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रंगकर्म- एक नाटक की यात्रा

यह नाटक उसी दौर में लिखा गया, जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा हो चुकी थी। बाबरी मसजिद गिराई जा चुकी थी। मुंबई और देश के कई भागों में भयानक दंगे हो चुके थे। अजित राय का लेख।

Author Updated: September 17, 2016 11:56 PM
घृणा, अविश्वास और हिंसा के जहरीले माहौल में यह नाटक मानवीय प्रेम और करुणा की बात करता है।

अजित राय

असग़र वजाहत के नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ ने कई फिल्मकारों को भी लगातार आकृष्ट किया है। सबसे पहले गोविंद निहलानी ने इस पर फिल्म बनाने का अधिकार खरीदा था। जब वे पांच साल तक फिल्म नहीं बना सके तो असगÞर वजाहत ने उन्हें कानूनी नोटिस भेजा। अब राजकुमार संतोषी ने इस नाटक पर करीब पचास करोड़ रुपए की लागत से फिल्म बनाने की घोषणा की है। वे संजय दत्त को मुख्य भूमिका में लेना चाहते हैं। लेकिन, इस नाटक के बारे में जानने वाली बात यह है कि इसके मंचन को पच्चीस साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। इसमें आखिर ऐसा क्या है कि हिंदू और मुसलिम कट्टरपंथी इसके विरोध में एक हो जाते हैं। भारत और पाकिस्तान की सरकारें भी एक सा रवैया अपनाती हैं। याद रखना जरूरी है कि यह नाटक उसी दौर में लिखा गया, जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा हो चुकी थी। बाबरी मसजिद गिराई जा चुकी थी। मुंबई और देश के कई भागों में भयानक दंगे हो चुके थे।

घृणा, अविश्वास और हिंसा के जहरीले माहौल में यह नाटक मानवीय प्रेम और करुणा की बात करता है, धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल के प्रति आगाह करता है और राष्ट्र, क्षेत्र, धर्म नस्ल की सीमाओं से परे शांति और सह-अस्तित्व का वैश्विक दृष्टिकोण सामने लाता है। यह पच्चीस वर्षों से हिंदी के साथ-साथ विभिन्न भारतीय भाषाओं में तो मंचित होता रहा है। वाशिंगटन, सिडनी, कराची, आबूधाबी, दुबई आदि विश्व के कई शहरों में भी इसका मंचन हो चुका है। इसके साथ तमाम कहानियां जुड़ी हुई हैं। असगर वजाहत ने जब 1989 में इस नाटक को लिखा तो कुछ नाट्य- निर्देशकों को इसके पाठ में आमंत्रित किया गया। कोई निर्देशक पाठ में नहीं पहुंचा और कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। इसका पहला पाठ दिल्ली के श्रीराम सेंटर रंगमंडल के कलाकारों के बीच हुआ। असगÞर वजाहत हिंदी पढ़ाने हंगरी चले गए। अचानक उनकी पत्नी का फोन गया कि हबीब तनवीर इस नाटक को श्रीराम सेंटर रंगमंडल के साथ करना चाहते हैं। तो इस तरह, नाटक का पहला प्रदर्शन 22 सितंबर 1990 को संभव हो सका। वह मंचन इतना सशक्त था कि देखते-ही-देखते नाटक की शोहरत फैल गई। बाद में हबीब तनवीर ने इसे अपने छत्तीसगढ़ी कलाकारों के साथ अपनी संस्था ‘नया थियेटर’ के लिए तैयार किया जिसके कई प्रदर्शन हॉल तक होते रहे हैं।

पाकिस्तान में दर्शकों का एक बड़ा समूह है जो इस नाटक को बेइंतहा पसंद करता है। वहां सारे शो हाउसफुल गए। वहां के चर्चित अंग्रेजी अखबार ‘डॉन’ ने लिखा-इस देश को आज जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है वह सहिष्णुता है जिसका अभाव हमारे नैतिक और सामाजिक बुनियादों को खोखला कर रहा है। इस संदर्भ में नाटक बहुत प्रासंगिक है।
अमेरिका के प्रवासी हिंदी लेखक उमेश अग्निहोत्री ने 1994 में वाशिंगटन डीसी में इस नाटक का प्रदर्शन किया था। इसमें भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रवासी कलाकारों ने काम किया था। आस्ट्रेलिया के शहर सिडनी में जब कुमुद मीरानी के निर्देशन में इस नाटक का मंचन हुआ तो दर्शक अभिभूत रह गए। इस नाटक के मंचन का सिलसिला आज भी जोशोखरोश से जारी है।

यहां नाटक के कन्नड़ संस्करण की बात करना जरूरी है जिसकी शुरुआत सुप्रसिद्ध रंगकर्मी ब.व.कारंथ ने की थी। यह काम बाद में डीएन श्रीनाक ने पूरा किया। इसका निर्देशन रमेश एसआर ने किया। इतना ही नहीं कर्नाटक की एक बोली ‘धारवी’ में थिप्पेस्वामी का अनुवाद छपा जिसे कंटेश के. ने मंचित किया। इस नाटक का गुजराती में भी अनुवाद और प्रदर्शन होते हुआ। पंजाबी में इसके कई अनुवाद हुए।  अमृतसर के केवल धालीवाल और लुधियाना के त्रिलोचन सिद्द ने बड़े पैमाने पर इसके शो किए। पंजाब में इसका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। हिंदी के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि एक नाटक को केंद्र में रखकर अंतरराष्ट्रीय उत्सव मनाया गया। भारत में और विदेशों में भी। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी के केनेडी सेंटर में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रवासी कलाकारों के साथ उमेश अग्निहोत्री के निर्देशन में इस नाटक का विशेष प्रदर्शन काफी चर्चित रहा है। इसके बाद लंदन के नेहरू सेंटर में वहां की स्थानीय संस्थाएं कथा यूके और एशियन कम्युनिटी आर्ट्स ने आयोजन किया। हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में मारिया निज्येशी एक खास संवाद आयोजित कर चुकी हैं। आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात में भी आयोजन हो चुके हैं। इस पूरे आयोजन को हबीब तनवीर की स्मृति को समर्पित किया गया था। १

 

 

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