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नक्श लायलपुरी- एक सीधा-सादा गीतकार

उनके लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों की बानगी देखिए, कदर तूने ना जानी बीत जाए जवानी (नूरी), ‘न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया’ और ‘अहले दिल यों भी निभा लेते हैं, दर्द सीन में छुपा लेते हैं’। इसके अलावा ‘प्यार का दर्द है मीठा-मीठा प्यारा-प्यारा (दर्द)।

Author February 5, 2017 5:45 AM
लता मंगेशकर के साथ नक्श लायलपुरी।

इकबाल रिजवी

लाजवाब गीतों का गीतकार नहीं रहा। उनके एक-दो नहीं, दर्जनों बेमिसाल गीतों ने उन्हें मशहूरियत दी। फिल्म चेतना (1971) का गीत ‘मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा’ या फिर मिलाप (1972) का गाना ‘कई सदियों से कई जनमों से, तेरे प्यार को तरसे मेरा मन’। ऐसे गीतों की लंबी सूची है जो नक्श लायलपुरी के नाम से जुड़ी है। जसवंत राय उर्फ नक्श लायलपुरी अविभाजित हिंदुस्तान (अब पाकिस्तान) के लायलपुर में 24 फरवरी 1928 को पैदा हुए। उनके पिता जगन्नाथ शर्मा इंजीनियर थे। नक्श को शायरी में बचपन से ही दिल्चस्पी थी। युवा अवस्था में ही नक्श ने लाहौर से छपने वाले उर्दू दैनिक ‘रंजीत निगारा’ में नौकरी कर ली, लेकिन तभी देश विभाजन को लेकर हिंसा शुरू हो गई। नक्श को परिवार के साथ लायलपुर से पलायन करना पड़ा। उनका परिवार एक परिचित के सहारे लखनऊ आ कर बस गया। रोजगार की तलाश के दौरान नक्श कोई ऐसा काम चाहते थे जिसमें वे शायरी भी करते रहें। ऐसे में खयाल आया कि फिल्मों में गीत लिखने का मौका मिल जाए तो शायरी को ही रोजगार का साधन बनाया जा सकता है। 1949 के गर्मियों की बात है, जब नक्श बिना घर वालों को बताए मुंबई जा पहुंचे। कुछ दिन की भागदौड़ के बाद उन्हें अहसास हो गया कि रोज का खर्च चलाने के लिए छोटी-मोटी नौकरी किए बिना गुजारा नहीं हो सकता। कुछ कोशिशों के बाद उन्हें डाक विभाग में नौकरी मिल गई।

इस बीच फिल्मों में मौके की तलाश में नक्श लगातार कोशिश करते रहे। गीतकार के रूप में पहला मौका 1952 में फिल्म ‘जग्गू’ से मिला, जिसमें उन्होंने ‘अगर तेरी आंखों से आंखें मिला दूं’ गीत लिखा था। नक्श मशहूर नहीं थे इसलिये पहली फिल्म के बाद कहीं से बुलावा भी नहीं आया। हां, इतना जरूर हुआ कि संगीतकार सपन जगमोहन ने उन्हें फिल्म ‘तेरी तलाश में’ गीत लिखने का मौका दिया जिसमें उनका लिखा एक गीत ‘खो दिये हैं तेरी तलाश में पिछले कई जनम’ काफी लोगों को पसंद आया। फिल्म फ्लाप हो गई। नक्श फिर खाली हो गए। एक दिन सपन जगमोहन ने उन्हें पंजाबी फिल्म ‘जीजाजी’ के गाने लिखने को कहा। नक्श ने गीत लिख दिए। फिल्म बॉक्स आॅफिस पर हिट साबित हुई। फिर तो नक्श के सामने पंजाबी फिल्मों के प्रस्तावों का ढेर लग गया। ये धरती पंजाब दी, पौबारा, धरती वीरां दी, कुंवारा मामा, मां दी गोद और नीम हकीम सहित करीब चालीस पंजाबी फिल्मों के गीत नक्श ने लिख डाले। फिर भी दिल में एक कचोट थी कि हिंदी फिल्मों में लिखने का मौका नहीं मिल रहा था। और जिनमें मिल रहा था वे सभी बी ग्रेड की फिल्में थीं। 1953 में नक्श की शादी हो गई।

