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बचपन बिना बच्चे

बेशक संचार माध्यमों और सूचना तकनीक के तेजी से विकास के चलते बच्चों के सामने दुनिया हथेली पर रखी वस्तु की तरह हो गई है, पर इसने उनके जीवन में दुश्वारियां भी कम नहीं पैदा की हैं। आज का बच्चा, नया बच्चा, कैसा बन रहा है, उसका नया समाज कैसा होगा, आदि पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं शिवदयाल।

Author November 12, 2017 4:20 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

जब भी बालदिवस आता है, सरकारें और बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाएं बच्चों का बचपन लौटाने का दम भरती हैं। कुछ अभिभावक भी आत्मालोचन करते हैं। पर हकीकत यह है कि गांव हो या शहर, हर जगह बच्चों पर शिक्षा-व्यवस्था और उनके भविष्य की चिंताओं की भयावह छाया मंडराती रहती है। यह एक यातनादायी स्थिति है। बेशक संचार माध्यमों और सूचना तकनीक के तेजी से विकास के चलते बच्चों के सामने दुनिया हथेली पर रखी वस्तु की तरह हो गई है, पर इसने उनके जीवन में दुश्वारियां भी कम नहीं पैदा की हैं। आज का बच्चा, नया बच्चा, कैसा बन रहा है, उसका नया समाज कैसा होगा, आदि पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं शिवदयाल।

अपने बच्चों को हम जमाने की सर्द-गरम हवाओं से बचाने, दुनिया की विद्रूपताओं और विडंबनाओं को उनकी नजरों से ओझल रखने और बालमन के कोमल तंतुओं को क्षत-विक्षत न होने देने में किस हद तक सफल रहे हैं कि हम यह दावा कर सकें कि हमारे यहां बच्चे हैं और हम उनकी चिंता करते हैं?

अगर अबोधों (पांच वर्ष से कम आयु) को छोड़ दें तो बच्चे वास्तव में ‘बच्चा’ होने की अवधारणा के घेरे से बाहर आ गए हैं। हमने स्वयं उनके लिए जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कुछ भी वर्जित नहीं छोड़ा, मानो गणना की सुविधा के लिए बच्चों की भी एक कोटि है। अन्यथा बच्चा तो बड़ों की दुनिया और उसकी कारगुजारियों का द्रष्टा ही नहीं प्रत्यक्ष भोक्ता भी है। अब तो वह अवध्य भी नहीं रहा। एक अभिमन्यु की हत्या (वह भी युद्धभूमि में) के ग्लानिबोध से हमारा भारतीय मानस अब तक उबर नहीं सका था, लेकिन पिछली सदी के अंतिम दशक में हमारे इतिहास में सर्वथा पहली बार यह चलन एक परिघटना के रूप में सामने आया- पैसों के लिए बच्चों का अपहरण और उनकी हत्या, जो आज तक जारी है। यह किसी युद्ध या हिंसक संघर्ष का परिणाम नहीं था, यह याद रखना होगा। युद्ध और सामूहिक हिंसा से बच्चे हमेशा से प्रभावित होते आए हैं, लेकिन दैनंदिन के जीवन में उन्हें पाशविकता का शिकार नहीं बनाया जाता था। आज मनुष्य मनुष्य के विरुद्ध जितने भी प्रकार की हिंसा कर सकता है उससे बच्चे परिचित ही नहीं, उसके शिकार भी हैं। बच्चों के प्रति मूल्यबोध में यह परिवर्तन हमारी इस महान सभ्यता की एक और देन है, जिसने हमारी मनुष्योचित मर्यादाओं का कोई मान नहीं रखा, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने कितने संयम और संकल्प से अर्जित किया होगा। बच्चों (और स्त्रियों) के प्रति दृष्टि और व्यवहार इस मर्यादा की कसौटी था। आज हमें जरूर सोचना और विचार करना चाहिए कि सभ्यता के जिस स्तर को मनुष्य जाति ने अपने लिए सुलभ किया है, संवेदनहीनता और नृशंसता का वह निर्जीव पठार क्यों सिद्ध हो रहा है, उस पर मानो करुणा का एक तृण तक उगना कठिन है।

