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भारत में दुपहिए और चौपहिए वाहनों की तादाद जिस गति बढ़ी है, उसी हिसाब से सड़क दुर्घटनाओं में भी इजाफा हुआ है। देश में हर घंटे औसतन सोलह व्यक्तियों की मौत मार्ग दुर्घटनाओं में होती है, जिसमें सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की होती है। दुर्घटनाओं की वजह क्या है और इनकी रोकथाम कैसे हो सकती है?

Author February 5, 2017 6:02 AM
प्रतीकात्मक चीत्र।

ड़क हादसों में सबसे ज्यादा खून युवाओं का बहता है।’ यह टिप्पणी कुछ दिन पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर में सड़क हादसों के कारणों के आकलन के बाद की थी। वैश्विक स्तर पर तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया भर में सड़क हादसों के शिकार होने वालों में एक चौथाई युवा हैं और उनकी उम्र 15 से 29 वर्ष के बीच होती है। दुनिया भर में हर साल बारह लाख लोग दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। कई देशों ने सड़क सुरक्षा के उपाय अपनाए हैं, पर भारत जैसे देशों की इस मामले में स्थिति बताती है कि हालात दिनोंदिन खराब होते जा रहे हैं। जैसे-जैसे तेज रफ्तार गाड़ियां सड़कों पर आ रही हैं, दुर्घटनाओं में इजाफा हो रहा है। सिर्फ एक राज्य में नहीं, बल्कि पूरे देश की स्थिति यही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक भारत में औसतन हर घंटे सोलह लोगों की मौत सड़क हादसों में होती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल पांच लाख सड़क दुर्घटनाओं में डेढ़ लाख लोगों की जान जाती है और तीन लाख लोग जीवन भर के लिए अपंग हो जाते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक भारत में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली इन मौतों की कुल सामाजिक लागत लगभग एक लाख करोड़ रुपए बैठती है। तिरसठ फीसद मौतें राष्ट्रीय और अन्य राजमार्गों पर होती हैं। पिछले दस साल में सड़क हादसों में होने वाली मौतों में साढ़े 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
ज्यादातर मौतें दुपहिया वाहनों की दुर्घटना में होती हैं। सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और उनमें मरने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि पिछले साल प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो संदेश ‘मन की बात’ में भी उसका जिक्र किया था। सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए उन्होंने लोगों की जान बचाने के लिए कदम उठाने की घोषणा की थी। प्रधानमंत्री ने कहा था कि सरकार सड़क परिवहन और सुरक्षा कानून बनाएगी और दुर्घटना के शिकारों को बिना पैसा चुकाए तुरंत चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराएगी। मोदी ने जुलाई, 2016 में दिल्ली में मैनेजमेंट के एक छात्र की दुर्घटना में अत्यधिक खून बहने से हुई मौत का उल्लेख करते हुए बताया कि दुर्घटना के फौरन मदद न मिलना हमारे समाज की असंवेनशीलता साबित कर रहा है। वह छात्र दस मिनट तक सड़क पर तड़पता रहा और कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया था। यह अनेक बार साबित हुआ है कि दुर्घटना के बाद शुरुआती घंटे घायल की जान बचाने के लिए बहुत अहम होते हैं। ऐसे में अगर घायलों को तुरंत उपचार मिल जाए तो सैकड़ों जानें बचाई जा सकती हैं।
आखिर सड़क हादसों की अहम वजह क्या है? इसका एक बड़ा कारण शराब का सेवन है। शराब पी कर वाहन दुर्घटनाओं में हो रही मौतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिनों पहले देश के सभी राष्ट्रीय और राज्यमार्गों से शराब की दुकानों पर रोक लगा दी है। परिवहन विशेषज्ञों के मुताबिक ज्यादातर सड़क हादसे तेज रफ्तार, लालबत्ती की अनदेखी, गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करने और नशे में गाड़ी चलाने के कारण होते हैं। परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अस्सी फीसद से अधिक हादसे चालक की गलती से होते हैं क्योंकि इनके लिए सख्त नियम नहीं हैं। अंधाधुंध गाड़ी चलाने वाले सोचते हैं कि पहले तो वे पकड़े ही नहीं जाएंगे, अगर पकडे गए तो जुर्माना चुका कर निकल जाएंगे।
असल में, यह मामला एक ओर तो हमारी सामाजिक-आर्थिक हैसियत से जुड़ा और दूसरी तरफ इस बारे में कानूनों पर सख्ती से पालन का अभाव है। जो कानून बने हैं, उनका भी पालन कराने में प्रशासनिक अमला नाकाम रहता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश का तकरीबन पूरा यातायात महकमा भारी भ्रष्टाचार से ग्रस्त है। देश में बिना किसी खास टैस्ट के किसी का भी ड्राइविंग लाइसेंस बन जाता है। एक बार लाइसेंस बन जाने के बाद कोई भी सड़क पर उतर आता है। वाहन चालकों को विधिवत प्रशिक्षण देने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इसलिए जानकारी के अभाव में वे गलतियां कर बैठते हैं। गलतियां करने के बाद अक्सर वे रिश्वत देकर छूट जाते हैं। पुलिस दुर्घटनाओं के मामलों में बड़े लचर ढंग से साक्ष्य पेश करती है जिससे सजा दिए जाने की दर बेहद कम है। इससे दूसरों का मनोबल बढ़ता है।
हमारे देश में यातायात का सही ढंग से संचालन अभी भी प्राथमिकताओं में नहीं है। देश में एक ईमानदार और सक्षम यातायात तंत्र विकसित करने के लिए जरूरी है कि मौजूदा कानूनों का ढंग से पालन हो और दोषियों को सजा मिले। हाल के दशकों में सड़कों पर होने वाली हिंसा हर छोटे-बड़े शहर में बढ़ी है। वाहनों की भीड़ में हर साल इजाफा हो जाता है। रश ड्राइविंग यानी खराब ढंग से वाहन चलाना और हिट एंड रन यानी मारो और भाग खड़े हो, जैसी घटनाएं तमाम चौकसी और अनेक उपाय अपनाने के बाद भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल में गाजियाबाद में आॅडी कार से चार आॅटो सवारों का कुचला जाना इसी का उदाहरण है, जिसमें कार चालक दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल का डॉक्टर निकला है। ‘ड्राइविंग आॅफेंस’ कहलाने वाली इन घटनाओं ने किस तरह दिल्ली की सड़कों को मौत की गलियों में बदला है, यह किसी से छिपा नहीं है। यहां युवक-युवती, बच्चे, वृद्ध, महिलाएं या दिल्ली जैसे महानगरों में पहली बार कदम रख रहे लोग कब और किस तरह किसी वाहन तले कुचल जाएं, कहा नहीं जा सकता है। जाहिर है कि इन हादसों के पीछे कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं, बल्कि लापरवाही, यातायात नियमों का अज्ञान और बेवजह का गुस्सा ही जिम्मेदार है।

