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समस्या: न ठौर न ठिकाना

मां की जगह सायरा नामक उसकी एक बुआ है, जो कथित तौर पर उसका ख्याल रखती है।
ज्योति को अपनी मां का चेहरा नहीं याद है कि वह दिखने में कैसी थी।

ज्योति को अपनी मां का चेहरा नहीं याद है कि वह दिखने में कैसी थी। उसके पापा भी नहीं हैं। बस सिर छुपाने के लिए फ्लाईओवर की एक छत है। वहां कोई चहारदीवारी भी नहीं है, सब कुछ खुला-खुला सा है। रात में जमीन पर सोते वक्त नजदीक से गुजरती तेज रफ्तार की गाड़ियों से नींद भी खुल जाती है, तो कभी फ्लाईओवर में लगी लाइट भी भ्रम पैदा करती है, मानो सुबह हो गई हो। इन सबके बीच कभी-कभी दिल्ली पुलिस की दबिश भी झेलनी पड़ती है। सर्दी, गरमी और बरसात के मौसम में कई बार ऐसा हुआ, जब चिथड़ों में लिपटी ज्योति अपनी गठरी लिए किसी दूसरे फ्लाईओवर की तलाश करती है, जहां हमेशा के लिए नहीं, तो कम से कम कुछ महीनों के लिए वह अपना आशियाना बना सके। मां की जगह सायरा नामक उसकी एक बुआ है, जो कथित तौर पर उसका ख्याल रखती है। जब कभी किसी मां और उसके छोटे बच्चों को देखती है, तब वह निराश हो जाती है। इसे टोटका कहें या उसका यकीन, जब वह अपने गले में मौजूदा एक काले धागे को निहारती है। ज्योति की मानें तो यह लॉकेट उसकी मां ने जन्म के समय पहनाया था।

ज्योति हमेशा की तरह दक्षिणी दिल्ली के हौज खास स्थित लाल बत्ती पर अपनी छोटी बहन सानिया और छह साल के भाई सूरज के साथ चौराहे पर बत्ती लाल होने का इंतजार कर रही थी। इस बीच सड़क पर सरपट भागती गाड़ियों के पहिए थम जाते हैं। हाथ में गुलाब का फूल लिए सूरज एक उम्मीद के साथ हर गाड़ियों के शीशे पर अपने नाजुक अंगुलियों से दस्तक देता है। सिग्नल हरा होने से पहले वह दस रुपए की दर से दो-चार फूल बेचने की चाहत रखता है। यह घटना सिर्फ एक बानगी है। राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में अनाथ और निराश्रित बच्चों की दिनचर्या ऐसी ही रहती है।

बीस देशों के बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक इस तरह के बच्चों की संख्या पूरी दुनिया में 6,2 करोड़ है। इनमें करीब 51 फीसद बच्चों की उम्र छह साल से भी कम है। इन बच्चों को भीख मांगने की श्रेणी में नहीं रखा जाता। दिल्ली जैसे शहरों में खुलेआम भीख मांगने पर ऐसे बच्चों के साथ पुलिस सख्ती बरतती है। लिहाजा ये बच्चे छोटे-मोटे तमाशा दिखाकर, कहीं फूल बेचकर, कहीं कुछ और सामान बेचकर अपनी जीविका चलाते हैं। वैसे तो दिल्ली में भीख मांगने पर रोक है। जबकि एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में करीब 60 हजार से ऐसे बच्चे हैं, जो भीख मांगते हैं। राष्ट्रमंडल खेलों के समय दिल्ली सरकार ने भिखारियों को राजधानी की सड़कों से हटाने के लिए एक अभियान चलाया था। कई गैरसरकारी संगठनों को इसका ठेका दिया गया। इस बाबत करोड़ों रुपए की निविदा निकाली गई। यह अलग बात है कि भिखारियों को राष्ट्रमंडल खेलों तक सड़कों से दूर रखने का जिम्मा उसी गैरसरकारी संगठन को मिला, जिसकी पहुंच तत्कालीन दिल्ली सरकार में बड़े मंत्रियों और अधिकारियों तक थी। खेल के समय दिल्ली की सड़कों से बाल भिखारी और स्ट्रीट चिल्ड्रेन भले ही कुछ समय के लिए गायब हो गए थे, बाद में वही चेहरे फिर नजर आने लगे। ऐसे बेसहारा-अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें तमाम योजनाएं चला रही हैं, लेकिन दूर-दूर तक इनका कोई फायदा दिखाई नहीं देता। इन बच्चों की तकदीर नहीं बदलती है।

