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भाषा- अनुवाद की लैंगिकता

संरचना का आभास बाइबिल की एक कथा में मिलता है, जिसमें पुरुष के शरीर से एक पसली निकाल कर स्त्री की रचना करने का जिक्र किया गया है।

Author April 30, 2017 5:14 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

 रवींद्र कुमार पाठक

अ नुवाद’ शब्द आमतौर पर एक भाषा में प्रस्तुत कथ्य को दूसरी भाषा में ढालने के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन, ‘अनुवाद’ का अर्थ-विस्तार भी खूब हुआ है, जिसके अनुसार न केवल भाषांतरण, बल्कि संक्षेपीकरण, जटिल कृति के सरलीकरण, विधा-परिवर्तन आदि को भी अनुवाद कहा जाता है। मूल कृति और अनुवाद के बीच अक्सर मौलिकता (प्रधानता और द्वितीयकता; गौणता) का संबंध माना जाता है। यानी साहित्य या वांग्मय के विभिन्न संदर्भों में अनुवाद को ‘मूल’ के सापेक्ष कुछ नीचे का दर्जा प्राप्त है ।  ‘मूल’ और ‘अनुवाद’ के इस सोपानीकृत रिश्ते को अगर हम वर्तमान विश्वव्यापी समाज-संरचना के संदर्भ में देखें तो यह खुद ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ के रिश्ते के रूप में परिणत दिखाई देता है। यह कहना सर्वथा उचित है कि जीववैज्ञानिक और तदाधारित आदिम समाजवैज्ञानिक यथार्थ से स्त्री मूल है, जिसका अनूदित संस्करण है पुरुष। लेकिन, समाज के ऐतिहासिक विकास-क्रम में मूल और अनुवाद का यह अनुक्रम क्रमश: उलटता गया और आगे चलकर पितृ-वर्चस्व से आक्रांत समाज-संरचना स्थापित होती गई, जिसमें पुरुष और स्त्री की परिस्थितयां मूल और अनुवाद वाली होती गर्इं।

इसी बदली हुई संरचना का आभास बाइबिल की एक कथा में मिलता है, जिसमें पुरुष के शरीर से एक पसली निकाल कर स्त्री की रचना करने का जिक्र किया गया है। इस स्थिति को समाजशास्त्र में मातृसत्तात्मक-मातृवंशी व्यवस्था की जगह पितृसत्ता के उभार और स्थापना के रूप में समझा गया है। पितृसत्ता के विकास ने मां की मौलिकता को नकार कर उसे महज ‘बाप की बीवी’ बना दिया। सुसन्ने द लोबिनेर हावुड की यह उक्ति ,‘ मैं एक अनुवाद हूं, क्योंकि मैं एक स्त्री हूं।’ हो, या नोर्ड वार्ड जोव का यह कथन, ‘अनुवादक मात्र स्त्री-स्तर का लेखक है।’ दोनों इसी सामाजिक यथार्थ को कुछ सकारात्मक या नकारात्मक रूप में अभिव्यक्त-से करते हैं। आमतौर पर किसी अनुवाद के प्रामाणिक होने की मूलभूत शर्त उसके मूल-अनुगामी और वस्तुनिष्ठ होने को माना जाता है। लेकिन, यह मान्यता अनुवाद के सिद्धांतकारों द्वारा कभी-कभी जिस काव्यमय रूपक में भी अभिव्यक्त होती रही है, वह पर्याप्त स्त्रीविरोधी है। ‘अनुवादक पतिव्रता स्त्री की तरह होता है।’ वस्तुनिष्ठता पर ही जोर देते हुए फ्रांसीसी चिंतक मेनेष ने कहा है, ‘अनुवाद स्त्री है। सुंदर है तो विश्वसनीय नहीं, विश्वसनीय है तो सुंदर नहीं।’ मेनेष कहना चाहते हैं कि अनुवाद की प्रामाणिकता उसके पुनर्सृजन (काव्यात्मक परिणति) से रहित होने यानी यथावत अवतरण (वस्तुनिष्ठ परिणति) में है। पर, इस सैद्धांतिक प्रतिपादन के लिए उन्हें परंपरा-प्राप्त स्त्रीविरोधी सोच में ढली उक्त आलंकारिकता का सहारा लेना पड़ा है।