विशेषज्ञों का मत है कि इसके लिए सबसे बड़ी समस्या यातायात नियमों की जानकारी न होना भी बड़ी वजह है। यानी गलती या अपराध सिर्फ अनपढ़ माने जाने वाले ट्रक और कुछ बस-ड्राइवर ही नहीं करते, बल्कि तमाम पढ़े-लिखे लोग भी गलतियां करते हैं। साथ ही, सड़क पार करने के लोगों के गलत तौर-तरीके भी कोढ़ में खाज वाली स्थिति पैदा कर रहे हैं। खामियां कई स्तरों पर हैं, पर उनका निदान अक्सर किसी स्तर पर नहीं हो पा रहा है। बेशक, सिर्फ ट्रक वाले नहीं, बल्कि निजी और सरकारी बसों के ज्यादातर अप्रशिक्षित ड्राइवर दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करने में सबसे आगे हैं।
सड़कों पर इन बसों की होड़ रोजाना की बात है, जिसमें सड़क पर कब किस मासूम की जान चली जाए, कहा नहीं जा सकता। इसके अलावा आज के युवाओं में बढ़ता अमीरी का दिखावापन। ड्राइविंग को और हिंसक बनाने में शराब अपना योगदान अलग से देती है। जरा सोचिए कि जब शहरों में शराब की खपत साल-दर-साल बढ़ रही है तो फिर क्यों नहीं बढ़ेंगे सड़कों पर हादसे? शहर में लोगों की सहनशीलता भी खत्म कर रहे हैं। शहरों में संयुक्त परिवार अब रहे नहीं, जिनमें लोगों को एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाना सिखाया जाता है। कानून-व्यवस्था का लुंजपुंज होना भी इस समस्या को बढ़ाता है। अगर रोड रेज या किसी मारपीट में शामिल लोगों को ढंग से सजा दे दी जाए तो ऐसे अपराध कम तो अवश्य हो सकते हैं। निश्चय ही समाज का एक ताकतवर और अमीर तबका है, जो सोचता है कि कैसा भी अपराध करने के बाद वह मामले से साफ बरी हो जाएगा। तो यह मानसिकता भी ऐसे अपराध कराती है।
शहर की सड़कों पर दिखने वाले उन्माद की कुछ वजहें और भी हैं। जैसे प्रतिस्पर्धा, महंगाई, अविश्वास की स्थिति और कामकाज का तनाव। हद से ज्यादा भागदौड़ और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में कई बार लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे कब और कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। ये सभी कारण शहरियों में एक तरह का असंतोष पैदा कर रहे हैं और उन्हें दूसरों के प्रति ही नहीं, खुद से भी नाराज बना रहे हैं। कई तरह की असफलताएं भी लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति ही नहीं, अपने आसपास के सारे माहौल के प्रति भी आक्रोश पैदा कर देती हैं। कई बार यह असंतोष सारी हदें पार कर लेता है और ऐसे में कोई छोटी-सी घटना व्यक्ति का गुस्सा भड़का देती है। हालांकि, अपराधी किस्म की मानसिकता वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे शहर में ऐसा कर रहे हैं या गांव-देहात में। शहरों में कानून व्यवस्था की ढिलाई भी ऐसे लोगों को वारदात करने का सहज मौका उपलब्ध करा देती है। हर जगह पुलिस मौजूद नहीं हो सकती और पुलिस की छवि भी ऐसी नहीं बनी है कि लोगों में उसका भय हो, इसलिए अपराधी तत्त्व बेखटके कोई वारदात कर बैठते हैं। अगर पुलिस शहरों में असामाजिक तत्त्वों से कड़ाई से निपटे तो इससे अपराधियों के हौसले पस्त होंगे और अचानक मरने-मारने पर आमादा होने वाले लोग भी खुद पर काबू पाने की कोशिश करेंगे।
हालांकि केंद्र सरकार सड़क दुर्घटनाओं की संख्या देखकर चिंतित है और इसकी रोकथाम के लिए प्रयासरत भी है। जैसे सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इसके लिए एक मंत्रि-समूह का गठन किया है, जो इस समस्या के विभिन्न पहलुओं को देखने के बाद इस साल पंद्रह मई तक दी जाने वाली पहली रिपोर्ट में अपने सुझाव देगा। साथ ही सरकार एक नया सड़क यातायात अधिनियम पेश करेगी, जो पुराने कानून का स्थान लेगा। इसके लिए तैयार किए जा रहे मसविदे में अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन सरीखे विकसित देशों में सड़क सुरक्षा के संबंध में अपनाए जा रहे सर्वोत्तम तरीकों को शामिल किया जा रहा है।
यही नहीं, मंत्रालय के अनुसार पुराने कानून में सड़क इंजीनियरिंग पर ध्यान नहीं देने के कारण दोषपूर्ण सड़कें बनीं, जिसके कारण सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि सड़क सुरक्षा के अलावा शहरी क्षेत्रों में जिस सबसे बड़ी समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है, वह है वाहनों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी। इस वजह से जहां एक ओर सड़कों पर अक्सर जाम लग जाता है, वहीं दूसरी ओर सड़क यातायात के नियमों के उल्लंघन के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसमें बड़ा पेच यह है कि देश में एक तिहाई ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी हैं। यह आंकड़ा खुद केंद्र सरकार का है।

