ कर इनडोर गेम खेलते हैं। ऐसे में इसका असर भी व्यापक स्तर पर देखने को मिलता है। देश-विदेश की ऐसी कई घटनाएं सामने आर्इं, जिनमें घंटों बैठ कर गेम खेलना बच्चों की मृत्यु का कारण बना। कुछ अध्ययनों में सामने आया कि जो बच्चे ज्यादातर समय हिंसक वीडियो गेम खेलने में बिताते हैं, उनके लिए हिंसक तस्वीरों को देखना अन्य बच्चों के मुकाबले कहीं आसान होता है। वे इन्हें देख कर विचलित नहीं होते। वे निष्ठुर हो जाते हैं। वे न कोई श्रम करना चाहते हैं और न ही अन्य बच्चों के साथ कोई खेल खेलते हैं। उनमेंं मोटापे जैसी कई शारीरिक समस्याएं बढ़ने लगती हंै। वहीं लगातार स्क्रीन को देखते रहने से उनकी आंखों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा समाज से कटे रहने का प्रभाव भी उनके व्यवहार में नकारात्मक बदलाव ला रहा है।

एक क्लिक पर सब कुछ देखने-पाने की चाह रखने वाले बच्चों में संयम कम हो रहा है। वे बात-बात पर हिंसक और अधीर हो रहे हंै। धैर्य के साथ सीखने की आदत छोड़ते जा रहे हैं।  विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन पर अधिक समय बिताने वाले बच्चे एंग्जाइटी, डिप्रेशन और अटैचमेंट डिसआॅर्डर जैसी मानसिक बीमारियों के शिकार बन रहे हैं। इन खेलों को खेलने वाले बच्चों को अपनी बात मनवाने के लिए हिंसात्मक रवैया अपनाते देखा गया है। उन्हें लगता है कि ऐसा व्यवहार करके वे अपनी बात आसानी से मनवा सकते हैं। कुछ विशेषज्ञ बच्चों को किसी गेम की लत लग जाने को मेडिकल भाषा में ‘आॅब्सेशन’ बताते हैं। वहीं कुछ उन्हें ‘कंडक्ट डिसआॅर्डर’ से ग्रस्त मानते हैं। दरअसल, यह कई सारी व्यावहारिक और भावनात्मक समस्याओं का समूह है, जिसमें बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए हिंसक प्रवृत्ति का सहारा लेता है। दूसरों को परेशान करना, जानबूझ कर किसी को शारीरिक नुकसान पहुंचाना जैसी आदतें उनको मजा देती हैं। हालांकि वास्तविकता यह है कि इस हिंसक प्रवृत्ति के पीछे बच्चा खुद को कहीं ज्यादा असुरक्षित और अकेला महसूस करता है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि तकनीक आधारित खेलों ने बाल मानसिकता पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। पहले यूरोपीय देशों में हिंसक घटनाओं के रूप में इसके दुष्प्रभाव देखने को मिलते थे, लेकिन अब भारत में भी इसके गंभीर नतीजे देखने को मिल रहे हैं। टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले हिंसक कार्टून चरित्रों और खेलों ने बाल मानसिकता को प्रभावित किया है। हिंसक खेल बच्चों को शीघ्र बदला लेने की ओर अग्रसर कर रहे हैं। इस मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी आंकड़े चिंता को बढ़ाते हैं। इनके मुताबिक अत्यधिक मार-धाड़ वाले टीवी चैनल, वीडियो गेम को खेलने वाले ज्यादातर बच्चों का ब्लड प्रेशर सामान्य बच्चों के मुकाबले अधिक पाया गया। दरअसल, इस तरह के यांत्रिक गेम के चलन को बढ़ावा इसलिए भी दिया जा रहा है ताकि कंपनियां ज्यादा मुनाफा कमा सकें। यही कारण है कि हिंसा को प्रदर्शित करने वाले पिस्टल, बंदूक, तलवार जैसे एक से बढ़कर एक खिलौने बाजार में छाए हुए हैं, तो वहीं हिंसक गेम भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं।

‘सुपर मारियो’ से ‘ब्लू वेल’ तक का सफर
इन खेलों से अलग करीब एक दशक पहले वीडियो, मोबाइल गेम की शुरुआत हुई थी। तब ‘सुपर मारियो’ गेम ने बच्चों को बेहद लुभाया था। 2015 में इसे वर्ल्ड वीडियो गेम हॉल आॅफ फेम में भी शामिल किया गया। यह गेमिक उद्योग को उबारने में मददगार रहा है। इस बीच इस तरह के गेम जितने लोकप्रिय होते गए उतने ही सरल से जटिल भी। अभी तक मनोरंजन तक सीमित रहने वाले खेलों ने एक स्पर्द्धा का रूप ले लिया। इसमें तबाही मचाने वाले मान्स्टरको नियंत्रित करने वाला स्मैशी सिटी, किसी बॉल को छेद में डाल कर खेला जाने वाला गोल्फ आइसलैंड, किसी पहाड़ पर फंसे स्कीयर को नियंत्रित करने का गेम स्की सफारी, मोटरसाइकिल ट्रायल पर आधारित गेम ट्रायल्स फ्रंटियर, एक मछली को नियंत्रित करने के लक्ष्य के साथ खेला जाने वाला हंग्री शार्क वर्ल्ड गेम मशहूर रहे हैं। आज इन खेलों की लोकप्रियता इतनी है कि इनमें दर्शाए युद्ध की तर्ज पर फिल्में भी बन रही हैं। ‘लारा क्राफ्ट’, ‘साइलेंट हिल’, ‘वारक्राफ्ट’, ‘नीड फॉर स्पीड’ और ‘मोर्टल कॉम्बेट’ जैसी फिल्में गेम पर आधारित हैं। स्क्रीन पर युद्ध छेड़ने वाले गेम का मानसिक प्रभाव आज इतना बढ़ गया है कि बच्चे इनकी जद में आकर किसी भी तरह की हिंसा करने से नहीं चूक रहे। यहां तक कि वे अपनी जान भी दे रहे हैं। पिछले साल आतंक का पर्याय बना रहा ‘ब्लू वेल’ ऐसा ही गेम है। इसे खेलने वाले कितने ही बच्चे इसका शिकार बने। भारत में भी इसे खेलने वाले कई बच्चों ने इसमें निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के एवज में अपनी जान दे दी। ०