हम बच्चों की आंखों से दुनिया नहीं देखना चाहते, इसके उलट अपनी आंखों से उन्हें यह दुनिया दिखा रहे हैं और जो भी संभावना कल के लिए हो सकती है, उसे धुंधला कर रहे हैं। बच्चा वह सब कुछ देख रहा है, हमने उसे देखने के लिए छोड़ दिया है, जो हम अपने लिए भी नहीं देखना चाहते। बच्चा कहने की बात और करने की बात के बीच अंतर करना सीख गया है। सच बोलो, मेलजोल से रहो- यह कहने की बातें हैं, व्यवहार में झूठ और आक्रामकता का ही बोलबाला है। बच्चा हिंसा देख रहा है, हत्या देख रहा है, पोर्न देख रहा है, उसका हिस्सा बन रहा है। जो देख रहा है उसे भोगने को भी अभिशप्त हो रहा है। बहुत सारे बच्चे पढ़ नहीं पाते, बहुत सारे बच्चों को काम करना पड़ता है, बहुत से बच्चों को भरपेट भोजन नहीं मिलता और वे भूखे सोते हैं। अब इस कड़ी में यह जोड़ते हुए आत्मा सिहरती है कि बहुत से बच्चे भोग का सामान भी बनते हैं! और इतना कुछ होने के बाद बच्चे स्वयं ऐसे काम अंजाम न दें तो यह परम आश्चर्य की बात होगी। इसीलिए बच्चा हिंसा कर रहा है, उसमें क्रूरता आ रही है। यह (किशोर) हत्या और बलात्कार तक कर रहा है। किशोर अपराधियों की संख्या में वृद्धि तो हुई ही है, वे जिस प्रकार की जघन्य घटनाओं में जिस नृशंसता का परिचय दे रहे हैं वह हमारी सभी भौतिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों को मटियामेट करने वाला है।
हमारे भारी विविधता वाले देश में बच्चे भी विविध परिवेशों और जीवन-स्थितियों में रहते हैं- भिन्न आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, यहां तक कि भौगोलिक पृष्ठभूमि। यह भी गौर करने लायक बात है कि हमारे देश में तिहत्तर प्रतिशत बच्चे गांवों में और सत्ताईस प्रतिशत बच्चे शहरों में रहते हैं। देश की कुल आबादी का उनतालीस प्रतिशत बच्चे हैं। इस उनतालीस प्रतिशत अवयस्क आबादी में चौदह से अठारह की आयु वर्ग वाला हिस्सा देश की कामकाजी या युवा आबादी में योग करता है, जिसके दम पर आज भारत जनसंख्यात्मक लाभ की स्थिति में पहुंचा है। यह वह स्थिति है, जिसमें कमाने वाले अधिक और आश्रित कम होते हैं। आर्थिक विकास के संदर्भ में इसका विशेष महत्त्व है। यह भी जानना रोचक होगा कि देश में बच्चों की आबादी का उनतीस प्रतिशत 0-5 आयु वर्ग का है। ये आंकड़े यह संकेत करते हैं कि जब हम बच्चों की बात करते हैं, तो आबादी के एक बड़े हिस्से की बात करते हैं, जिसे बच्चों की बात कह कर हल्के में नहीं लिया जा सकता। इनकी स्थिति पर हमारी आबादी की गुणवत्ता निर्धारित होती है, केवल आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए भी। इनका भौतिक परिवेश, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य, जीवन के प्रति दृष्टिकोण और मूल्यबोध पर ही समाज और देश के कल का स्वरूप निर्भर करता है।

