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दस्तावेज: एक पुरानी प्रेम कहानी

अलार्ड सेंट ट्रोपेज में ही समुद्र के किनारे एक विशाल ‘एस्टेट’ खरीदा थी, जहां बाद में पान देई ने अलार्ड के स्मृति चिह्न और कुछ विशेष पेंटिंग प्रदर्शित की थीं। चंद्र त्रिखा का लेख।

Author September 25, 2016 7:25 AM
अलार्ड उन दिनों अक्सर कांगड़ा चला जाता। चंबा के प्राकृतिक सौंदर्य से वह बेहद प्रभावित हुआ।

चंद्र त्रिखा

हाल ही में पेरिस में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा लगी तो याद आई, चंबा की राजकुमारी बन्नो पान देई, जिसने महाराजा रणजीत सिंह के फ्रांसीसी जनरल ज्यां फ्रैंकोइस अलार्ड से विवाह किया था। चंबा के राजा मैंगा राम की बेटी पान देई के अनेक किस्से एक बार फिर पेरिस में चर्चित हो उठे है। पान देई के बारे में मिले रिकार्ड के अनुसार उसका जन्म 25 जनवरी, 1814 को चंबा में हुआ था। वह केवल बारह वर्ष की ही थी जब फ्रांसीसी जनरल अलार्ड ने उसे देखा और उसी वर्ष मार्च में ही उसने राजा से पान देई का हाथ मांग लिया। अलार्ड और पान देई के सात बच्चे हुए थे। इनमें से दो बचपन में ही चल बसे थे। उन दोनों की कब्रें अब भी लाहौर में ही हैं। जनरल अलार्ड पंजाब की सती प्रथा से बेहद आतंकित था। उसने पेरिस में एक समाचार-पत्र को दिए गए साक्षात्कार में इस तथ्य को स्वीकारा भी था कि वह राजकुमारी पान देई और बच्चों को केवल इसलिए पेरिस ले आया था ताकि किसी युद्ध में उसके दिवंगत होने पर पान देई को उसके शव के साथ ही सती होने पर विवश न किया जाए।

जनरल अलार्ड ने पान देई को पेरिस के समीप ही ‘सेंट ट्रोपेज’ में रखा। वहां फ्रांसीसी रीति-रिवाजों के साथ दोनों का पुनर्विवाह हुआ। ऐसा कानूनी रूप से आवश्यक था क्योंकि तब तक पान देई, एक हिंदू स्त्री के रूप में ही थी और विवाह से पहले उसका धर्म परिवर्तन नहीं हो पाया था। यह भी कहा जाता है कि चंबा के राजा का ही आग्रह था कि पान देई को धर्म-परिवर्तन के लिए विवश न किया जाए। उसके परंपरागत पूजा पाठ के लिए उसे पेरिस ले जाते समय जनरल अलार्ड उसकी दो सेविकाओं को भी साथ ले गया था। फ्रांसीसी संभ्रांत समाज में पान देई ने स्वयं को अपने बुद्धि कौशल से शीघ्र ही स्थापित और स्वीकार्य बना लिया। 1963 में अलार्ड, पान देई व बच्चों के लिए ‘सेंट ट्रोपेज’ में समुचित व्यवस्था करने के बाद वापस पंजाब लौट आया। 1941 में पेशावर में एक युद्ध के मध्य उसकी मृत्यु हो गई और उसकी अंतिम इच्छा के अनुसार पान देई को पंजाब में नहीं बुलाया गया। उसे आशंका थी कि पान देई को सती-प्रथा के लिए विवश किया जाएगा। अलार्ड के शव को लाहौर में ही उसी स्थान पर दफ्न किया गया जहां उसके और पान देई के दो बच्चे दफ्न थे।

पति की मृत्यु पर पान देई के निवास पर फ्रांस के लगभग सभी प्रमुख शाही और सैनिक परिवार शोक व्यक्त कने के लिए एकत्र हुए। उन्हीं दिनों जनरल अलार्ड के परिजनों के आग्रह पर उसने रोमन कैथोलिक ईसाई बनने का निर्णय लिया। ईसाई धर्म में दीक्षा का यह समारोह सेंट ट्रोपेज के गिरजाघर में ही सम्पन्न हुआ और फ्रांस के तत्कालीन सम्राट और साम्राज्ञी ने उसमें पान देई के ‘गॉड-फादर’ और ‘गॉड मदर’ के रूप में शिरकत की थी। एक अन्य चर्चित फ्रांसीसी जनरल वेंचुरा ने इस आयोजन में अलार्ड-पविार की ओर से मेजबान की भूमिका निभाई। चंबा की वह मासूम, अशिक्षित राजकुमारी तब तक फ्रास के संभ्रांत परिवारों में शुमार हो चुकी थी। मगर अपने संस्कारों से वह मुक्त नहीं हो पाई। उन दिनों पेरिस के कुछ अखबारों में यह भी छपा कि पान देई अलार्ड तब भी अपने हिमाचली अंचल और भारतीय परिवेश के कुछ पर्व वहां मनाती रहीं। इसी बीच उसकी छोटी बेटी फेलिसी का निधन हो गया। फेलिसी का जन्म कोलकाता में हुआ था। पान देई ने पंजाबी परंपरा के अनुसार अपने विशाल आवास के उद्यान में ही उसकी अंतिम क्रिया संपन्न कराई। इसके लिए उसे सरकार से विशेष अनुमति भी लेनी पड़ी थी।