दौर बारिशों का आज भी है, लेकिन उसमें कागज की कश्ती तैराते बच्चे कम ही नजर आते हैं। माहौल बदला तो बच्चों के खेल-खिलौने और शौक भी बदल गए। कभी गिल्ली डंडा, कंचों, लूडो, से होता हुआ बचपन बबल गम चुइंगम, चॉकलेट और वॉकमैन जैसे संगीत छेड़ते साधनों से होता हुआ आज तकनीक आधारित खेलों पर ठहर-सा गया है। मगर आज भी खुले मैदानों में उन अल्हड़ खेलों की सुहानी यादें ताजा हैं-

बोरा दौड़ : किसी बोरी में खड़े होकर कूद-कूद कर अपने लक्ष्य तक पहुंचा जहां कौतुहल पैदा करता है, वहीं स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा की भावना को भी बढ़ाता है।
सांप-सीढ़ी : बच्चों में कभी बेहद लोकप्रिय खेल रहा सांप-सीढ़ी आज कहीं गुम हो गया लगता है। एक समय बच्चे इस खेल के दीवाने हुआ करते थे। एक बोर्ड पर सौ तक लिखी गिनती और जगह-जगह बनी हुई सीढ़ियां, सांप। इसे पासे के जरिए खेला जाता था। इसमें पासा सांप के मुंह में भी पहुंचा सकता था और सीढ़ियों से बुलंदियों पर भी।
पिट्ठू : सात चपटे पत्थर और दो टीमें। इसे खेलने का अपना ही मजा था। बच्चे दो टीमों में बंटकर बच्चे पत्थर पर बॉल मार कर उन्हें गिराते और फिर धमाचौकड़ी शुरू।
घोड़ा बादाम छाई : कपड़े की मदद से खेला जाने वाला यह खेल बच्चों में कौतूहल पैदा करता था। आज बच्चों का बुलंद आवाज शोर, घोड़ा बादाम छाई, पीछे देखी मार खाई कहीं सुनाई नहीं पड़ता।
गिल्ली डंडा : आज भी ग्रामीण इलाकों में यह लोकप्रिय खेल है। एक डंडे की मदद से गिल्ली के सिरे को चोट करके उछालना और फिर दूर गिरी गिल्ली के जरिए स्कोर तय करना इसका नियम है।
छुपम-छुपाई : यह खेल इसलिए भी ज्यादा लोकप्रिय है, क्योंकि इसे बहुत छोटे बच्चे भी खेल सकते हैं। यही वजह है कि अक्सर फिल्मी गीत भी इस पर बने हैं। एक बच्चा आंखें बंद करके खड़ा होता है और अन्य बच्चे कहीं जाकर छुप जाते हैं।
कंचा गोली : शीशे की बनी गोलियों और उंगलियों की मदद से खेला जाता है। एक गड्ढें में कुछ दूरी पर कंचे फेंके जाते हैं। इसमें जिसके पास सबसे ज्यादा कंचे वही विजयी।
चोर-सिपाही : दो टीमों में एक टीम चोर की और एक पुलिस की। चोर की तलाश में जुटी पुलिस टीम जब चोर टीम को पकड़ती है तो बच्चों को बेहद मजा आता है।
आंख-मिचौली : किसी एक की आंखों पर पट्टी बांध कर दूसरे उसे चिढ़ाते हुए इधर-उधर भागते हैं और आंखों पर पटÞटी बांधे बच्चा उन्हें पकड़ने की कोशिश में लगा रहता है। इस खेल को अक्सर बच्चे बड़ों के साथ भी खेलते हैं। इस तरह के सामूहिक खेलों से बच्चों को कई फायदे होते हैं। एक-दूसरे के साथ मिल कर खेलने से बच्चा समाज से जुड़ता है और उसका मानसिक विकास होता है। उसमें टीम वर्क की भावना आती है। इस तरह के खेल उसके शारीरिक अंगों को मजबूत बनाते हैं।

भारत में जहां कबड्डी, कबूतरबाजी जैसे पारंपरिक खेल मशहूर रहे हैं, वहीं दिमाग वालों का खेल कहा जाने वाला ‘शतरंज’ भी लोकप्रिय रहा है। मोहरों के साथ शह और मात का यह खेल आज भी पसंद किया जाता है। इसी की तर्ज पर कई अन्य एशियाई, विदेशी खेल भी मशहूर रहे हैं। इन्हीं में एशियाई खेल ‘गो’ जो कि काले और सफेद पत्थरों के साथ एक तख्ती पर खेला जाता है। यह चीन, जापान और कोरिया में काफी मशहूर रहा है। ‘शोगी’ भी एक तरह की जापानी शतरंज है। इसके अलावा टिक टैक टो एक ऐसा खेल है, जो भारत में भी खासकर किशोरों की पसंद रहा है। कनेक्ट फॉर, चेकर्स, मिल, ऐनो और स्टारक्राफ्ट भी मशहूर गेम हैं। ०

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