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विमर्श- अवरुद्ध सहृदयता

एक बार जिज्ञासा हुई कि निराला की तुलना में मुक्तिबोध क्या हैं, कहां हैं? यह 1966 की बात है।
Author August 13, 2017 00:30 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

विजय बहादुर सिंह

एक बार जिज्ञासा हुई कि निराला की तुलना में मुक्तिबोध क्या हैं, कहां हैं? यह 1966 की बात है। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी से इस बारे में पूछा। वे नए कवियों वाली अपनी लेखमाला पर शिव सहाय पाठक को डिक्टेशन दे रहे थे। मेरे प्रश्न के उत्तर में उन्होंने मुस्कराते और विहंसते हुए कहा, ‘मुक्तिबोध निराला की जेब की चवन्नी हैं।’ पर डिक्टेशन देते हुए लिखवाया- ‘मुक्तिबोध निराला और राहुल की जाति के लेखक और कवि हैं। विद्रोह और नएपन में उनकी ख्याति है और रहेगी।’  यह भी कि ‘निराला की अपेक्षा मुक्तिबोध ने अधिक उग्र रूप से परिस्थिति और परिवेश का अनुभव किया। लेकिन निराला एक सधे हुए कलाकार के रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं, वहां मुक्तिबोध के काव्य-प्रयोग चारुता रहित और ऊबड़खाबड़ हैं। मुक्तिबोध की काव्य-भाषा में लय और संगीत की अपेक्षा चिल्लाहट का प्राबल्य अधिक मिलता है।’

आचार्य वाजपेयी के इस कथन में औचित्य है या नहीं, पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि ईमानदारी है। एक स्वच्छंदतावादी अलोचक और प्रसाद-निराला के अंतरंग मित्र से इससे अधिक की अपेक्षा हम करें भी क्यों? हमारे लिए यही बड़ी बात है कि मुक्तिबोध की महत्ता पर सोचते हुए वे बार-बार अपने मानक कवि निराला के पास जाते हैं।
आलोचक की यह सीमा तो बन ही जाती है कि वह अपनी ही काव्य मान्यताओं की सीमा में बंध जाता है। ऐसा पद्म सिंह शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साथ हुआ ही है। पर यह कोई अपराध नहीं, बस सीमा है। वाजपेयी हों या हजारी प्रसाद द्विवेदी, सबके साथ यह सीमा है। परेशानी तब खड़ी होती है जब कोई एक ही समय के दो कवियों में से एक के बारे में चुप्पी साध लेता है। शुक्ल और वाजपेयी कम से कम यह तो नहीं करते। उनका वितान और उनकी काव्य विदग्धता का आकाश बहुत व्यापक है। इस तुलना में नामवरजी जैसे आलोचकों के बारे में सोचें तो तस्वीर बहुत अधिक निराशापूर्ण है। हां, रामविलासजी का तो कहना ही क्या? वे तो न जाने कहां-कहां तक विचरते हैं। इस मायने में वे अद्वितीय हैं। उनकी चिंताओं ही नहीं उनकी रसिकाई का क्षेत्र भी कालिदास, निराला से लेकर रमई काका तक है। भाषा और संस्कृति तक तो है ही। जहां वे चूके हैं वह जगह मित्रता के नाते केदारनाथ अग्रवाल को लेकर है। यहां उनकी रुझान अपनी तटस्थता छोड़ भावुकता प्रधान हो गई है। मुक्तिबोध को लेकर तो है ही। शमशेर को भी। कठिन दुराग्रही किंतु लोक समर्पित दृष्टि।