अपने कथन को सुंदर बनाने के चक्कर में, उसे खुद के अनुसार ही उन्होंने विश्वसनीय नहीं रहने दिया है। मेनेष की उक्त उक्ति के संदर्भ में उनके अंध प्रशंसकों ने यह जोड़ते हुए नहले पर दहला मारा कि महान कलाकारों और साहित्यकारों में इसी वजह से कोई स्त्री शामिल नहीं रही है। उनके अनुसार एक साथ खूबसूरत और अक्लमंद होना स्त्रियों की नियति में नहीं है। सच कहें तो यह बिल्कुल वाहियात तरह का विमर्श है।कारण कि एक तो इस तरह की ‘खूबसूरती’ और ‘अक्लमंदी’ की दोनों ही अवधारणाएं मूढ़ पुरुषवादी विचारधारा की निर्मितियां हैं, साथ ही स्त्री के लिए उस ‘खूबसूरती’ को अनवार्य बताना निहायत गैरअक्लमंदी की निशानी है। अनुवाद को लेकर परंपरा के खोल में फिट, लिंग-संदर्भित विमर्श के अन्य नमूने भी दिख सकते हैं। किसी मूल कृति के अनुवाद में यदि आशय-संबंधी कुछ हेर-फेर या भाषाई व्यतिरेक नजर आता है तो ऐसा विमर्श आम हो सकता है, जिसमें हर मूल कृति को स्त्री, उसके रचनाकार को पिता (कहीं-कहीं माता भी) या पति तथा अनुवादक को उसके जीवन में दखल देने वाले बाहरी व्यक्ति (पुरुष) की तरह मान कर परंपरागत यौन-नैतिकता से सनी वह सैद्धांतिकी भी स्थिर की जा सकती है, जिसमें उक्त अनुचित अनुवाद को बलात्कार-सा निंदनीय मानते हुए, पाठ की पवित्रता की रक्षा पर सारा जोर होता है। इस तरह के विमर्श के पीछे निश्चित रूप से पुरुष व स्त्री को लेकर परंपरागत सत्ता-संरचना (उच्च-निम्न, शासक-शासित आदि) का बोध कार्य करता है । परिस्थिति यदि कुछ भिन्न हो, यानी मूल के रचनाकार और अनुवादक दोनों स्त्री ही हों, तो इस तरह का विमर्श असंभव हो जाएगा।

अनुवाद और स्त्री के संबंध पर विचार के कई पहलू हो सकते हैं। स्त्री-विमर्श और स्त्री-सशक्तीकरण के संदर्भ में ‘अनुवाद’ की ऐतिहासिक महत्ता सिद्ध है । इस तथ्य से इनकार करना मुश्किल है कि स्त्री-विमर्श की चिनगारी को हवा देने, उसके संवेदनात्मक व ज्ञानात्मक पक्षों के आदान-प्रदान या उन पर आधारित या उनसे प्रेरित स्त्री-संगठन की रचना करने और राजनीतिक संघर्ष को जगाने, फैलाने और स्थिरता प्रदान करने में अनूदित कृतियां उत्प्रेरक-उत्तेजक की भूमिका निभाती रही हैं। अनुवाद चाहे किसी रूप में किसी प्रकार का हो, लेकिन उसमें लिंगगत प्रश्नों का विचार करना सभ्यता-समीक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि लिंगभेदी विषम समाज के लैंगिक-न्यायपरक पुनर्गठन के लिए भी एक निहायत जरूरी उपक्रम होगा। मूल भाषा-प्रारूप में अगर लिंगगत असमावेशी प्रयोग हुए हों तो अनुवादक के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वह अनूदित कृति (लक्ष्य भाषा-प्रारूप) में आवश्यक लिंगगत समावेशन का कार्य करे। यानी अगर कोई पाठ मौजूद हो, जिसमें सार्वभौम मानवीय सत्य की बात की जा रही हो, पर प्रकटीकरण की भाषा ऐसी हो जो उसे व्यक्ति-मात्र का सत्य की जगह पुरुष के सत्य जैसा बता रहा हो तो उसके अनुवादक का यह दायित्व है कि वह पुरुष का अनुवाद व्यक्ति के रूप में । इसे हम अनुवादक की रचनत्मकता या पुनर्सर्जना के रूप में समझ सकते हैं। कभी ऐसा भी हो सकता है कि मूल भाषा में लिंग-समावेशी शब्द (व्यक्ति) का प्रयोग

