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बढ़ते उत्सव, सिकुड़ती पुस्तक संस्कृति

इस बार का विश्व पुस्तक मेला शुरू हो चुका है। लेखक-पाठक-प्रकाशक का अद्भुत संगम। पुस्तक मेलों के आयोजन के पीछे मकसद होता है कि पुस्तक प्रेमियों को उनकी पसंद की पुस्तकें एक स्थान पर सहजता से उपलब्ध कराई जा सकें। इस बहाने पढ़ने की संस्कृति का विकास भी हो सके। इसलिए पुस्तक मेले में किताबों की खरीद-बिक्री के अलावा पठन संस्कृति और पुस्तकों के प्रचार-प्रसार से जुड़े विषयों पर लगातार विचार-विमर्श होते रहते हैं। मगर क्या वास्तव में पुस्तक मेले और उनमें मनाए जाने वाले पुस्तकों के उत्सव अपने मकसद में कामयाब हो पा रहे हैं! तमाम प्रयासों के बावजूद खासकर हिंदी में पाठकों के लगातार घटने की शिकायतें बनी हुई हैं। पुस्तक मेले और पुस्तक संस्कृति का जायजा ले रहे हैं प्रेमपाल शर्मा।

फिर आ गया विश्व पुस्तक मेला!

फिर आ गया विश्व पुस्तक मेला! पिछले तीन बरस से हर साल जनवरी में लगने लगा है। पिछले कई वर्षों के चित्र दिमाग में छितरा रहे हैं। सर्दियों की गुनगुनी धूप में सुबह ग्यारह-बारह बजे प्रगति मैदान में प्रवेश करती भीड़। इनमें ज्यादतर स्कूल-कॉलेजों के छात्र, नौजवान सब। छुट्टी का दिन हो तो भीड़ दस-बीस गुना ज्यादा। मगर यह क्या! बच्चों, छात्रों ने अपने माता-पिता के साथ अंग्रेजी स्टॉलों की राह पकड़ ली, तो कुछ अधेड़ और साठ पार लोग हिंदी के हॉल की तरफ बढ़ रहे हैं। मानो किसी अदृश्य छलनी ने उन्हें अलग-अलग रास्ते बता दिए हैं।  सचमुच ऐसी भीड़ अंग्रेजी के स्टॉलों पर कि आप दंग रह जाएं। लगभग छीना-झपटी का-सा दौर। छुट्टी के दिन स्टॉल के मालिकों ने दो-तीन गुने नौजवान कर्मचारी बढ़ा लिए हैं। यही दो-चार दिन तो होते हैं कमाई के। दिल्ली का शायद ही कोई अंग्रेजी प्रकाशक हो, जो इस विश्व पुस्तक मेले में आने को लालायित न रहता हो। इतने ऊंचे किराए के बावजूद। अंग्रेजी सीखने की किताबें, अंग्रेजी की डिक्शनरी, सामान्य ज्ञान की किताबें लाखों में बिक जाती हैं। दिन छिपते-छिपते आप खुद इन बच्चों के चेहरों पर उमंग देख सकते हैं। दोनों हाथों में चार-चार थैले लटकाए। दिल्ली, जयपुर की नकल पर अब ये अंग्रेजी उत्सव छोटे शहरों की तरफ भी बढ़ रहे हैं। पुस्तक मेला या उत्सव यही तो है।…

लेकिन यह आधा सच भी नहीं है पुस्तक मेले के उत्सव का। आइए, आपको ले चलते हैं हिंदी के पंडालों की तरफ। अपनी माटी, अपना देश अपनी भाषा! मगर हिंदी के पंडालों में सुबह से ही वीरानी छाई है। इसलिए स्वयं मालिक प्रकाशक भी दोपहर तक पहुंचते हैं। शनिवार, रविवार की छुट्टी को छोड़ कर। जो बड़े-बूढ़े लेखकनुमा झोला लटकाए इधर आ गए थे, वे जरूर फेरी वाले की तरह पुस्तक मेले को सार्थकता दे रहे हैं। ये शत-प्रतिशत लेखक हैं। खुशी में एक-दूसरे से गले मिलते, सेल्फी लेते, फोटो खिंचवाते और हां, अपनी नई किताब दिखाते, उसके विमोचन का सबको समय और तारीख नोट कराते। अब पुस्तक देने की भी सामर्थ्य नहीं बची, क्योंकि हिंदी प्रकाशक इतनी उदारता से प्रतियां देता नहीं और इतनी ऊंची कीमत पर लेखक नाम का पेंशन विहीन, पंख कटा प्राणी खरीद सकता नहीं। तो लीजिए पुस्तक के पहले पन्ने पर खड़े-खड़े आॅटोग्राफ दे दिए। धन्य हैं आप भी, लेखक भी और पुस्तक मेला। अंग्रेजी में पाठक, हिंदी में लेखक।

