ताज़ा खबर
 

झूठ और सच के बीच

कसर हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि वे हमेशा सच बोलें, झूठ बोलना बुरी बात है। अच्छे बच्चे वे होते हैं, जो कभी झूठ नहीं बोलते।
Author January 14, 2018 06:14 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कसर हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि वे हमेशा सच बोलें, झूठ बोलना बुरी बात है। अच्छे बच्चे वे होते हैं, जो कभी झूठ नहीं बोलते। मगर तमाम अध्ययनों में पाया गया है कि बच्चे अकसर डांट से बचने या किसी गलती के पकड़े जाने के डर से झूठ बोलते हैं। वे यह भी जानते है कि वे झूठ बोल रहे हैं। इसके अलावा वे यह भी देखते हैं कि जो माता-पिता उन्हें सच बोलने की शिक्षा देते हैं, वे अकसर ही झूठ बोलते हैं। इससे बच्चे यह भी सीखते हैं कि झूठ बोलना कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि उनके बड़े उनके सामने ही झूठ बोल रहे हैं। बच्चों को इस बात का अहसास होता है कि बस झूठ बोल कर पकड़ा जाना बुरी बात है। इस संदर्भ में हम सूरदास रचित श्रीकृष्ण की अनोखी बाल लीलाओं को भी याद कर सकते हैं। एक पद में श्रीकृष्ण कहते हैं- मइया मोरी मैं नहीं माखन खायो। श्रीकृष्ण जब यशोदा से यह कहते हैं तो यशोदा को भी पता है कि वे झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि जिस मक्खन को वे न खाने की बात कर रहे हैं, वह तो उनके मुंह पर ही लगा है और मुंह चोरी की गवाही दे रहा है। अकसर घरों में भी हम देखते हैं कि जब बच्चे किसी चीज को खाना नहीं चाहते तो वे पेट दर्द का बहाना बनाते हैं, बीमार होने के बारे में भी कहते हैं, या खांसी आने का बहाना बनाते हैं और खांस कर भी दिखाते हैं। कई बार वे मनपसंद चीज खाने के लिए भी ऐसा ही करते हैं। माता-पिता इस बात को समझते भी हैं, मगर बहुत बार वे इसे सचमुच बच्चों की लीला मान कर ही नजरअंदाज करते रहते हैं। इसे बच्चों का बालपन और उनका नटखटपन भी माना जाता है।
बच्चों के झूठ बोलने के बारे में 1980 में न्यूयार्क के मशहूर मनेवैज्ञानिक मिशेल लुइस ने एक प्रयोग किया था। इसमें विशेषज्ञों ने कुछ बच्चों के पीछे खिलौने छिपाए और उन्हें देखने, यहां तक कि उस तरफ झांकने से भी मना किया। फिर विशेषज्ञ वहां से चले गए। लेकिन नजरें उनकी बच्चों पर ही थीं।

उन्होंने देखा कि बच्चे कुछ ही क्षणों में उन खिलौनों की ओर देखने लगे। कुछ ही देर में विशेषज्ञ लौटे। उन्होंने बच्चों से पूछा कि क्या बच्चों ने उस तरफ देखा है जहां खिलौने रखे हैं। वे यह सुन कर हैरान रह गए कि ज्यादातर बच्चों ने इस बारे में ‘ना’ कहा। इस प्रयोग को अलग-अलग स्थानों पर सैकड़ों बच्चों पर बार-बार दोहराया गया और पाया गया कि बच्चे खिलौनों को देखने के बारे में झूठ बोल रहे थे। इनमें अलग-अलग उम्र के बच्चे थे। कुछ दो साल के, कुछ तीन के और अस्सी फीसद चार साल या उससे कुछ ज्यादा उम्र के थे। बच्चों की इस आदत में लड़के-लड़कियों का कोई फर्क नहीं था। उनमें रंगभेद और धर्मभेद भी नहीं था। यानी कि सब बच्चे चाहे वे लड़के थे या लड़कियां, अश्वेत थे या गोरे, गरीब थे या अमीर, सब एक ही तरह से झूठ बोल रहे थे। वे एक तरह से ही बर्ताव कर रहे थे। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि बच्चे बहुत अच्छी तरह से झूठ बोलते हैं। शोध में मजेदार बात यह कही गई थी कि बहुत बार बड़े इन झूठों को पहचान भी नहीं पाते। बच्चों के झूठ बोलने को लेकर किए गए अध्ययनों में यह जानने की भी कोशिश गई कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि कुछ बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही झूठ बोलने लगते हैं और कुछ ऐसा नहीं करते। इसका निष्कर्ष भी बहुत दिलचस्प था। शोध के मुताबिक झूठ बोलने वाले बच्चे, झूठ न बोलने वाले बच्चों के मुकाबले ज्यादा चतुर होते हैं। उनका आइक्यू यानी बौद्धिक गुणांक ज्यादा होता है। यही नहीं चीजों को समझने और तेजी से करने की क्षमता भी उनकी बहुत ज्यादा होती है। ये बातों को समझते भी जल्दी हैं और उन पर अधिक ध्यान देते हैं।