एकलिंगी संदर्भ (कभी मर्द, तो कभी औरत के अर्थ) में हुआ हो तब अनुवादक का दायित्व यह है कि संदर्भ के अनुसार उसका अनुवाद कभी ‘मर्द’ तो कभी ‘औरत’ करे । अनुवाद को लेकर ऐसा मामला इस शब्द-विशेष तक सीमित नहीं होता। अनुवादक द्वारा किया जा रहा पुनर्सृजन नवाचार या खोज की जगह आविष्कार के रूप में भी घटित हो सकता है। अनुवादक के लिए कभी-कभी मूल कृति के सर्वथा अभावात्मक पहलू (जो विचार व संवेदना के विवरण या चित्रण से संबद्ध हो) को भी अनूदित कृति में स्वकल्पना से लाना पड़ सकता है।  इसका कारण है कि यह सर्वज्ञात है कि उक्त लेखकों का मूल विचार-संदर्भ स्त्रीपक्षीय है, लिंग-संबंधी किसी असमावेशी वर्णन को लेखक की मूल सोच या दृष्टि मानने की बजाय उस-उस जगह पर लेखकीय चूक मानना ठीक होगा, जिसका सुधार अनुवादक द्वारा होना अपेक्षित है। जिन कृतियों को कभी स्त्रीविरोधी कह कर छोड़ दिया गया, उनके भी गहन पाठ से संभव है कि कुछ स्त्रीपक्षीय सच्चाइयां निकल आएं। अनुवाद के लिए उनका बाह्य-आंतरिक समग्र वाचन अब जरूरी होता है।

अनुवाद में लिंगगत प्रश्नों पर विचार के संदर्भ में अक्सर यह सिद्धांत भी दिया जाता है कि स्त्रियों द्वारा रचित या स्त्रीपक्षीय रचनाओं का अनुवाद स्त्रियों के द्वारा ही किया जाए। पर, अनुभव बताता है कि यह एक अतिवादी विचार है। कारण, स्त्री होना और स्त्री-संवेदी या स्त्रीवादी होना सदा पर्याय नहीं हैं। अगर स्त्री-संवेदी या स्त्रीवादी होने की जरूरत की पूर्ति हो भी जाती है, तो भी यह पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मूल और लक्ष्य-भाषा-प्रारूप में दक्षता के साथ, संदर्भ, उद्देश्य और लक्ष्यीभूत पाठक आदि का खयाल रखना भी बड़ी जरूरत है।
लिंग-विमर्श के संदर्भ में, आज की एक बड़ी जरूरत है, ‘दो लिंगों-स्त्री और पुरुष’ वाले विश्व की मान्यता से आक्रांत इस समाज में अन्य लिंगों को भी माकूल जगह देना और अब लिंग-संघर्ष और लिंग-संवाद को द्विकोणीय (स्त्री-पुरुष के बीच) की जगह त्रिकोणीय या बहुकोणीय मानना और बनाना। कहना नहीं होगा कि सभ्यता-संस्कृति के तमाम अधिष्ठानों और अनुष्ठानों के साथ-साथ, भाषा-विमर्श और उसके एक खास क्षेत्र अनुवाद के संदर्भ में भी यह दृष्टि बेहद प्रासंगिक होगी । १

 

 

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