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शब्दार्थ- स्त्री, नारी और महिला

औरत के लिए हमारी भाषिक परंपरा में सर्वाधिक प्रचलित तीन शब्द हैं- स्त्री, नारी और महिला।

Author February 5, 2017 5:27 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

रवींद्र कुमार पाठक

औरत के लिए हमारी भाषिक परंपरा में सर्वाधिक प्रचलित तीन शब्द हैं- स्त्री, नारी और महिला। इनमें भी हमारी बोलचाल में ‘स्त्री’ और ‘महिला’ शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। संस्कृत में तो ये तीनों शब्द व्युत्पन्न (यौगिक) हैं, पर हिंदी में ‘नारी’ यौगिक शब्द (नर+ई) है, शेष रूढ़ हैं। इन शब्दों को ले कर हमारे शब्दशास्त्रियों ने जो माथापच्ची की है, उसमें उन के पुरुषवादी पूर्वग्रह और पितृसत्तात्मक रुझान साफ झलकते हैं।

स्त्री- यास्क ने अपने ‘निरुक्त’ में ‘स्त्यै’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति की है, जिस का अर्थ लगाया गया है- लज्जा से सिकुड़ना। यास्कीय व्युत्पत्ति पर दुगार्चार्य ने लिखा है- ‘लज्जार्थस्य लज्जन्तेपि हि ता:’। इस का भावार्थ है कि लज्जा से अभिभूत होने से औरत का एक पर्याय स्त्री है। यहां आपत्ति की बात यह है कि लजाना या शरमाना स्त्रियों का जन्मजात गुण तो है नहीं। अगर पुरुषवर्चस्वी सभ्यता में खास तरह के सामाजिकीकरण के तहत लड़कियों पर लज्जा का भाव आरोपित न किया जाए, तो वे भी लड़कों की तरह (कम से कम अपने जायज हकों के लिए) सामने वालों की आंखों में आंखें डाल कर बात करने में समर्थ हो जाती हैं, न कि छुईमुई गुड़िया बनी रहती हैं। सच तो यह है कि ऐसी व्युत्पत्तियां सभ्यताजनित स्थितियों को स्वाभाविकता प्रदान करने की दिशा में खड़ी हैं।
पाणिनि ने भी ‘स्त्यै’ धातु से ही ‘स्त्री’ की व्युत्पत्ति की है, पर इस धातु का अर्थ शब्द करना और इकट्ठा करना लगाया है- ‘स्त्यै शब्द-संघातयो:’ (धातुपाठ)। इसका आशय है कि औरत को स्त्री जैसी संज्ञा पुरुष की अपेक्षा उस के गप्पी, बकवादी या लड़ाकिन होने की लोकश्रुति के कारण दिया गया। पतंजलि ने पाणिनीय सूत्र का थोड़ा विस्तार करते हुए कहा है- ‘स्तन-केशवती स्त्री स्यात्लोमश: पुरुष: स्मृत:।’ यानी, स्तन-केश वाली स्त्री होती है और रोम वाला होता है पुरुष। स्तन तक तो ठीक है, पर ‘केश’ को स्त्री का चिह्न मानना कैसा ? स्त्री के बाल लंबे होना कोई प्राकृतिक गुण-धर्म तो है नहीं। इसके गहरे सांस्कृतिक कारण हैं। स्त्री सदियों से ‘सुंदर’ बनी रहने को बाध्य बना के रखी गई है, जिसका एक प्रमुख पैमाना बालों की लंबाई है। इस तरह से बाल लंबे रखने के मूर्त्त-अमूर्त्त दबावों के बीच जीती रही है वह। पतंजलि यह सीधा सच नहीं देख सके और ऐसी सरलीकृत परिभाषा दे कर कर स्त्रियों पर बाल बढ़ाने के दबाव डालने वाली ऐतिहासिक पंक्ति में शामिल हो गए।
स्त्री शब्द पर पतंजलि ने अन्य तरीके से भी विचार किया है-‘स्त्यायति अस्यां गर्भ इति स्त्री’ – यानी गर्भ की स्थिति अपने भीतर रखने के चलते वह स्त्री कहलाती है। वामन शिवराम आप्टे ने अपने ‘संस्कृत-हिंदी-कोश’ में भी कुछ ऐसा ही लिखा है-‘स्त्यायते शुक्रशोणित यस्याम्’ – स्त्यै+ ड्रप् + डीप्)। पतंजलि ने यह भी कहा है- ‘शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धानां गुणानां स्यानं स्त्री’ ( शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध आदि गुणों का स्यान यानी समुच्चय स्त्री है। यह भी स्त्री की देहवादी व्याख्या हुई। पतंजलि के इस वचन का भी पुराना स्रोत है- ऋग्वेद (1-16-16) पर यास्क-कृत टीका-‘ स्त्रिय: एव एता: शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धहारिण्य:’ (निरुक्त)। यह प्राकृतिक सच है कि स्त्री के शब्द-स्पर्श-रूपादि विषयों का ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से ग्रहण कर पुरुष अपनी मानसिक तृप्ति करता है। इसी तरह, स्त्री भी पुरुष के शब्दादि से अपनी मानसिक तृप्ति करती है। पर, कुछ भी रुचने या तृप्त होने के स्त्री के जन्मजात अधिकार की अनदेखी और उपेक्षा के साथ पुरुष-प्रधान समाज में सारी परिभाषाएं खड़ी हुईं । प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् वाराहमिहिर ने अपने ग्रंथ में यहां तक बढ़ कर घोषणा कर डाली कि ब्रह्मा ने स्त्री के सिवा ऐसा कोई रत्न नहीं बनाया, जो दिखाई देने, सुनाई देने, स्पृष्ट होने या स्मरण में भी आने पर सुखदायी हो- ‘श्रुतं दृष्टं स्पृष्टं स्मृतमपि नृपां ह्लादजननं न रत्न स्त्रीभ्योन्यत् क्वचिदपि कृतं लोकपतिना।’ (वृहत्संहिता) ये सारी परिभाषाएं स्त्री को केवल देह और उसे पुरुष हेतु मनोरंजन-सामग्री मानने की सोच की प्रतिध्वनियां हैं।

