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विमर्श- आत्मसंघर्ष और निराशाबोध

कवि इस दुनिया को अपनी साधना का फूल-फल देकर, अपनी प्रभा से चकित-चल करके इस समाज को कुछ और बेहतर, कुछ और सुंदर बनाने का स्वप्न देखता है।
Author October 13, 2017 22:09 pm
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।
 पंकज पराशर
मचंद मानते थे कि कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है, लेकिन इस मशाल को साम, दाम, दंड और भेद से प्रभावित करने वाली राजनीति ने साहित्य को धकिया कर इतना पीछे कर दिया है कि अब गाहे-बगाहे ही पंजाबी कवि अवतार सिंह ‘पाश’ जैसी यह ईमानदार अभिव्यक्ति दिखने को मिलती है, ‘मेरे यारों, यह हादसा हमारे ही समयों में होना था/ कि मार्क्स का सिंह जैसा सिर/ सत्ता के गलियारों में मिनमिनाता फिरना था।’ कवि इस दुनिया को अपनी साधना का फूल-फल देकर, अपनी प्रभा से चकित-चल करके इस समाज को कुछ और बेहतर, कुछ और सुंदर बनाने का स्वप्न देखता है। मगर यह अजीब विडंबना है कि सुंदर का स्वप्न पाले हुए कवि जिस समाज के लिए जीवन होम कर देता है, वही समाज मिर्जा गालिब जैसों अजीम शायर को ‘सुखन में खाम:-ए-गालिब की आतश अफशानी/ यकीं है हमको भी, लेकिन अब उसमें दम क्या है’ कहने को मजबूर कर देता है। छल-कपट, झूठ-फरेब दुनियावी कामयाबी पाने के नुस्खे हैं, लेकिन बहुत ‘दुनियादार’ और अति व्यवहार-कुशल व्यक्ति और चाहे जो जाए, इस दुनिया को सुंदर बनाने का स्वप्न देखने वाला सच्चा कवि नहीं हो सकता! क्योंकि इश्क को दिल में जगह दिए बिना ‘अक्ल से शायरी नहीं आती’। अक्ल से काम लेना राजनीति का स्वभाव है, जो कई बार लाशों की राजनीति तक करने में संकोच नहीं करती। जिसके लिए सत्ता और शक्ति के आगे बाप-भाई, बेटे-बेटी किसी का कोई मोल नहीं। तभी तो औरंगजेब ने एक भी वक्त की नमाज नहीं छोड़ी और न किसी भाई को जिंदा छोड़ा!
मौके का फायदा उठाना, किसी बात को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेना, भौतिक संसाधन ही नहीं, मनुष्य की भावनाओं का दोहन करने में नहीं हिचकिचाना राजनीति का सहज स्वभाव है, साहित्य का नहीं। जो साहित्य मशाल के स्वभाव को छोड़ कर ऐसा करता है, वह साहित्य की आड़ में इहलोक सुधार लेने की आकांक्षा पालने वाला साहित्याभास मात्र होता है।
यह सवाल बार-बार जेहन में आता है कि कोई ईमानदार कवि किस वजह से पराजय-बोध और हताशा का शिकार होकर यह लिखने को मजबूर होता है, ‘हो गया व्यर्थ जीवन मैं रण में गया हार!’ क्या यह पराजय-बोध दुनियावी योग-क्षेम पाने की लालसा में सफल न होने पाने से उपजी हुई निराशा है? दरअसल यह निराशा समाज के लिए पूरा जीवन होम कर देने के बाद भी उस जीवन के मोल को न समझे जाने की खिन्नता से पैदा होती है। कवि जिस समाज के लिए वह जीता-मरता है, जिस मनुष्य के सुंदर जीवन को वह साहित्य का लक्ष्य मानता है, वही समाज जब कवि के विरोध में खड़ा हो जाए, कवि-कर्म को अर्थहीन करार दे, तो निश्चित रूप से गहरी निराशा होती है। अजीब विडंबना और कि हर समय में सच्चा कवि लगभग अलक्षित और विफल जीवन जीने के लिए अभिशप्त होता है। तभी खिन्न होकर तुलसीदास को कहना पड़ा, ‘धूत कहो, अवधूत कहो, रजपूत कहो, जुलाहा कहौ कोई।’ जबकि तुलसी को किसी के बेटे से अपनी बेटी का ब्याह नहीं करना था, न उनके जैसे संतन को किसी सीकरी से कोई लेना-देना था।
गालिब को खुद अपने बारे में कहना पड़ा, ‘आदमी तो अच्छा है, पर बदनाम बहुत है’। तब सवाल उठता है कि जो समाज एक सच्चे कवि को उपेक्षा, अपमान और अर्थाभाव में मरने के लिए छोड़ देता है, उसी समाज को कवि की मृत्यु के बाद उसकी महानता का एहसास क्यों होता है? जिस समाज में बैक्कम मोहम्मद बशीर, काजी नजरूल इस्लाम और निराला विक्षिप्त हो जाएं, भुवनेश्वर और स्वदेश दीपक जैसे लेखक के विलुप्त हो जाने से कोई फर्क न पड़े, उस समाज की संवेदनशीलता अचानक मृत्यु के बाद जाकर क्योंकर प्रकट होती है? अनेक लेखकों की फाइल तो मृत्यु के बाद जाकर खुली है, जैसे नजीर अकबराबादी की और मुक्तिबोध की।