वै से तो जिस प्रकार दुपहिया वाहन चालकों के लिए की जरूरत है, उसी प्रकार कारों में एअरबैग चालक की सुरक्षा बढ़ाते हैं। 2012 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के विशेषज्ञों ने एक अनोखी बात कही थी, कि सड़क दुर्घटनाओं के दौरान छोटी कारों में सवार लोगों के हादसे में मारे जाने की आशंका ज्यादा होती है, क्योंकि इन कारों में सेफ्टी फीचर्स बहुत कम या न के बराबर होते हैं। भारत के संदर्भ में यह एक बड़ी चेतावनी है क्योंकि यहां पिछले कुछ अरसे में मध्यवर्ग को ध्यान में रख कर कम बजट वाली और महंगी कारों के मुकाबले कम फीचर वाली ऐसी कई कारें लाई गई हैं, जिनमें सुरक्षा को लेकर कई समझौते किए गए हैं। कारों को सस्ता करने के फेर में कंपनियां कारों में उतने सेफ्टी फीचर नहीं दे पातीं जितनी कि महंगी लग्जरी कारों में होते हैं। यों तो इन सेफ्टी फीचर में एअरबैग की बात सबसे ज्यादा प्रमुखता से कही जाती है क्योंकि दावा है कि दुर्घटना होने की स्थिति में एअरबैग चालक और कार में बैठे अन्य लोगों का काफी बचाव करते हैं, पर सुरक्षा को एअरबैग के भरोसे छोड़ना एक खतरनाक प्रवृत्ति साबित हो सकती है। दावा किया जाता है कि दुर्घटना होने पर एअरबैग सेकेंड के सौवें हिस्से से भी कम वक्त में खुलकर गाड़ी में बैठे शख्स के लिए कुशन का काम करते हैं। लेकिन इसके कुछ दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं।
असल में एअरबैग से लैस महंगी कारों के चालक सड़क सुरक्षा को लेकर इस कदर लापरवाह हो जाते हैं कि गति, सड़क संकेतकों, सीट बेल्ट पहनने जैसी अनिवार्य बातों की अनदेखी करते हैं।