स्त्री शब्द से ही विकसित हुआ है लोक-भाषाओं में आया ‘त्रिया’ या ‘तिरिया’ शब्द। (‘तुम्ह तिरिया मति हीन तुम्हारी’- ‘पद्मावत’)। यह संभवत: ‘स्त्रियश्चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम् देवो न जानाति कुतो मनुष्य:’ आदि प्रयोगों में आए ‘स्त्रिय’ का विकास है। इसी से बना समस्त पद ‘तिरियाचरित्तर’ समाज में खूब चलता है । इस में स्त्री के व्यक्तित्व का स्वीकार तो है, पर बेहद नकारात्मक रूप में। मसलन, स्त्री झगड़ालू, बकवादी, बेवफा, विवाहेतर संबंध रखने वाली, रहस्यमयी, अविश्वसनीय आदि होती है। इन्हीं दुगुर्णों व तज्जनित लक्षणों को समेकित रूप में ‘तिरियाचरित्तर’ कहा जाता रहा है, जो स्त्रियों की सामूहिक बदनामी और अपमान का सूचक है। सच तो यह है कि पितृसत्ता के प्रत्यक्ष दमनों और छल-छद्मों से भरी विषम परिस्थितियों में घिरी स्त्रियों की स्थिति दांतों के बीच जीभ की सी रहती है। उसमें अपने अस्तित्व-रक्षा के लिए भी वे जो कुछ करती हैं या सहज ढंग से सांस भी लेती हैं, तो मर्दवादी भाषा में उसे ‘तिरिया-चरित्तर’ कह दिया जाता है।

नारी- वैदिक शब्द नहीं है। हां, ‘नृ’ / ‘नर’ का प्रयोग ‘वेद’ में मिलता है, जिसका अर्थ वीर, नेता आदि है। ‘नृ’ शब्द तब स्त्री-पुरुष सब को समेट कर मानव-मात्र का वाचक था। उसी से पुंल्लिंग ‘नर’ (नृ+अच्) बना, जिस में ई प्रत्यय जोड़ कर ‘नारी’ शब्द सिद्ध किया गया। इस प्रकार की व्युत्पत्ति से साफ जाहिर होता है कि नर के समक्ष नारी गौण या हीन है।महिला- यह ‘मह्’ धातु (आदर, पूजा करना) से व्युत्पन्न माना गया। इसका अर्थ हुआ आदरणीया या पूज्या। लेकिन, आप्टे-कोश में इसके अर्थ में स्त्री के साथ, मदमत्त या विलासिनी स्त्री भी दिया गया है। ‘महिला’ शब्द मूलत: स्त्री की महिमा या समाज में उस की बुलंद हैसियत को रेखांकित करने वाला शब्द लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह उस युग या देशकाल की छाया है, जिस में मातृसत्तात्मक व्यवस्था या मातृवंशी- मातृप्रधान समाज अस्तित्व में रहा होगा। तब स्त्री की सामाजिक और आर्थिक सत्ता मजबूत थी और वही समाज का नेतृत्व करती थी। समाज की वंश-परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए वह अपनी पसंद से पुरुषों का वरण करती थी और संतान पर अधिकार उसी का रहता था। तब समाज में पिता जैसा पद महत्त्व नहीं रखता था। बाद में पितृसत्ता के उभार से स्त्री का वह स्वातंत्र्य और महत्त्व आदर की वस्तु नहीं रह गया और उसकी निंदा होने लगी। उसी दौर में ‘महिला’ के अर्थ में विलासिनी-मदमत्त स्त्री के भाव जोड़े गए होंगे। जैसे-जैसे पितृसत्तात्मक समाज आकार लेता गया, स्त्री दोयम दर्जे की होती गई। उसकी मुख्य पहचान पुरुष की वंश-परंपरा को जारी रखने वाली मशीन और पुरुष के कार्य में सहायक और उसके मनोरंजन तथा भोग का सामान बनने वाली हो कर रह गई। इसका प्रभाव उसके लिए वाचक शब्दों के विकास और उनके लिए निर्धारित की गई व्युत्पत्तियों पर भी पड़ा। १

 

 

 

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