शादी के कुछ समय बाद उन्होंने बी ग्रेड की हिंदी फिल्में स्वीकारना शुरू कर दिया। घमंड, राइफल गर्ल, सर्कस क्वीन, मधु, चोरों की बारात, रोड नम्बर 303 जैसी फिल्मों के गीत नक्श लिखते रहे। चेतना पहली ऐसी रंगीन फिल्म थी जिसके गीत नक्श ने लिखे और वह गीत हिट हो गया। फिल्मी दुनिया में हिट होने पर ही पांव जम पाते हैं लेकिन किस्मत ने तब भी उनका साथ नही दिया। मुंबई की आबोहवा रास न आने की वजह से वे बीमार पड़ गए। उन्हें इलाज के लिए लखनऊ ले जाया गया। आठ महीने बिस्तर पर पड़े रहने के बाद नक्श ने फिर फिल्मी दुनिया में वापसी की। चेतना की गीतों की चर्चा तब तक जारी थी। इस बार नक्श को निमार्ता राम दयाल की दो फिल्मों ‘प्रभात’ और ‘बाजीगर’ के लिए गीत लिखने का मौका मिला। प्रभात के संगीतकार मदन मोहन थे। मदन मोहन के संगीत निर्देशन में नक्श ने अगली फिल्म दिल की राहें के गीत भी लिखे। इसमें लता के गाए एक गीत की लोकप्रियता में आज भी कमी नहीं आयी है, जिसके बोल हैं-‘रस्में उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे’, लता के लिए नक्श ने कुछ और लोकप्रिय गीत भी लिखे।

फिल्म कालगर्ल का ये गीत कौन भूल सकता है ‘उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकराते चलो’, ऐसा ही एक और गीत जयदेव के संगीत निर्देशन में लता ने गाया। फिल्म थी ‘तुम्हारे लिये’ जिसका गीत है-तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे कि जैसे युगों से तुम्हें जानती हूं’। नक्श के गीत पसंद किए जा रहे थे लेकिन बड़े बैनर की फिल्में उन्हें नहीं मिल पा रही थी। सातवें दशक और आठवें दशक के कुछ बरसों तक नक्श की कलम एक से बढ़ कर एक गीतों को रचती रही। उनके लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों की बानगी देखिए, कदर तूने ना जानी बीत जाए जवानी (नूरी), ‘न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया’ और ‘अहले दिल यों भी निभा लेते हैं, दर्द सीन में छुपा लेते हैं’। इसके अलावा ‘प्यार का दर्द है मीठा-मीठा प्यारा-प्यारा (दर्द । माना तेरी नजर में तेरा प्यार हम नहीं (आहिस्ता- आहिस्ता)। ‘ये मुलाकात इक बहाना है प्यार का सिलसिला पुराना है (खानदान) ‘आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें, होश में दोनों नहीं हैं किसको दीवाना कहें।’ इसके अलावा फिल्म घरौंदा के गीत ‘तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यकीं है’ और ‘दो दीवाने इस शहर में’ जैसे अनेक गीतों की लंबी सूची है जो नक्श के नाम दर्ज हैं।

फिल्मों ने नक्श को शोहरत दी, दौलत दी लेकिन अदब से दूर कर दिया। नक्श के लिए फिल्मों में गीत लिखना पूर्णकालिक काम था, लेकिन फिर भी समय चुरा चुरा कर उन्होंने साहित्य सृजन कर ही लिया। जब भी उन्हें मौका मिलता वे मुशायरों में जरूर हिस्सा लेते थे। जब उनका काव्य संग्रह ‘तेरी गली की तरफ’ छपा तो नक्श को बेहद खुशी हुई। हाल ही में उनकी रचनाओं का एक और संग्रह ‘आंगन आंगन बरसे गीत’ प्रकाशित हुआ। 1990 के दशक तक पहुंचते पहुंचते नक्श हिंदी फिल्मों की मुख्य धारा सिनेमा से बाहर हो चुके थे। वह दौर गीत संगीत के संक्रमण का दौर था। खुलेपन और आधुनिकता के नाम पर नक्श से जिस तरह के गीतों की फरमाइश होती थी उसे वह स्वीकार नहीं कर सकते थे। इसके बाद नक्श टीवी धारावाहिकों के लिए गीत लिखने लगे। 2005 में उन्होंने नौशाद के कहने पर फिल्मों में वापसी की। नौशाद के साथ ‘ताज महल‘ और खय्याम के साथ ‘यात्रा’ जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे। उनकी अंतिम फिल्म थी ‘सबका सार्इं बाबा’। बेहद सादा जीवन बिताने वाले नक्श जानते थे कि चमक धमक वाली फिल्मी दुनिया में उनकी सादगी उन्हें नुकसान पहुंचाएगी और नुकसान पहुंचाया भी, लेकिन वे अपने आप को जीवन भर नहीं बदल सके। इस हालात पर लिखा उनका शेर उनके पूरे फिल्मी जीवन को प्रतिबिंबित करता है –
नक्श से मिल कर तुमको चलेगा पता
जुर्म है किस कदर सादगी, ऐ दोस्तों। १

 

 

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