इन निष्कर्षों को पढ़ कर यह अहसास होने लगा कि क्या किया जाए। अगर इन दिनों अपने बच्चे को होशियार बनाना है, उसे जीवन में सफल बनाना है तो क्या अब से बच्चों को यह शिक्षा देनी चाहिए कि वे गलती से भी कभी सच न बोलें। जब बोलें तब झूठ ही बोलें। यही नहीं, बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों-कविताओं में भी क्या यही शिक्षा देनी पड़ेगी कि झूठ बोलना कितनी अच्छी बात है। कहानियों में सच या अच्छी बात की जगह झूठ और बुरी बात की विजय दिखानी पड़ेगी और क्या यह ठीक होगा। ऊपर जिस शोध का जिक्र हुआ है, उसके मुताबिक बच्चों को जिस काम के लिए मना किया गया (जैसे कि पीछे छिपाए गए खिलौनों की तरफ देखने के बारे में) वही उन्होंने किया और झूठ बोला कि खिलौने उन्होंने नहीं देखे। यानी कोशिश होनी चाहिए कि बच्चों को कम से कम मना किया जाए। हां, जो बातें, खेल, जल्दबाजी, जिससे कि उन्हें नुकसान पहुंच सकता है, उसके लिए तो मना करना ही पड़ेगा, वरना वे कैसे चट और नुकसान के बारे में जानेंगे। हालांकि इन बातों के बारे में शोध के नतीजे नहीं दिखाई दिए। लेकिन मान लीजिए की बच्चा भारी ट्रेफिक के बीच सड़क के बीचों-बीच खड़ा है, तो उसे मना करना पड़ेगा कि बीच सड़क पर नहीं सड़क के किनारे खड़े हो। दाएं-बाएं देख कर चलो। बच्चा आग को छू रहा है तो उसे रोकना ही पड़ेगा कि आग को न छुए, जल जाएगा। लेकिन इन सभी बातों के बावजूद कोशिश ज्यादा से ज्यादा यही होनी चाहिए कि बच्चों से हर बात पर ना नहीं किया जाए, जबकि हम बड़ों खासतौर से भारतीयों को हर बात में ना करने की बहुत आदत होती है। क्योंकि हम समझते हैं कि बच्चे की हर बात पर- हां- करने का मतलब है उसे बिगाड़ना। और अकसर होता ऐसा है कि बच्चे ना कहने को हां समझते हैं और उस बात को जरूर करते हैं, जिसके बारे में ना कहा गया।

चतुराई या बुद्धिमानी का बोझ आखिर बच्चे पर इस कदर क्यों लादा जाए कि अगर वह होशिायार नहीं तो जैसे जीवन में कुछ कर ही नहीं सकता। इसके लिए अगर वह झूठ बोल रहा है तो भी ठीक है। लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया कि अगर हमें बच्चों से यह उम्मीद है कि वे हमारे सामने सदा सच बोलें तो हम बड़ों विशेष तौर से माता-पिता की यह कोशिश जरूर होनी चाहिए कि बच्चों को सच सिखाते-सिखाते हम उनके सामने झूठ बोलकर अपनी चतुराई और स्मार्टनैस दिखाने की कोशिश न करें। वरना बच्चों को झूठ की शिक्षा लेने से कौन रोक सकता है।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.