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हिन्दी साहित्य और हिंदी समाज के बीच का रिश्ता लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। हाल के वर्षों में इन दोनों के बीच अलगाव तेजी से बढ़ा है।

Author April 20, 2017 1:11 PM

हिन्दी साहित्य और हिंदी समाज के बीच का रिश्ता लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। हाल के वर्षों में इन दोनों के बीच अलगाव तेजी से बढ़ा है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा में साहित्यिक पुस्तकों की चार-पांच सौ प्रतियां भी मुश्किल से बिक पाती हैं। बाजार ने हमारी संवेदनाओं को और तकनीक ने हमारे पठन-पाठन के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। साहित्य की दुनिया बहुत थोड़े से लोगों के बीच सिमट कर रह गई है। इन थोड़े से लोगों के बीच ही रचनाएं लिखी जाती है, पढ़ी जाती हैं, प्रशंसित होती हैं और महान भी बन जाती हैं। साहित्य की दुनिया से संबद्ध हर कोई इस संकट से वाकिफ है और चिंतित भी। साहित्यिक बिरादरी के सामने एक बड़ा प्रश्न यह है कि निरंतर खत्म होते साहित्यिक संस्कार और रुचि को कैसे बरकरार रखा जाए? बाजार और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के अझेल हमलों के बीच साहित्य को कैसे अपनी पूरी गरिमा और अर्थवत्ता के साथ अविचल रखा जा सके?

निसंदेह इस चुनौती से निपटने में सबसे बड़ी भूमिका प्रकाशकों की है। लेखक तो सिर्फ बेहतर लिख सकता है। उसके लिखे हुए का प्रचार-प्रसार करना और देश के कोने-कोने में फैले साहित्य प्रेमियों तक उसे पहुंचाना तो प्रकाशकों का ही काम है। आज के समय की असल समस्या अच्छी पुस्तकों का अभाव नहीं बल्कि उनका पाठकों तक न पहुंच पाना है। हिंदी प्रकाशन उद्योग का केंद्र दिल्ली है। यहां हिंदी के सभी बड़े प्रकाशक हैं। बावजूद इसके पूरी दिल्ली की यह हालत है तो अन्य शहरों की स्थिति का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है । छोटे-बड़े शहरों में लोग चाहते हुए भी न किताबों को देख पाते हैं, न खरीद पाते हैं। प्रकाशन के व्यवसाय से घर, गाड़ी सहित तमाम भौतिक सुविधाएं जुटा कर आभिजात्य जीवन जी रहे प्रकाशकों की इस बात में तनिक भी दिलचस्पी नहीं है कि हिंदी पुस्तकों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क तैयार किया जाए और हर शहर में पुस्तकों की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके।

यह स्थिति किसी को भी अचरज में डाल सकती है कि प्रकाशक पाठकों की पहुंच बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं करते हैं। सामान्य बुद्धि तो यही कहती है कि पुस्तकों के प्रचार-प्रसार और पाठकों के बीच सुगमता से उपलब्धता के कारण बिक्री बढ़ेगी और प्रकाशकों को लाभ होगा। तो क्या हिंदी का प्रकाशक लाभ कमाना नहीं चाहता? नहीं, वह खूब लाभ कमाना चाहता है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि वह सिर्फ और सिर्फ लाभ ही कमाना चाहता है। दरअसल, सच्चाई यह है कि हिंदी प्रकाशक को पाठकों तक पहुंचने की अनिवार्यता ही नहीं है। हिंदी का पूरा प्रकाशन उद्योग सरकारी खरीद पर निर्भर है। उसमें भी थोक खरीद पर अधिक। सरकारी खरीद के कारण ही किताबों के अनाप-शनाप दाम रखे जाते हैं। दाम रखते समय पाठक को नहीं सरकारी खरीद को ध्यान में रखा जाता है ताकि कम प्रति बेचकर भी अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जा सके। सरकारी खरीद ने लेखन की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया है। प्रकाशक इस आत्मविश्वास से भरा होता है कि वह रद्दी से रद्दी रचना को भी सरकारी खरीद में खपा देगा। उसके लिए लेखक की महत्ता सिर्फ सूची पत्रों में नाम देकर अपना ‘ब्रांड वैल्यू’ बढ़ाने तक सीमित है।