वादी-प्रतिवादी-उत्तर आधुनिकतावादी वैचारिकी में कैद ये बुद्धि-पुरुषार्थी लोकानुभव उससे पैदा हुए सृजन, उसके ताप और तेवर को अपनी बंधी और परवश निगाह के चलते जिन कसौटियों पर ठोंक-पीट जांच-परख रहे हैं वे किताबी ज्यादा और जमीनी कम है। आलोचक की विदग्धता और सहृदयता मेरी दृष्टि में यही है कि वह उभरते हुए सौंदर्य व्यापार वाले संसार के प्रति न केवल अपनी ललक दिखाए वरन उसके ऐतिहासिक-सामाजिक कारणों का विश्लेषण कर उसके मूल्य को आंके। उसके सामाजिक और कलात्मक औचित्य को जांचे। इस तरह अपना होना साबित करे। उदाहरण लें तो बड़े उदाहरण हैं- दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी के। ये दोनों अति लोक-नागर प्रतिष्ठित हैं। पर कई एक- जिनका अपने कुल और शील को लेकर बड़ा मुगालता है- वे इन्हें दोयम दरजे का कवि मानते हैं। जैसे कभी आचार्य शुक्ल ने कबीर को लेकर की थी। इसका कारण यह नहीं कि कबीर दोषी थे। सच यह कि हमारी दृष्टि में वर्णदंभ भरा था। फिर कैसी सहृदयता।

सहृदयता तो सचमुच वहीं है जहां विशाल लोक रीझा हुआ है। आंदोलित ही नहीं, आनंदित भी हैं। तुलसी आज तक वर्ण और जाति की गिरफ्त से बाहर निकल नहीं पाए। इससे भी अधिक पुरोहितों के खाने-पीने और दक्षिण के व्यापार हो गए। गौर करें तुलसी की भी एक युगांतरकारी क्रांति-दृष्टि है। वह है स्थापित लोककथा को दैवी मिथक और दृष्टि से रूपांतरित कर राज्य व्यवस्था और शासक की ऐसी छवि निर्मित कर देना, जो अपूर्व और उदात्त है। पर कुछ पाखंडियों को कहां भजन-पूजन मात्र दिखता है और कुछेक वाद-सेवकों को जातिवाद वर्णवाद, स्त्रीविरोध आदि। उनकी विचार शक्ति काम नहीं कर पाती। इससे ज्यादा समझ तो सर ग्रियर्सन में थी, जो हिंदू भी नहीं थे। कुछेक ने तो जब अपने जमाने को नहीं समझा तब तुलसी को कैसे उसके सवालों के अनुरूप पाते। हिंदी आलोचना ऐसों के चलते ही ठहर गई है। इधर नयों पर भी कहां ढंग का प्राप्त है।
क्या किसी प्रतिभा की अनदेखी और उपेक्षा करना आलोचक का फर्ज और धर्म है या फिर उसकी चूक और सीमा? इस वक्त कई एक ऐसे हैं जो किन्हीं पर देशी विचारों से इतने आक्रांत हैं कि उनका अपना कोई विचार दिखता नहीं। खुद उनकी अपनी अवधारणाएं क्या हैं, इसका पता ही नहीं लगता। हां, गुलाम पांडित्य और उधार ली गई निगाह जरूर है। ऐसे बेचारों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

अब कुछ ऐसी ही गोष्ठीबाजी की संस्कृति भी पैसेबाजों द्वारा फैलाई जा रही है, जहां अंकुरित होते आलोचकों को खिला-पिला कर उम्मीद बांधी जाती है कि वे चारण और वकील आलोचकों में बदल अपना सर्वनाश कर लें। यह प्रवृत्ति सबसे ज्यादा खतरनाक है। इससे आलोचन ही नहीं, साहित्य-सृजन की अछूती और अपूर्व प्रतिभाओं को खतरा है। आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा, प्रकारांतर से भोलापन तो है ही, आत्मविश्वास की कमी का भी प्रमाण है। सृजनात्मक शब्द को कैसी भी भीख की जरूरत नहीं। वह तो समाधि की आत्मस्थता में जन्म लेकर लोक में व्याप जाता है। सारा लोकानुभव उसके चेहरे पर कांति बन अपनी कौंध और मुस्कान फेंकता रहता है। आलोचक की समझदारी यही है कि वह इसे पहचाने जैसे कि कोई भावुक प्रेमी अपनी प्रिया या प्रेम-पात्र को प्रथम-दर्शन में ही पहचान लेता है। शेक्सपियर तो लिख ही गए, कालिदास और जयशंकर प्रसाद ने भी इसे महसूस किया। यह प्रसाद ही तो हैं- ‘मधुराका मुस्क्यता थी पहले देखा जब तुमको, परिचित से जाने कब के तुम लगे उसी क्षण मुझको।’ ०

 

 

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