हमारे समाज में जो भी और जितने भी विभाजन हैं, जैसी भी विभेदकारी स्थितियां हैं, जिसका दबाव एक आम नागरिक पर है, वह एक बच्चे पर भी है- साधनसंपन्न और खुशहाल बच्चे से लेकर साधनहीन और विपन्न बच्चा। बहुत जतन से पाला जाने वाला बच्चा और किसी भी तरह पल जाने वाला बच्चा। बड़े, सुसज्जित भवनों और खेल के मैदान वाले पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा और शहर-देहात के सरकारी या प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा। पीठ पर बस्ते का वजन ढोने वाला बच्चा और पीठ पर कबाड़ ढोने वाला बच्चा। ये बच्चे अपने हिसाब से अपने-अपने दायरे में दुनिया देख रहे हैं, बड़े हो रहे हैं। यों तो समाज में काम करने वाले बच्चे भी हैं, लेकिन जो काम नहीं करते वे भी पढ़ने के नाम पर एक तरह से काम ही करते हैं। कामकाजी वयस्क सात-आठ घंटे काम करता है। एक बच्चा स्कूल में छह से आठ घंटा बिताने के बाद घर में भी काम- होमवर्क करता है। ऐसी आततायी व्यवस्था! कामकाजी व्यक्ति काम करते हुए डांट-मार नहीं खाता, लेकिन बच्चे को यह सुविधा नहीं। कोई भी बड़ा उसे नियंत्रित कर सकता है, उसे खास काम के लिए मजबूर कर सकता है, खालिस दैहिक शक्ति के बल पर।

इन्हीं परिस्थितियों में बच्चे पल रहे हैं, पल ही नहीं रहे, आपस में प्रतियोगिता कर रहे हैं एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए। बच्चे जब खेल के मैदान में नहीं हैं तब भी दौड़ रहे हैं, दौड़ में हैं। स्कूल में शिक्षक उन्हें दौड़ा रहे हैं, घर में अभिभावक उन्हें इसी दौड़ के लिए तैयार कर रहे हैं, उन्हें आगे निकलने के लिए ‘पुश’ कर रहे हैं, धकिया रहे हैं। बच्चे गिरते-पड़ते भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं। अपनी पीठ पर बस्ते के साथ हमारी उम्मीदों का बोझ उठाए, आंखों में हमारा सपना लिए, हमारे दिए लक्ष्य-बिंदु की ओर दृष्टि साधे दौड़ रहे हैं। मुंहअंधेरे उनकी दौड़ शुरू हो जाती है, जब वे नींद से झपकती आंखो को मसलते जागते हैं या जगाए जाते हैं। वे बर्गर, पिज्जा और मध्याह्न भोजन जीमते बड़े हो रहे हैं और हमारी कल्पना और अनुमान से अधिक हमारी दुनिया को देख रहे हैं। हम उन्हें ‘बच्चा’ समझते रहें भले, वे अपने को बच्चा नहीं समझते। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उनकी समझ बढ़ती है, यह दुनिया छोटी होती जाती है। चंदा मामा धरती का चक्कर काटने वाला उपग्रह बन जाता है, इतनी बड़ी और फैली हुई दुनिया सिमट कर हथेली पर आ जाती है। एक क्लिक में बच्चा समुद्र से अंतरिक्ष में आकाशगंगाओं की थाह लेने लगता है। जिस बच्चे की पहुंच में एंड्रायड फोन नहीं है वह भी ‘जन्नत की हकीकत’ समझने लगता है।