हिंदी का प्रकाशक बिना परिश्रम के ठोस लाभ कमाने में यकीन रखता है। पाठक केंद्रित व्यवसाय में मेहनत अधिक है। इसलिए वह पाठक रहित व्यवसाय को प्राथमिकता देता है। पाठकरहित व्यवसाय का एक रूप सरकारी खरीद है। इसका दूसरा रूप इस तथ्य में देखने को मिलता है कि हिंदी में नब्बे प्रतिशत लेखकों को कोई रॉयल्टी नहीं मिलती है। अधिकांश लेखकों के साथ तो कोई ‘कंटैÑक्ट’ भी साइन नहीं होता है। बहुत सारे लेखकों से पुस्तकें छापने के लिए पैसे लिए जाते हैं। दस हजार से पचास हजार तक रेट है। आप कितनी सौदेबाजी कर सकते हैं यह आप पर निर्भर है। पाठक रहित व्यवसाय का यह तीसरा रूप है। इधर चौथा रूप भी दिखाई देने लगा है। अब प्रकाशक पहले की तरह किताबों की प्रतियां छाप कर नहीं रख रहे हैं। लेखक को संतोष दिलाने के लिए दस-बीस प्रति छाप देते हैं। बाकी खरीद का ‘आर्डर’ मिलने पर छापते हैं। ऐसे में यह बहुत संभव है कि नई किताब की ही कोई एक प्रति पाठक खरीदने जाए तो उसे ‘आउट आॅफ प्रिंट’ बताया जाए।पाठक रहित प्रकाशन व्यवसाय की कुप्रवृत्तियों ने हिंदी में पुस्तक संस्कृति के विकास और संवर्द्धन में प्रकाशकों की कोई भूमिका हो सकती है, इस संभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। लोगों में साहित्यिक संस्कार पैदा करने के लिए प्रकाशक कोई पहल न करें, यहां तक की गनीमत है, पर प्रकाशक अगर साहित्यिक अभिरुचि और संस्कार को नष्ट करने लगे तो हद है। हिंदी के कुछ बड़े प्रकाशको ने भी इधर एक खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म दिया है जिससे पहले से ही संकटग्रस्त हिंदी साहित्य का संकट और बढ़ गया है। प्रकाशनों ने साहित्यिकता से रहित सतही मनोभावों की सतही गद्यात्मक अभिव्यक्ति को साहित्य के नाम पर सिर्फ छापना शुरू कर दिया है बल्कि उसका आक्रामक प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं।

साहित्य के स्वधर्म और स्वाभाविक गुणों और उद्देश्यों से रहित इन किताबों को साहित्यिक पुस्तकों पर तरजीह दी जा रही है। यह काम छुटभैए अनाम प्रकाशक करते तो कोई नोटिस लेने वाली बात नहीं थी क्योंकि फुटपाथों पर छोटे-मोटे अनजान प्रकाशनों से छपी ऐसी किताबों का बिकना सामान्य बात है। पर समस्या गंभीर तब बन जाती है जब यह काम वे प्रकाशक कर रहे हैं, जिनका साहित्यिक पुस्तकों के व्यवसाय पर लगभग सत्तर फीसद तक कब्जा है और आज जिनकी पूरी प्रतिष्ठा और अर्थतंत्र का आधार साहित्यिक पुस्तकें हैं। साहित्य का बाजार बनाने की जगह बाजार के अनुरूप तथाकथित साहित्य छापने की व्यवस्थित शुरुआत हिंदी में लप्रेक (लघु प्रेम कथाएं) सिरीज से हुई। इसके तहत ‘इश्क में शहर होना’ (रवीश कुमार), ‘इश्क में माटी सोना’ (गिरीश नाथ झा) और ‘इश्क कोई न्यूज नहीं’ (विनीत कुमार) जैसी उत्तेजक और छिछले आकर्षण वाली किताबें छापी गर्इं। इन किताबों का जोर-शोर से ऐसा प्रचार किया गया कि मानो साहित्य में नए युग की शुरुआत हो गई है। और यही भावी पीढ़ी का साहित्य है।  हिंदी के लगभग सभी क्लासिक रचनाओं को छापने वाला प्रकाशक इस कदर दृष्टिहीनता का शिकार हो सकता है, पहली बार महसूस हुआ। दृष्टि की तो सीमा हो सकती है पर दृष्टिहीनता का कोई अंत नहीं है। प्रकाशक को लगा कि पुरुषों की तुलना में स्त्री के अनुभव ज्यादा ‘इरोटिक’ और बिकाऊ होते हैं इसलिए उसने यात्रा-वृत्तांत के नाम पर अनुराधा बेनीवाल की किताब ‘आजादी मेरा ब्रांड’ को न सिर्फ छापा बल्कि उसे उस साल की श्रेष्ठ कृति (पांडुलिपि) का अपना सालाना पुरस्कार भी दिया। इस किताब को भी ऐसे प्रचारित किया गया कि जैसे इसी पुस्तक से हिंदी में यात्रा-साहित्य की शुरुआत हो रही है। सच्चाई यह है कि यात्रा-साहित्य की समृद्ध परंपरा में यह पुस्तक कहीं भी टिकती ही नहीं है। अतीत से छुटकारा पाने के लिए कोई इस किस हद तक जाएगा, अभी ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

