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प्रसंगवश- भरोसा खोते शब्द

कई लेखक और कवि अपने जबर्दस्त भाषा-कौशल और दुनियावी समझदारी के बल पर ऊंची-ऊंची बातें सोचते और लिखते हैं, फिर भी पढ़ने-सुनने वालों पर कोई असर नहीं होता।
Author January 7, 2018 05:32 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

विजय बहादुर सिंह

कई लेखक और कवि अपने जबर्दस्त भाषा-कौशल और दुनियावी समझदारी के बल पर ऊंची-ऊंची बातें सोचते और लिखते हैं, फिर भी पढ़ने-सुनने वालों पर कोई असर नहीं होता। पर ऐसे भी लोगों की एक उज्ज्वल विरासत है, जिनके सोचने और लिखने को दुनिया भूल ही नहीं पाती। इसके कारणों पर सोचें और रहस्यों की तलाश में जाएं तो कई बातों का पता लगता है।  आज से पांच-छह सौ साल पहले अनपढ़ संत कबीर ने कहा था-‘तू कहता कागद की लेखी / मैं कहता आंखिन की देखी।’ ‘आंखों देखी कहना।’ कोर्ट-कचहरी के मुहावरे में कहें तो चश्मदीद गवाह। वेद मंत्रों के रचयिताओं को ऋषि कहा जाता है। ऋषि कौन है, तो बताया जाता है वह जो मंत्रद्रष्टा है। यानी साक्षात्कारकर्ता। जिसने अपने सूक्ष्म और गंभीर अनुभवों के बल पर कुछ ऐसा महसूस किया और देखा, जो है तो सबका सच यानी लोकसत्य है, पर उसके मार्फत। तब गीता में वेदव्यास ठीक ही कहते हैं- ‘निमित्त मात्रं भव सव्यसाची।’ तुम तो निमित्त मात्र हो। ठीक युद्धों में तलवार या भाले या धनुष-बाण की तरह। इसके अलावा कुछ भी नहीं। लेकिन कुछेक का अहंकार इतना बढ़ा हुआ होता है कि वे मानते हैं कि यह दुनिया अगर है तो सिर्फ उनके चलते है।

हमारे पुरखों का संदेश अब हम तक नहीं पहुंच पा रहा। अपनी इस परंपरा के समक्ष हमने शायद अपनी पात्रता खो दी है। विज्ञान और तकनीक के युग ने हमारे भीतर जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास भर दिया है कि सृष्टि की तमाम शक्तियों को हमने पराजित करने का मन बना लिया है। धरती और आकाश हमारे दंभ की चपेट में आ चुके हैं। नदियों का जो हाल है, रोज-रोज उजड़ते जाते जो जंगल हैं, लापता होते जाते आसपास के पहाड़ हैं, सबके सब आज के सभ्य और विकसित कहे जाते मनुष्य की राक्षसी भूख के गवाह हैं। ऐसा ज्ञान-विज्ञान भला किस काम का? दंभ और अहंकार से जन्मा शब्द आज तक शायद यही करता आया है। है तो सचमुच यह भी जिया गया सच, पर विचार करें तो कुसच के अलावा क्या है? यह हमें बदलता तो नहीं, पर बिगाड़ता जरूर है। हद तो तब होती है, जब हम नागरिक न माने जाकर उपभोक्ता मात्र बचते हैं। सभ्यता के तमाम उत्पादनों का भोग, सिर्फ भोग करने वाले भोगी। बरसों की गुलामियों ने हमारे अवचेतन तक को इतना बदल डाला है कि हम अपने ही रचे शब्दों और उनके भीतर सांस लेते अर्थों तक को पहचानना भूल चुके हैं। हमारी अतिविकसित पढ़ाई-लिखाई ने हमें इस कदर योग्य बना दिया है कि हमें अपनी मौलिक सोच-समझ और सृजनशीलता के प्रति उदासीन और निष्क्रिय कर डाला है। तब अगर एक समाजवादी चिंतक यह कहने को मब्लर्ब:

लेखकों और कवियों की एक ऐसी प्रबल जमात पैदा हो गई है, जो समझने लगी है कि वह जो कुछ लिख और कह रही है, खुद उसके जीने की चीज नहीं है। वह तो परोसक मात्र है। वह इतना तटस्थ है कि खुद उसके ही शब्द उसे नहीं छू सकते। फिर किस बल पर वह यह उम्मीद लगाए रहता है कि दूसरे उसके असर में आएंगे और जीने लगेंगे!जबूर होता है कि ‘हम पराए संसार में रहने लगे हैं’ तो हमें बुरा क्यों लगता है? लगता है हम एक पराजित और गुलाम संस्कृति की पहचान हैं। सिर्फ अनुवाद या छायांकन / मूल नहीं। सचमुच क्या यही सच नहीं है? क्या इससे हमारी इज्जत बढ़ती है? तब गांधी ने जिस ‘हिंद स्वराज’ की बात की थी उसे हमने समझा क्यों नहीं? यानी अपनी तरह जीना और रहना, न कि किसी भूतपूर्व शासक  जाति की प्रति मात्र या फोटो कॉपी बन कर रहना। हमारा दैनिक जीवन-व्यवहार बाजार और दफ्तर भले दो सौ साल के अंग्रेजी कैलेंडर से चले, पर हमारी होली-दीवाली, दशहरा, वसंत पंचमी आदि तो भारतीय पंचांग से ही निर्धारित होते हैं। हमारी पारंपरिक जल-व्यवस्था में कुएं, तालाबों और बावड़ियों की जो व्यवस्था रही, अनुपम मिश्र ने अपने शोध और दृष्टि से उसे समूचे विश्व समाज के सामने रखा। उनके शब्द लोक के भरोसे के शब्द निकले। जैसे कि कबीर और तुलसी या फिर तुकाराम, गुरुनानक आदि के, जिन्हें हम कैसे भी भूल नहीं पा रहे। बार-बार उन शब्दों तक हमें जाना ही पड़ता है। यही हाल अमीर खुसरो का है। आज भी सारे कौव्वाल अपने-अपने तरीकों से उन्हें दुहराते चलते हैं। यह जो हमारा इनके प्रति भरोसा है, वह इसलिए कि वे जीकर लिखे गए शब्द हैं।