ऐसा नहीं है कि दुनियावी छल, छद्म और अर्थोपार्जन के नुस्खे कवियों को नहीं मालूम हैं। महाप्राण निराला ने कहा कि ‘जाना तो अर्थागमोपाय/ पर रहा सदा संकुचित काय’, इसके बावजूद वे स्वार्थ का समर हारते चले गए। जीत नहीं पाए। वे अपने को निरर्थक पिता मानते हैं और असफल गृहस्थ। जबकि वे कहते हैं, ‘मैं कवि हूं पाया है प्रकाश’! सुंदर का स्वप्न देखने वाले निराला के स्वभाव में देना था, लेना नहीं, ‘दिए हैं मैंने जगत को फूल फल/ किया है अपनी प्रभा से चकित चल’। चाहते तो वे भी दुनिया के चतुर-सुजान ठगों की तरह लोगों को ठग सकते थे, बेवकूफ बना सकते थे, लेकिन, ‘कबीरा आप ठगाइये और न ठगिये कोय/ आप ठगे सुख उपजै, और ठगे दुख होय।’ कवि खुद भले दूसरों के द्वारा ठग लिए जाए, मगर प्रतिशोध में आकर किसी और को नहीं ठगते। ठग, बेईमान और फरेबी लोग जोड़-तोड़ करके इहलोक के स्वामी बन सकते हैं। यहां तक कि दुनिया पर राज कर सकते हैं, लेकिन वे साहित्य और समाज की संवेदना पर राज नहीं कर सकते! कवियों को जब दुनिया ठगती है, उपकार का बदला विश्वासघात से देती है, तो वह उसके लिए बहुत बड़ा मानसिक आघात होता है। क्योंकि मध्यकालीन कवि तुलसीदास तक का मानना था, ‘निर्मल जन होई सो मोहि पावा/ मोहि कपट छल छिद्र न भावा।’
सुंदर का स्वप्न देखने वाले अच्छे और प्रतिबद्ध कवियों के समानांतर समकालीन काव्य-परिदृश्य में अनेक ऐसे कवि भी सक्रिय हैं, जो महज अनेक कविता-संग्रहों, पुरस्कारों और मौसमी चर्चाओं के दम पर कवि होने का दावा करते हैं। अर्थशास्त्री जॉन ग्रीशम के शब्दों में कहें, तो इन खोटे सिक्कों की उपस्थिति ने खरे सिक्कों की पहचान की राह में बाधाएं खड़ी कर दी हैं। इन खोटे कवियों का हाशिये पर जीने वाली देश की करोड़ों आम जनता, सच्ची कला, मानवीय विवेक को बनाए/ बचाए रखने वाली विचारधारा और सच्ची संवेदना से कोई लेना-देना नहीं है। कभी-कभार मुक्तिबोध, नागार्जुन और निराला जैसे कालजयी रचनाकारों का नाम-जाप करके अपनी मीडियोक्रिटी को छिपा लेने वाले ऐसे कविगण अपनी ‘व्यवहार-कुशलता’ और संबंध-प्रबंधन से परिदृश्य में बने रहते हैं। ऐसे कवियों की चमक-दमक और सीकरी की साधना से प्राप्त ऐश्वर्य से सच्चे और ईमानादार कवि के निराशा-बोध और आत्मसंघर्ष का जरा भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
मंचीय और सत्ताश्रयी कवियों के कारण हिंदी आलोचना में सच्चे और प्रतिबद्ध कवियों की पहचान में रुकावट पैदा होती है। सच्चे कवि साहित्य और समाज से प्रतिबद्ध तो होते हैं, माहौल बनाने की कला में निष्णात नहीं होते। इसलिए बड़े कवियों के साथ हुई गलतियां आज भी दोहरायी जाती हैं। आज भी किसी मुक्तिबोध का कोई संग्रह नहीं छपता, कोई पुरस्कार नहीं मिलता और निर्ममतापूर्वक उसे उसके रचनात्मक एकांत में निर्वासित कर दिया जाता है। बाद में आप उस कवि के बारे जितना विशेषांक छाप लें, इतिहास में गुणगान करें, लेकिन जीते-जी तो वह इसी एहसास के साथ जीवन बसर करने को अभिशप्त रहा आता है, ‘वगर्ना इस शहर में गालिब की आबरू क्या है’ और निराला जैसों को लगता है, ‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत!’ कवि जीवन भर अथार्भावों से जूझकर, समकालीनों की उपेक्षा और आततायी सत्ता का अपमान झेलकर जिस समाज को सुंदर और बेहतर बनाने का स्वप्न देखता है, दुर्भाग्य से वह समाज भी उसका जब नहीं समझता है, तब ऐसी निराशा पैदा होती है। तब उसे कोई उम्मीद नजर नहीं आती है, कोई सूरत नजर नहीं आती है और निराशा के चरम में वह महसूस करता है कि स्नेह निर्झर बह गया है, रेत ज्यों तन रह गया है!       ०

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