हिंदी स्टॉल में असली हलचल शुरू होती है शाम को, सूर्यास्त के करीब। दिन अंग्रेजी का, शाम हिंदी की। कभी-कभी तो एक ही वक्त पर दर्जनों स्टॉलों पर एक साथ एक-दो दर्जन लेखकों की अमर कृतियों का विमोचन। स्टॉल छोटा है, लेकिन लेखकों के प्रशंसकों की भीड़ बड़ी है, भले ही महज पंद्रह मिनट का मामला हो। अमरता चंद लम्हों की होती है! लेखकों, शुभचिंतकों का गिरोह वक्त से पहले आ जमा है- वाट्सऐप और दूसरी सूचना क्रांतियों की बदौलत। एक-एक दिन के सैकड़ों बुलावे! कहां जाएं! इतना महत्त्व तो लेखक, पाठकों को जमाने ने आज तक नहीं दिया। स्टॉल पर खड़े-खड़े इससे-उससे मिलते-जुलते टांगे भी थक गई हैं। लेकिन स्टार आलोचक, महान विमोचक अभी तक नहीं पधारे हैं। अब अस्सी बरस की उम्र पार करने पर तो उन्हें ये सम्मान और शॉल मिलने शुरू हुए हैं और इसलिए हर महान लेखक उन्हीं के कर कमलों से ‘विमोचित’ होना चाहता है। जिस इक्कीसवें स्टॉल पर वे आज विमोचन कर रहे हैं वहां के लोग उन्हें छोड़ें तब न। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के वे दर्जन भर विश्व कवि भी उन्हें कहीं नहीं जाने दे रहे। जल्दी क्या है? साहित्य का मामला धीरे-धीरे ही चलता है प्रभो! देर से जाने पर कद और ऊंचा होता है। यह वैदिक परंपरा है।

इंतजार करते-करते इस बीच इधर के स्टॉल की कुछ भीड़, कुछ लेखक झटपट इधर-उधर की छोटी दुकानों में पुस्तक विमोचन के लिए चले गए हैं। फोटो, सेल्फी ही तो होनी है, बाकी सब काम तसल्ली से फेसबुक कर देगा। अहा! क्या लोकतंत्र है सूचना का! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुनिया में डंका बजाने का! इस बार प्रकाशक ने किताब की दस प्रतियां ही रखी हैं, वह भी विमोचन के हाथों में पकड़ने के लिए। फिर वहीं वापस। दस प्रतियों के दस बार विमोचन हो चुके हैं पुस्तक मेले के दस दिनों में। विमोचन के ऐन वक्त प्रकाशक के चेहरे पर कुछ नूर लौटा है, वरना सुबह से तो वह मक्खी मार रहा था और घाटे का हिसाब लगाते-लगाते अवसाद में था। यहां ज्यादा प्रति ले आऊं तो मुफ्त में चली जाती हैं! इन्हीं नौटंकियों से हताश-निराश कई प्रकाशकों ने भाग लेना भी बंद कर दिया है। घाटे का सौदा है हिंदी के लिए! कुछ प्रकाशक अपनी साख और सनद बचाने की खातिर आते हैं, तो कुछ राजभाषा अधिकारियों से लाइब्रेरी खरीद के आदेश की उम्मीद में। सबसे घाटे में हैं मसिजीवी लेखक। उसे न नाम मिला, न नामा। काश! इन विमोचनों में अंगे्रजी की तरह हजारों की भीड़ होती!