एअरबैग से लैस कारों की दुर्घटनाओं में यह बात सामने आई है कि चालक काफी तेज स्पीड में कार चलाते हैं। ऐसे में टक्कर होने पर वे दूसरे वाहन चालकों की जिंदगी को बहुत ज्यादा खतरे में डाल देते हैं। यह भी देखा गया है कि अत्यधिक गति होने पर टक्कर होने की स्थिति में या तो एअरबैग को खुलने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है या फिर तेज टक्कर से पैदा हुए दबाव नहीं झेल पाने के कारण वे फट जाते हैं। कुछ दुर्घटनाओं में तो कार चालक की मौत की वजह एअरबैग ही माने गए क्योंकि टक्कर के बाद कार चालक की मौत एअरबैग के दबाव की वजह से सांस नहीं ले पाने के कारण हो गई। ऐसा ड्राइविंग सीट के पीछे पर्याप्त जगह नहीं बच पाने के कारण हुआ। इन्हीं आशंकाओं को ध्यान में रखकर यूरोपीय संघ (यूरोपियन यूनियन) ने 2010-2020 की अवधि में सड़क दुर्घटनाओं की दर में पचास फीसद कमी लाने का लक्ष्य सामने रखते हुए जो उपाय सुझाए हैं, उनमें एक मुद्दा एअरबैग के इस्तेमाल से जुड़ी जागरूकता लाने का भी है। ईयू ने अपनी एक चेतावनी में कहा है कि कार चालक खास तौर से बच्चों की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले एअरबैग के इस्तेमाल में सावधानी बरतें। इस चेतावनी के मुताबिक एअरबैग को दुर्घटना की स्थिति अपनी सुरक्षा की गारंटी मान लेना भारी जोखिम मोल लेने जैसा है। १

 

 

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