हिंद स्वराज में गांधी ने जो मूल बात कही थी वह यही कि अपनी समझ और सोच के साथ जियो। नकल या फिर उधार का नहीं। यही तो हिंदुस्तानी सभ्यता है। बाकी जिस पराई सभ्यता को वे सामने रखते हैं, उसे राक्षसी कहने से झिझकते भी नहीं। लेकिन आज की दिक्कत यही है कि पराई शिक्षा-पद्धति और जीवन-व्यवस्था की एक ऐसी बौद्धिक जमात यहां खड़ी हो चुकी है, जो आधुनिक भारत का नियामक बन चुकी है। उसकी पोल तब खुलती है, जब उससे बाकायदा कहा जाता है कि अपनी गद्देदार कुर्सियों, आरामदेह सोफों और वातानुकूलित कक्षों से निकल दो-एक दिन के लिए सही, गांवों में चले जाओ, जहां तुम्हें ऊंचे पलंग या तख्त मिलेंगे, खिली हवा मिलेगी, खेत-खलिहान भी मिलेंगे, पर वे सब किसी सैलानी जगहों की ओर गुप्त यात्राओं पर निकल जाते हैं। देश में नियामक बने बैठे लोगों या कथित रूप से लोकसेवकों का, अपने ‘लोक’ से यही रिश्ता है। इस रिश्ते को अगर कोई घोड़ा और घास का रिश्ता कहे, तो क्या यह सच नहीं है?

अब तो पढ़े-लिखे अच्छे साहित्यिक जन भी ‘देशी’ शब्द सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। हां, घी जरूर उन्हें देसी ही चाहिए। पर कुछ तो चाय की पत्ती तक विदेश की ही पसंद करते हैं। अपने भूगोल में अपने आसपास पैदा की गई चीजें उसी पर्यावरण में पली-पुसी विकसित हुई हैं, जिसमें हम भी साथ-साथ सांस लेते हैं। तब वैज्ञानिक तो यही है कि हमारा और चीजों का जो समापन है, उसे स्वीकार करें। पर इसमें आधुनिकता कहां दिखेगी। आधुनिकता ऐसे लोगों के लिए विदेश से आई हुई कोई चीज है। हमारी अपनी पैदा और विकसित की हुई नहीं। उधार की दृष्टि और उधार का जीवन। बात जरूर हम राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की करेंगे, पर इनके मर्म पर न सोचेंगे, न इनको अपने ऐसे आचारों से जोड़ेंगे, जिससे ये शब्द सार्थकता पा जाएं। क्या तब मान लें कि सार्थक जीवन हमें मंजूर नहीं। सिर्फ सफल जीवन स्वीकार है।  सार्थकता बड़ी बात है, यानी शब्द को अपने आचरण की पहचान बना देना या फिर अपने आचरण से शब्द को नए सिरे से अर्थ देकर भरोसेमंद बनाना।हमारा जमाना लेकिन काफी चतुर-सुजान है। वह इसकी दिक्कतें जानता है। इसलिए इसकी तरफ बढ़ता नहीं। रास्ता भी आड़ा-टेढ़ा और चुनौतियां भी भारी। कबीर ने तभी तो कहा- मेरे साथ चलना है तो पहले अपना बना-बनाया घर फूंको। घर माने क्या? वह, जो अब तक की तुम्हारी पहचान है। सोच है। समझ है। सबका सब। एकदम खाली हाथ आओ। तभी तो भरे जा सकोगे। अन्यथा भरे में क्या भरना।

दुखद है कि लेखकों और कवियों की एक ऐसी प्रबल जमात पैदा हो गई है, जो समझने लगी है कि वह जो कुछ लिख और कह रही है, खुद उसके जीने की चीज नहीं है। वह तो परोसक मात्र है। वह इतना तटस्थ है कि खुद उसके ही शब्द उसे नहीं छू सकते। फिर किस बल पर वह यह उम्मीद लगाए रहता है कि दूसरे उसके असर में आएंगे और जीने लगेंगे!
शब्द अगर उसकी आत्मा से फूटे नहीं हैं, तो वे सिवा कोरी ध्वनि के और क्या है? लेखक की अपने शब्दों से दूरी पाठकों को भी उन शब्दों के प्रति विमुख कर चुकी है। ०

 

 

 

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