अद्भुत मिलन-स्थली
अद्भुत संगम, मिलन स्थल है हिंदी लेखकों के लिए पुस्तक मेला। इलाहाबाद, मुगलसराय, कटनी, ग्वालियर, बनारस, कोलकाता से लेकर जम्मू, खुर्जा यानी कि पूरे उत्तर भारत, दूरदराज से। ये लेखक सच्चे मायनों में भारतीय भाषाओं के पुरोधा हैं। अफ्रीकी लेखक न्यू थ्योंगी के शब्दों में ‘किसी भी देश की भाषा बोली, संस्कृति इन्हीं के भरोसे बची हैं।’ दिल्ली तो सिर्फ तिजारत की जगह है, साहित्य का सबसे बड़ा श्मशान घाट। यह शहर एक अच्छी किताबों की दुकान भी नहीं बचा पाया, हिंदी का उत्सव तो क्या मनाएगा! सब को पता है चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। इतनी छोटी होती जा रही है लेखक बिरादरी, हिंदी पुस्तकों की दुनिया कि डर लगता है। हिंदी पंडाल हिंदी की समूची सिकुड़ती दुनिया का अक्स।
पुस्तकों की नहीं, सिर्फ हिंदी पुस्तकों, साहित्य की सिकुड़ती दुनिया! कहानी, उपन्यास, नाटक, समीक्षा, आलोचना सभी की। कविता तो बीस-तीस वर्ष पहले ही इस दुनिया से कूच कर गई है। यकीन न हो तो किसी भी प्रकाशक, पाठक से पूछ लीजिए। वह आपकी बात पूरी सुनने से पहले ही दूसरी तरफ मुंह फेर लेगा। लेकिन कवि हृदय है कि मुंह फेरने के बावजूद संग्रह छपवाएगा, नाक पर नकद गड्डी मार कर और किसी सरकारी महकमे में हुआ तो घर-घर बांटेगा भी, मिठाई के साथ। उसे महाकवि बनना है, अपने को मनवाना है। पढ़ता वह भी नहीं है दूसरों की कविता। उसे अपनी मौलिकता के नष्ट होने का डर रहता है।
लेकिन धीरे-धीरे उपन्यास, कहानी का साहित्य भी टायफाइड का शिकार हो रहा है। अगर जोड़-तोड़ से पाठ्यक्रम में नहीं लगी तो पांच-सात सौ का संस्करण उसकी अंतिम सीमा है। कुछ साल पहले कम से कम सरकारी खरीद तो थी। कई प्रकाशकों को तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की सरकारों और राजा राममोहन राय लाइब्रेरी के आदेशों ने रातों-रात करोड़पति अंबानी, अडानी बना दिया। अब तो किन्हीं दूसरे ‘घूरे’ के दिन फिर रहे हैं, जहां शाश्वत धर्म, सरस्वती, वैदिक काल से खोज-खोज कर लाई और छापी जा रही है। महापुरुषों की खोज और उनके साहित्य, विचारों का ऐसा स्वर्ण काल भारत में पहले कभी नहीं था। शायद गुप्त काल की वापसी। महानता की शुरुआत।

पठन संस्कृति में गिरावट

हिंदी पुस्तकों की दुनिया में यह सांस्कृतिक पतन रातों-रात नहीं हुआ। न्यायालय की शब्दावली में कहा जाए तो सारे आरोप उन्हीं पर सिद्ध होते हैं जिनकी इधर-उधर घूमती प्रेत छायाओं ने हिंदी पुस्तक स्टॉलों को शमशान में बदला है। अगर केवल प्रकाशक दोषी होता तो बंगाली, अंग्रेजी के प्रकाशकों पर भी यह आरोप लगता। क्यों लोग लौट-लौट कर बंगाल में कोलकाता के पुस्तक मेले की तारीफ करते नहीं अघाते? दिल्ली का पुस्तक मेला तो पिछले तीन वर्ष से वार्षिक हुआ है, कोलकाता में तो यह शुरू से ही था। बंगाल के गांव-गांव से बसें मुफ्त में चलाई जाती हैं। प्रवेश भी मुफ्त। फिर दिल्ली में क्यों नहीं?

