ताज़ा खबर
 

आधी आबादी: अंतर की वजह

तकरीबन 300 महिलाएं प्रतिदिन प्रसव के दौरान या गर्भावस्था की अन्य जटिलताओं के कारण जीवन समाप्त कर बैठती हैं।

Author January 29, 2017 1:01 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

मेधा

जनम लिया तो जले पिता-मां, यौवन खिला ननद-भाभी
ब्याह रचा तो जला मोहल्ला, पुत्र हुआ तो बंध्या भी
जले हृदय के अंदर नारी
उस पर बाहर दुनिया सारी
मर जाने पर भी मरघट में, जल-जल उठीं लकड़ियां रे।…

गोपाल सिंह नेपाली की कविता ‘बाबुल तुम बगिया के तरुवर’ की ये पंक्तियां आज भी कितनी प्रासंगिक हैं। पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज में बहुत सारे बदलाव हुए हैं, जिसने समाज के ताने-बाने को काफी हद तक बदला है। लेकिन जब हम स्त्री के जीवन को इन परिवर्तनों की रोशनी में देखते हैं तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। आज भी हमारे देश में कन्या भू्रण हत्या एक क्रूर सच्चाई बनी हुई है। अगर मां की कोख से किसी मानिंद कन्या शिशु बाहर आ भी जाती है तो उसके पांच साल की उम्र पार करने की उम्मीद बालक शिशु की तुलना में कम रहती है।
अधिकांश तस्वीर बदरंग नजर आती है। वैश्विक जेंडर गैप के पैमाने पर स्वास्थ्य और उत्तरजीविता (सरवाइवल) के मानकों के लिहाज से भारत का स्थान सबसे आखिर (134वां वां) है। भारत में औसतन महिलाएं(54 साल) पुरुषों (53 साल) से मात्र एक साल ज्यादा जीवित रहती हैं। ‘द इंडिया जेंडर गैप रिव्यू’ के विशेष संस्करण में कई आंकड़ने सामने आए हैं। स्वास्थ्य के पैमाने पर जेंडर गैप के मानकों के लिहाज से भारत में स्त्री-पुरुष के बीच अंतर 93 फीसद, शिक्षा के मामले में 84 फीसद, आर्थिक प्रतिभागिता के मामले में 41 फीसद और राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में 27 फीसद है।

भारत में मात्र 42 फीसद प्रसव स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में होते हैं। तकरीबन 300 महिलाएं प्रतिदिन प्रसव के दौरान या गर्भावस्था की अन्य जटिलताओं के कारण जीवन समाप्त कर बैठती हैं। जन्मकालिक लिंगानुपात के लिहाज से भी भारत का स्थान दुनिया में बहुत नीचे (131वां) है। भारत में प्रति हजार जीवित शिशुओं के सापेक्ष प्रसव के दौरान 56 बच्चों और 61 बच्चियों की मौत हो जाती है। बालिका शिक्षा के मामले में भी स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। शैक्षिक परिलब्धि के पैमाने पर भारत का स्थान पूरी दुनिया में 121वां है। भारत में स्त्री की साक्षरता दर 53 फीसद और पुरुष की 76 फीसद है यानी लैंगिक अनुपात में बड़ा अंतर है। तकरीबन 24 करोड़ 50 लाख महिलाएं लिखना-पढ़ना नहीं जानतीं। प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर की शिक्षा में भी भारत में स्त्री-पुरुष के बीच काफी अंतर है। दो लड़कों के सापेक्ष एक ही लड़की स्कूल जा पाती है। यही स्थिति स्कूली पढ़ाई छूटने के मामले में भी है। महिला कार्यशक्तिकी प्रतिभागिता जहां 36 फीसद है, वहीं पुरुष की 85 फीसद। यही स्थिति आमदनी के मामले में भी है। महिला की औसत सालाना आमदनी पुरुष की आमदनी से दो तिहाई कम है।

लैंगिक समानता की तस्वीर का चमकदार हिस्सा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा है। साल 1993 में संविधान का 73वां (पंचायत) संशोधन विधेयक पारित हुआ और इस संविधान संशोधन से जमीनी स्तर की दस लाख महिलाएं आनन फानन में राजनीतिक मशीनरी का हिस्सा बन गर्इं। कहानी का एक चमकदार पहलू जुड़ता है नेतृत्व के शीर्ष पदों पर बैठी महिलाओं के रूप में। आजादी के बाद के कुल पचास वर्षों में करीब सोलह साल देश के राजनीतिक शीर्ष पर एक महिला विद्यमान रही और राजनीतिक नेतृत्व के इस संदर्भ में भारत का स्थान विश्व में चौथा है। महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के पैमाने पर भारत की वैश्विक स्थिति में 24वां स्थान है। दुनिया के दूसरों देशों की अपेक्षा तनिक मजबूत है और इस मामले में जेंडर गैप की स्थिति 27 फीसद है। भारत में महिलाएं संसद की कुल 11 और मंत्रीस्तर के कुल 10 फीसद पदों पर काबिज हैं और इस मामले में ग्लोबल जेंडर गैप के लिहाज से भारत का स्थान क्रमश 100वां और 93वां है।

राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक प्रतिभागिता में बेहतर होने के बाद भी घर के भीतर और बाहर, अपनों या परायों द्वारा बालिकाओं या वयस्क महिलाओं का हो रहा यौन उत्पीड़न और दूसरी तरह की हिंसा के आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं। बहुत कुछ बदल रहा है, लेकिन इन बदलावों की लहरों के भीतर कहीं गहरे कुछ अब भी ठहरा हुआ है।
वह है, भारतीय पुरुष का मन। और मन बदलना दुरूह प्रक्रिया है। इसके लिए पुरुषों को गहरी साधना करनी पड़ती है, तब जाकर कहीं अपने को नया रच पाता है पुरुष – जैसे कि गांधी, जैसे कि ज्योतिबा फुले…। यह मन जब तक नहीं बदलेगा तब तक भारतीय स्त्री के संघर्ष की यह कहानी अकथ चलती रहेगी ! ०

 

 

मेधा

ओडिशा में ट्रांसजेडर महिला ने रचाई पुरूष से शादी

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App