अभी पिछले विश्वपुस्तक मेले में एक प्रकाशक ने क्षितिज रॉय की किताब ‘गंदी बात’ शीर्षक से ‘उपन्यास’ छापा है। इसके कवर पर ही लिखा है-‘प्यार में कुछ भी गंदा नहीं होता’ और बैक कवर पर लिखा है-‘एक लड़का था-कुछ लोफर, लफुआ, दीवाना-सा!…..।’ पाठकों को लुभाने के लिए कवर पर सिर्फ मनभावक तस्वीरों की कमी है। हो सकता है आगे की किताबों में इस संकोच से भी तौबा कर लिया जाए। जब हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशकों ने ‘लप्रेक’, ‘आजादी मेरा ब्रांड’ और ‘गंदी बात’ जैसी किताब छाप कर इनके पक्ष में आक्रामक प्रचार अभियान शुरू किया तो दूसरे प्रकाशकों को पिछड़ने का डर सताने लगा। वैसे भी ‘महाजनो येन गत: स पन्था:।’ अनुराधा बेनीवाल की किताब को टक्कर देने के लिए एक दूसरे प्रकाशन ने नीलिमा चौहान की ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ को मैदान में उतारा। भाषा के सतहीपन, अनुभवों की स्थूल अभिव्यक्ति और पुरुषों को आनंदित करने की दृष्टि से यह पुस्तक कई कदम आगे है। आप चाहे तो इसे ‘साफ्ट पोर्न’ भी कह सकते हैं, नहीं तो हिंदी में सर्वाधिक दुरुपयोग होने वाला शब्द ‘बोल्ड’ तो है ही। पारदर्शी प्लास्टिक में बंद इस किताब के बैक कवर पर पाठकों की उत्सुकता जगाने के लिए लिखा है, ‘सियाह में सफेद और सफेद में सियाह की शिनाख्त करने वालियों की चुटीली-चटकीली बकबक है ये किताब। उनके दिलों की खलबली जो थी अब तक अनसुनी-अनकही। जनाब किताब नहीं है, आतिश है, जलजला है।…..अपनी चाहतों और सपनों को बेहिजाब कर डालने वालियां, आफतों पर रोने की बजाय हंस सकने वालियां! हजरात यही हैं पतनशील पत्नियां !..’’ स्त्री के रोजमर्रा के अंतरंग अनुभवों की, स्त्री शरीर को लेकर आदमी की सोच को उर्दू की कामुक शब्दावली में कुछ इस तरह स्थूल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि कोई स्त्री की पीड़ा का अहसास भी न कर पाए।

इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है कि पढ़ते समय पुरुष को सिर्फ मजा आए। स्त्री पीड़ा के अहसास से उसका मन बेस्वाद न हो जाए। वर्णन शैली ठीक वैसी ही जैसे कोई यह चित्रित करे कि बलात्कार में स्त्री यौनानंद पा रही है। साहित्य के सनातन प्रश्नों में से एक प्रश्न रूप और अंतर्वस्तु के संबंध का है। इस पुस्तक के साक्ष्य पर कहा जा सकता है कि साहित्य के लिए रूप का प्रश्न विषयवस्तु को अलग-अलग रूप में अभिव्यक्त करने से नतीजे भी अलग-अलग होगें। वर्तमान रूप (भाषा, शब्द, चयन और शैली) के कारण यह पुस्तक ‘साफ्ट- पोर्न’ ही है। दूसरे रूप में यह स्त्री विमर्श की पुस्तक भी बन सकती थी। यह किताब इस बात की बेमिसाल उदाहरण है कि लेखकीय दृष्टिहीनता के कारण किस तरह किसी स्त्री का देखा, सुना और भोगा हुआ अनुभव ‘साफ्ट पोर्न’ में तब्दील हो जाता है और पुरुषों की संवेदनशीलता को झकझोरने की जगह कुत्सानंद में डुबो देता है।

शायद प्रकाशन की भी दिलचस्पी स्त्री के प्रति संवेदनशीलता पैदा करने में नहीं बल्कि स्त्री को ‘पण्य’ बना देने में है। प्रकाशक इस किताब का जिस तरह प्रचार-प्रसार कर रहा है वह अभूतपूर्व है। कुछ इस तरह की उसके पास अद्वितीय साहित्यिक कृति के रूप में एक मात्र किताब मानो ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ है और इसके सामने हिंदी की सारी रचनाएं दोयम दर्जे की है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से लेकर आईपी कॉलेज के साहित्योत्सव तक के दर्जनों आयोजनों में इसी किताब को महत्ता मिली। ‘वोटर माता की जय’(प्रतिष्ठा सिंह) और लतासुर गाथा (यतींद्र मिश्र) जैसी कुछ किताबों का जरूर थोड़ा-बहुत प्रचार प्रसार किया गया। पर ये किताबें भी साहित्यिक किताबें नहीं है। याद नहीं आता कि इधर के वर्षों में किसी प्रकाशक ने कभी बड़े-बड़े साहित्यकारों तक की किताबों के प्रचार-प्रसार के लिए इतने व्यापक स्तर पर कुछ किया हो। वह नरेंद्र सैनी की किताब ‘इश्क की दुकान बंद है’ पर परिचर्चा के लिए गोष्ठी कर सकता है पर अपने यहां से आई मुख्यधारा की साहित्यिक कृति पर चर्चा कराना उसे अतिरिक्त महत्त्व देना लगता है। उसे मालूम है कि स्वाभिमानरहित हिंदी के लेखक घनघोर उपेक्षा और अपमान के बावजूद भी उसके यहां करबद्ध खड़े रहेंगे। अनुभवों ने उसे यही सिखाया है।

इस तरह की किताबों को छापना और उसे वास्तविक साहित्य की कीमत पर तरजीह देते हुए प्रचार-प्रसार करना हिंदी साहित्य और उन साहित्यकारों के प्रति विश्वासघात है जिनकी किताबों को बेच-बेच कर आज ये इतने बड़े बन गए हैं। क्या नई पीढ़ी इसी तरह की किताबें पढ़ कर साहित्यिक संस्कार सीखेगी? सबसे दुखद बात तो यह है कि आज कोई इसका विरोध नहीं कर रहा है। वे लेखक-लेखिकाएं कहां हैं जो राजेंद्र यादव के स्त्री विमर्श को पानी पी-पी कर कोसते थे। ‘होना सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ शीर्षक पर राजेंद्र यादव के लेख पर तूफान खड़ा करने वाले लोग कहां हैं? वे कहां हैं जिन्हें नई पीढ़ी की लेखिकाओं की साहित्यिक रचनाओं में ‘सेक्स’ को लेकर मौज-मस्ती का भाव दिखाई देता है। वे इस तरह की किताबों को लेकर चुप क्यों हैं? स्त्री के माध्यम से घोर स्त्री विरोधी लेखन को ‘प्रमोट’ किया जा रहा है और सब चुप हैं। साहित्य का चीरहरण हो रहा है और महारथी चुप हैं। साहित्य के बड़े प्रकाशक अपने-अपने तरीके से साहित्य को बेदखल कर रहे हैं और सब चुप हैं। यह चुप्पी समझदारी नहीं कायरता है। इस चुप्पी का परिणाम हिंदी साहित्य के लिए आत्मघाती और दूरगामी होगा।

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