असल में यह हमारे लोकतंत्र का स्याह पक्ष है। सिर्फ राजधानी दिल्ली ही नहीं बल्कि मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, लखनऊ, भोपाल आदि हर बड़े शहरों में सड़कों पर करतब दिखाते और भीख मांगते हुए बच्चे मिल जाएंगे। इसके लिए जिम्मेदार हमारी सरकारें भी हैं जो देश से गरीबी मिटाने के वादे करती हैं लेकिन, कभी सच्ची नीयत से इस दिशा में काम नहीं होता। इन बच्चों को तमाशा करने या भीख मांगने से तो रोका जा सकता है लेकिन इससे इनके पेट की भूख खत्म नहीं हो सकती। दो वक्त की रोटी के लिए ये कभी भीख मांगेंगे, कभी किताब बेचेंगे, कभी तमाशा दिखाएंगे तो कभी अपराध की दुनिया में भी चले जाते हैं। वैसे तो देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो चुका है। लेकिन, इनके लिए इस कानून का क्या मतलब हो सकता है, जब उनका कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं है। पढ़ने के लिए एक निश्चित ठिकाना-पता जरूरी है, जहां बच्चा रह सके और अपने आसपास किसी स्कूल में नाम लिखा सके। संसद से कुछ ही दूरी पर मासूस बच्चे दिन भर तमाशा दिखाकर दस-बीस रुपए कमा पाते हैं। इसी कमाई से वे अपना पेट पालते हैं। शाम ढलने के बाद वे किसी फ्लाईओवर के नीचे सो जाते हैं और अगली सुबह का इंतजार करते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि देश की करीब एक चौथाई आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे हैं। इसी गरीबी की वजह से बाल श्रमिकों का जन्म होता है। यह देश के लिए चिंता का सबब है। अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे अधिक बाल मजदूर हैं। सरकार ने बेशक चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए खतरनाक उद्योगों में काम करने को गैरकानूनी कर रखा है, लेकिन हकीकत में बहुत सारे कारखाने और उद्योगों में आज भी बच्चे काम कर रहे हैं। कोई कारगर निगरानी तंत्र न होने और उनके लिए पुनवार्सन की कोई ठोस योजना न होने के कारण कानून भी बेमानी होकर रह गया है।

गैरखतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिकों की भरमार है। जब खतरनाक उद्योगों में ही उनके काम पर रोक नहीं लग पा रही है तो कम खतरनाक उद्योगों में उनकी निगरानी कौन करे। भारत में स्ट्रीट चिल्ड्रेन की संख्या घटने की बजाय बढ़ रही है, यह चिंताजनक है। वैसे तो देश में बच्चों की भुखमरी और गरीबी पर कई रिपोर्ट सामने आ चुकी है। इनमें बार बार बताया जाता है कि बच्चों के पोषण संबंधी समस्या में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है। भारत में तीन साल से कम उम्र के करीब पैंतालीस फीसद बच्चे सामान्य से कम वजन के हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में बच्चों की आधी आबादी कुपोषण की शिकार है।

सुबह से लेकर शाम तक लोगों को तमाशा दिखाने और भीख मांगने वाले सैकड़ों बच्चे हर साल वाहनों की चपेट में आकर असमय मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। सरकारी फाइलों में हादसों के शिकार ऐसे बच्चों की मौत के बारे में कोई जानकारी दर्ज नहीं है। इसके अलावा दिन भर सड़क में रहने वाले बच्चे प्रदूषण की वजह से कई गंभीर बीमारियों के शिकार भी हो जाते हैं। उनके स्वास्थ्य को लेकर भी बाल विकास मंत्रालय गंभीर नहीं है। बात अगर गैरसरकारी संगठनों की करें तो बाल विकास के नाम पर गठित ऐसी संस्थाएं सिर्फ सरकारी अनुदान हासिल करने की कवायद में जुटी रहती हैं। जमीनी स्तर पर स्ट्रीट चिल्ड्रेन के कल्याण के लिए उसके पास ठोस नीति का अभाव है। हैरत की बात तो यह है कि स्ट्रीट चिल्ड्रेन की भलाई करने के नाम पर अनुदान पाने वाले कई गैर सरकारी संगठन राजधानी दिल्ली के पंच सितारा होटलों में सम्मेलन और सेमिनार आयोजित करते हैं। ०

 

 

 

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