दस्तावेज बताते हैं अलार्ड सेंट ट्रोपेज में ही समुद्र के किनारे एक विशाल ‘एस्टेट’ खरीदा थी, जहां बाद में पान देई ने अलार्ड के स्मृति चिह्न और कुछ विशेष पेंटिंग प्रदर्शित की थीं। कहा तो यही जाता है कि पान देई ने स्वयं भी कुछ पेंटिंग बनाई थी। पान देई, दरअसल अलार्ड को कभी भुला नहीं पाई। वह तब भी पेशावर में अलार्ड की मृत्यु पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर पाई। एक लंबी अवधि तक वह हर शाम समुद्र के किनारे जाती और किसी जहाज से जनरल अलार्ड की वापसी के लिए घंटों मुंतजिर रहती। अलार्ड को भले ही अपने वतन की मिट्टी नसीब नहीं हुई और उसे लाहौर में ही दफ्न किया गया, लेकिन पान देई को अलार्ड के वतन की मिट्टी नसीब हुई। वह आज भी सेंट ट्रोपेज के कब्रिस्तान में अलार्ड-परिवार के मकबरे में दफ्न है। लाहौर वापसी से पहले जनरल अलार्ड ने 1835 में सेंट ट्रोपेज नगर में एक विशाल महल का निर्माण कराया था। ‘बन्नो पान देई महल’ के नाम से चर्चित यह संपत्ति अलार्ड ने अपनी पत्नी को पे्रम-उपहार के रूप में सौंपी थी। अब वहां एक विशाल होटल है जो किसी भारतीय महाराजा के महल सा लगता है। उसमें अत्याधुनिक हमाम और स्पा भी हैं और एक सुंदर सरोवर है जिसके किनारों पर भव्य ‘कॉकटेल’ बार बनी है। वहां का रेस्तरां समूचे सेंट ट्रोपाज के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है। पूरे अंचल में यह रेस्तरां फ्रेंच और एशियन भोजन के लिए भी चर्चित है। यह होटल 17वीं शताब्दी में बने एक विशाल किले ‘मुसी नेवल डि ला सिटाडेल’ से पैदल सात मिनट की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए क्रूज-जहाज और नौकाएं भी उपलब्ध हो जाती है।

अब थोड़ा अलार्ड के बारे में भी जानकारी ले लें। 1785 में सेंट ट्रोपेज में ही जन्मा ज्यां फ्रेंकोइस अलार्ड नेपोलियन की सेना में दो बार घायल हुआ था। उसे वीरता के सर्वोच्च सम्मान दिए गए। चर्चित वाटर लू-युद्ध के बाद वह पर्शिया चला गया। वहां के शासकों ने उससे जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हो पाए तो अलार्ड के कुछ मित्र सेना अधिकारियों ने उसे महाराजा रणजीत सिंह से मिलने का परामर्श दिया। महाराजा ने उसकी योग्यता और दक्षता से प्रभावित होकर उसे एक नई कोर के गठन का दायित्व सौंपा। जब यह ‘लांसर-कोर’ गठित हो गई तो महाराजा ने ‘जनरल’ का रैंक देते हुए उसे अपने प्रिय सलाहकारों और सेना नायकों में शामिल कर लिया। उसे महाराजा ने ‘स्टार-आफ पंजाब’ का सम्मान भी प्रदान किया। उन्हीं दिनों अलार्ड ने फारसी भी सीखी और कुछ दरबारियों की पे्ररणा से उसने फारसी में कुछ गजलें और नज्में भी लिख मारीं।

अलार्ड उन दिनों अक्सर कांगड़ा चला जाता। चंबा के प्राकृतिक सौंदर्य से वह बेहद प्रभावित हुआ। उन्हीं दिनों महाराजा के निमंत्रण पर वह राजमहल गया और वहीं पहली बार उसने राजकुमारी बन्नो पान देई को देखा। पान देई को भी अलार्ड के आकर्षक व्यक्तित्व ने प्रभावित किया। दोनों में उम्र का काफी अंतर था। इसी नाते सकुचाते हुए अलार्ड ने महाराजा से पान देई का हाथ मांगा। महाराजा स्वयं भी उन दिनों महाराजा रणजीत सिंह के समर्थक थे। उन्होंने पान देई का मन टटोला और इस रिश्ते पर अपनी सहमति दे दी। पान देई के साथ जब अलार्ड ‘सेंट ट्रोपेज’ लौटा तो महाराजा ने उससे वादा लिया कि वह कुछ समय बाद वापस लौट आएगा। जब वापस लौटा तो वह महाराजा के लिए कुछ विशेष हथियार वहां से लेकर आया, जिसकी चर्चा अक्सर महाराजा, दरबार में करते थे। महाराजा ने न केवल उन हथियारों का पूरा मूल्य चुकाया बल्कि अलार्ड के अवकाश को सवेतन अवकाश घोषित करते हुए उसे तीन हजार रुपए की अतिरिक्त राशि भी प्रदान की।

महाराजा के लिए पेशावर में लड़ते-लड़ते ही अलार्ड 23 जनवरी, 1839 को मारा गया था। उसका शव विशेष राजकीय सम्मान के साथ लाहौर लाया गया। वह महाराजा का इतना अधिक चहेता था कि उसकी मृत्यु की खबर महाराजा तक पहुंचाने में भी अधिकारी लोग संकोच कर रहे थे। उसके शव को पूरे राजकीय सम्मान के लिए लाहौर के कपूरथला हाउस के मैदान में उसी स्थान की बगल में दफ्नाया गया, जहां उसकी बेटी दफ्न थी। महाराजा रणजीत सिंह अलार्ड की मृत्यु से बेहद व्यथित थे। अपने प्रिय जनरल की मृत्यु के छह माह बाद ही महाराजा भी चल बसे थे। पेरिस में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के अनावरण समारोह जनरल अलार्ड और पान देई के वंशज विशेष रूप से उपस्थित थे। यह भव्य प्रतिमा एक भारतीय मूर्तिकार द्वारा ही बनाई गई थी।

 

 

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