वैसे जिस ‘डिजिटल डिवाइड’ की बात होती है और जिसे पाटने और कम करने के दावे किए जाते हैं, वह बच्चों को दुनिया में बहुत स्पष्ट झलकता है। यह ‘इस पार’ और ‘उस पार’ का फर्क है। वैसे बच्चे सूचना तकनीक का इस्तेमाल हमसे बेहतर करते हैं। वे कम्प्यूटर और फोन का उपयोग बहुत तेजी से सीखते हैं। यह भिन्न पृष्ठभूमियों के बच्चों को जोड़ने की एक कड़ी भी है। बच्चे आपस में संवाद कर रहे हैं, हमसे कहीं तेज गति से, वे उन किलों को भेद रहे हैं, जिन्हें हमने उनके लिए ‘उनके हित में’ गोपन बना कर रखा है। लेकिन यह छुपना-छुपाना वास्तव में आत्मछलना है, वरना हमने कौन-सी चीज उनकी नजरों से छुपी रहने दी है! हर रोज कहीं न कहीं हो रहे धमाकों की गूंज उनके कानों में तैरती रहती है। हिंसा और दुराचार की खबरें उनकी संवेदना को झकझोरती हैं। टीवी चैनलों पर कंडोम का विज्ञापन उन्हें देह के रहस्यों में उलझाता है। बेईमान लेकिन शक्तिमत लोगों को पद-प्रतिष्ठा उनके मूल्यबोध और नैतिक सीख को प्रश्नों के घेरे में ले लेता है। बच्चे जब इस तरह बड़े हो रहे हों तब बच्चा रहने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।

बच्चों को शिक्षा चाहिए, संस्कार चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए, अच्छा वातावरण और परिवेश चाहिए, लेकिन इन सबके ऊपर उन्हें उनका बचपन चाहिए। कल जब वे बड़े होंगे तो बचपन को किस प्रकार याद करेंगे? उनकी स्मृति हमारी पीढ़ी के बचपन की स्मृति से कितनी भिन्न होगी! उसमें न अमराइयां होंगी, न कोयल की कूकें, न ताल-तलैया होंगी न खेल के मैदान में तितलियों के पीछे कुलाचें भरती संगी-साथियों की टोली। शहरों में तो बरामदों और बालकनियों में सिमट आया है खेल का मैदान। जमीन महंगी है। खुले मैदान पार्कों या स्टेडियमों में तब्दील हो रहे हैं, या वहां अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। ज्यादातर स्कूलों में उनके लिए खेलने की जगह या तो नहीं है, या अपर्याप्त है। हो भी क्यों, उनका तो खेल का समय पढ़ाई-कोचिंग और ‘प्रोजेक्ट वर्क’ में सोखा जा रहा है। हंसना-खेलना बच्चों का सबसे बुनियादी हक है और इसी बदौलत हमारी दुनिया फिर भी रहने लायक बची है, लेकिन इसकी भी वंचना! बच्चे यह सब झेलते बड़े हो रहे हैं और फिर भी हंस रहे हैं, क्योंकि रोना-पछताना नहीं बन पाता उनका स्थायी भाव। वे जब भी देखेंगे, तो चाव और दिलचस्पी के साथ ही देखेंगे दुनिया के रंग, चाहे उन पर हमारी उम्मीदों और दमित आकांक्षाओं का कितना भी भार क्यों न हो! बच्चों की दुनिया का बड़ों की दुनिया में मिल जाना, पूरी तरह समाहित हो जाना एक दुर्घटना है जिसकी परिस्थिति वर्तमान सभ्यता ने तैयार ही है, जो किलकारियों को अट्टहासों में बदलने पर अमादा है।

वास्तव में इतने समर्थ बच्चे इतनी तादाद में आखिर दुनिया में कब थे। उनकी कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता, साथ ही ठेस खाकर भी खेल में शामिल रहने की जिद उनकी विलक्षण ताकत है। हम इतना तो कर ही सकते हैं कि उनकी इस ताकत का उपयोग अपनी स्वार्थ-लिप्सा के लिए न करें। उन्हें इतना स्पेस तो दें जितना क्यारियों में लगे पौधों को देते हैं, ताकि उनका नैसर्गिक विकास हो सके। आखिर वे हैं तभी हमारा कल है। वही हैं, जो आतपों को उत्सव में बदल सकते हैं।बच्चों में ही हमारी संवेदनाओं को ठौर मिलता है। अभिभावक, स्कूल और सरकार को मिलकर सोचना और तय करना है कि हम बच्चों को उनका बचपन किस प्रकार सुलभ करा सकते हैं। चुनौती हमारे लिए यह है कि हम अपने बच्चों के लिए स्वयं उदाहरण बनने को तैयार हैं या नही! १

 

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