क्या लेखकों ने साहसिक आवाज उठाई? कोलकाता मेले में कहीं लेखक का कोना है, तो कही पेटिंग्स का! नाटक, संगीत, गोष्ठी, लोकनृत्य की ऐसी छटा! सचमुच का उल्लास! उत्सव! बच्चे पूरे वर्ष गुल्लक में पैसा जमा करते हैं अपनी पसंद की बंगाली किताबें खरीदने को। लगभग सात सौ स्टॉलों में नब्बे फीसद बंगाली भाषा की होती हैं। इसमें चालीस-पचास प्रकाशक बांग्लादेश के भी आते हैं। और इतनी सस्ती कि दुनिया भर में इससे अच्छी और सस्ती-मौलिक और अनूदित पुस्तकें नहीं मिले। हिंदी के भी पांच-सात प्रकाशक कोलकाता पुस्तक मेले में होते हैं, लेकिन ज्यादातर दिल्ली और दिल्ली की संस्कृति लादे, ऊंची कीमतों वाले। अंग्रेजी का आतंक धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन दिल्ली के मुकाबले कोसों दूर। अपनी भाषा में पुस्तक, संस्कृति, संगीत का आनंद दिल्ली के दुर्गा पूजा के स्टॉलों में आज भी है।दिल्ली के किसी बच्चे को हिंदी की किताब के लिए गुल्लक में पैसे जोड़ते सुना है? अगर हो तो गिनीज बुक उसका फोटो खींचने को तैयार है। अगर नहीं, तो क्या दोष बच्चों का है? नई पीढ़ी का है? सिर्फ प्रकाशकों का है? सिर्फ सरकार का है? नहीं, हिंदी समाज और उसके पहरुए-बड़बोले राजनेताओं और उनके पिछलग्गू छाया बने लेखकों-बुद्धिजीवियों का है। जिस बंगाल, मलयालम, केरल, महाराष्ट्र में पुस्तक संस्कृति की प्रशंसा करती ज्यादातर समझदार लेखक विरादरी नहीं अघाती, उसका शतांश अनुकरण भी करती है?

पुस्तकों की घटती बिक्री

पुस्तक मेला या उत्सव सच्चे मायने में अंग्रेजी के लिए ही है। पिछले कुछ वर्षों के स्टॉलों पर नजर दौड़ाएं तो यह स्वयंसिद्ध है। पिछले वर्ष अंग्रेजी के स्टॉल चार सौ अड़तालीस थे, हिंदी के दो सौ बहत्तर, उर्दू के सोलह और पंजाबी के दस। बाकी हर भारतीय भाषा का बमुश्किल एक। तीन प्रतिशत अंगे्रजी जानने वालो की बिक्री सत्तर फीसद! और तो और, जिस मैथिली भाषा को संविधान की अनुसूची में शामिल किए पंद्रह वर्ष हो गए उसका एक भी स्टॉल नहीं था। कहां मुंह छिपा कर बैठ गए उसके हिमायती? क्या सिर्फ राजनीति के लिए यह था?
संविधान में भाषा की राजनीति भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी को शामिल करने की बातें पूरे समाज के लिए आत्मघाती कदम ही साबित होंगी। सबको अंग्रेजी से एकजुट होकर लड़ना होगा। शहरों से दूर गांवों में हिंदी पुस्तकों का पाठक है और वह भी करोड़ों में। लेकिन उसे किताब से दूर रखने की हर साजिश रची जा रही है।
पिछले वर्षों में एक और खतरनाक पक्ष हिंदी के स्टॉलों में बढ़ा है, और वह है धार्मिक, बाबावादी, प्रवचन स्टॉलों का। आधे से ज्यादा यही हैं और यही थोड़ी-बहुत भीड़। यह देश आगे जा रहा है या पीछे? विज्ञान प्रसार, चेतना पूरी तरह नदारद।
हिंगलिश के बूते हिंदी में बेस्ट सेलर की नई दुकानें खोलने वाले बड़बोले लाख दावा करें, चेतन-संस्कृति के आगे वे कहीं नहीं ठहरते। यह भाषाई, सांस्कृतिक अवसाद के क्षण हैं जिसकी शुरुआत अंग्रेजीदां नेहरू के समय ही हो गई थी। नेहरू भक्त नहीं भूले जो उलाहना नेहरूजी ने महादेवी, निराला को दिया था ‘कि हिंदी में कुछ अच्छा लिखा ही नहीं जा रहा।’ आज सब उसी का विस्तार है। इसे किसी सच्चे गांधी की आवाज ही चुनौती दे सकती है।

कोई लौटा दे वे बीते हुए दिन

वक्त आ गया है जब पूरा समाज, सरकार, शिक्षा अपनी भाषा के इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करे और इस बार जिस ‘यूरोप के देश’ पुस्तक मेले का विशेष आकर्षण है उनसे सीखें। यूरोप के हर देश में कोई शॉपिंग माल ऐसा नहीं होगा जहां उनकी अपनी भाषा में पुस्तकों-अखबारों, बच्चों-बड़ों सभी के लिए कोना न हो। डिजिटल दुनिया के बावजूद दुनिया भर में पुस्तकें आज भी उसी चाव से पढ़ी जा रही है, वह चाहे कागज पर हों या कंप्यूटर, मोबाइल पर। कट्टर राष्ट्रवादी या रूढ़िवादी मार्क्सवाद की आड़ लेकर सिर्फ मोबाइल, कंप्यूटर को दोष देकर आप नहीं बच सकते। ०

 

 

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