ताज़ा खबर
 

जन्मशती: जो बाल कविता के पर्याय बन गए

बच्चों के सरल हृदय कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916-1998) हिंदी बाल कविता के बड़े और सिद्ध कवियों में से हैं।

Author January 15, 2017 2:09 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रकाश मनु

बच्चों के सरल हृदय कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916-1998) हिंदी बाल कविता के बड़े और सिद्ध कवियों में से हैं। उनकी कविताएं बच्चों में इस कदर लोकप्रिय हुर्इं कि माहेश्वरीजी की बाल कविताएं एक तरह से हिंदी बाल कविता का पर्याय हो गर्इं। उनमें लोक परंपरा से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ नई कल्पनाओं की उड़ान और अनूठापन है, रस है, आनंद है, साथ ही वह खिलंदड़ापन और जादुई लय भी कि उनकी कविताएं बच्चों के होंठों पर आते ही नाचने-थिरकने लगती हैं। माहेश्वरीजी ने प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा है और बाल कविता का प्राय: हर रंग, हर अंदाज उनके यहां मिलता है। उनके यहां मीठी सीख देने वाली कविताएं हैं तो ऐसी चपल कविताएं भी, जो अपनी खिलंदड़ी लय के साथ बच्चों को बहा ले जाती हैं और बच्चे मस्ती में उन्हें गाते हुए नाचते और थिरकते हैं। उन्होंने देशराग की सुंदर कविताएं लिखीं तो प्रकृति-प्रेम की ऐसी मनोरम कविताएं भी, जिन्हें पढ़ कर लगता है कि बच्चे प्रकृति के मुक्त आंगन में आंख-मिचौनी खेल रहे हैं और प्रकृति ममतामयी मां की तरह उन्हें अपने मीठे प्रेम से नहला रही है। इसी तरह शिशुओं के लिए छोटी कविताएं और दर्जनों चपल-चंचल शिशुगीत उन्होंने लिखे, तो बड़ी नाटकीय कथात्मक कविताएं भी, जिन्हें पढ़ते हुए बच्चों के चेहरे पर एक चपल मुस्कान आ जाती है।

1 दिसंबर, 1916 को उत्तर प्रदेश के रौहता गांव (जिला आगरा) में जन्मे द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी बच्चों के मन और उनके सपनों की ‘हलचल’ को अकसर नजदीक से जान-बूझ लेते हैं। इसीलिए वे बच्चों के अत्यंत प्रिय कवियों में से हैं और उनकी कविताएं बच्चे सहज ही गुनगुनाते हैं। बचपन में प्रकृति के मुक्त साहचर्य और गांव के परंपरावादी परिवेश का माहेश्वरीजी के स्वभाव और बाल मन को छूने वाली उनकी सरल, सहज बाल कविताओं पर भी सीधा प्रभाव पड़ा। उनकी बाल कविताएं परंपरा से बहुत कुछ लेकर निर्मित होती हैं। बाल मन को भीतर-बाहर से भिगोते हुए, वे उनमें जीवन के प्रति एक सहज आस्था पैदा करती हैं। इसी तरह उनकी बहुत-सी कल्पनाएं भी मानो लोक संस्कृति और परिवेश से सीधे-सीधे चली आई हैं। हां, माहेश्वरीजी की उर्वर काव्य-प्रतिभा ने उन्हें नए-नए, सजीले और मोहक रूपों में ढाल दिया। ‘यदि होता किन्नर नरेश मैं’ माहेश्वरीजी की ऐसी ही अद्भुत कविता है। माहेश्वरीजी को बच्चों के अंदाज में बात कहना आता है और उनकी भाषा खुद-ब-खुद उसी रंग में ढल जाती है- ‘मुन्नी-मुन्नी, ओढ़े चुन्नी, गुड़िया खूब सजाई,/ किस गुड्डे के साथ हुई तय इसकी आज सगाई?’

गांव के खुले परिवेश और वहां प्रकृति की सुंदर, रम्य छटाओं ने माहेश्वरीजी ने प्रकृति और जीवन के गहरे विस्तार से जोड़ा। वे जानते हैं कि प्रकृति कोई सजावटी चीज नहीं, सचमुच जीवन का पर्याय ही है। प्रकृति के सहज वत्सल स्वरूप और रस के बिना जीवन निरानंद है। इसीलिए वे चिड़ियों को देखते हैं, तो उनके मन में गहरी उत्सुकता पैदा होती है- ‘कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना?/ कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना-फिरना?…’
भारत में हर ऋतु की अलग सुंदरता है और बदलते मौसम के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। बच्चों के लिए यह किसी कौतुक से कम नहीं है। इसलिए हर ऋतु के साथ उसका गाने का मन करता है। फिर बच्चों के प्रिय कवि माहेश्वरीजी कैसे ऋतुओं के गीत कैसे न गाते-गुनगुनाते? उन्होंने प्राय: सभी ऋतुओं पर लिखा, पर वर्षा तो माहेश्वरीजी की अत्यंत प्रिय ऋतु है। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादलों और रिमझिम वर्षा के आनंद पर उन्होंने बहुत कविताएं लिखी हैं। इनमें ‘बादल बरस रहा’ उनका बड़ा सुंदर गीत है। मानो वर्षा न हो, प्रकृति का अनोखा उत्सव हो। यह दृश्य ऐसा है, जो हमेशा-हमेशा के लिए भीतर अंकित हो जाता है। माहेश्वरीजी की एक कविता में बच्चा बादलों से दोस्ती करना चाहता है- ‘आ रे काले-काले बादल, आ रे गोरे-गोरे बादल।/ थोड़ा रुक जा, थोड़ा झुक जा, मैं तुझको छू लूं रे बादल।/ होकर तेरे साथ उड़ूं मैं, जिधर मुड़े तू, उधर मुड़ूं मैं।/ नन्ही-नन्ही बूंदें बन कर, टप-टप मैं बरसूं रे बादल।’ यहां तक कि बच्चे को लगता है, वह खुद बादल बन गया है और हर ओर मीठी रिमझिम बन कर बरस रहा है।

माहेश्वरीजी ने बच्चों के मनोरम खेल और इच्छा-संसार पर भी बड़ी सुंदर और भावपूर्ण कविताएं लिखी हैं। झूले बच्चों को बेहद लुभाते हैं। चरर-मरर घूमने वाले बड़े-बड़े लकड़ी के झूले तो उन्हें दूर से ही खींचते हैं। मानो इस चकरीदार झूले में बैठते ही वे किसी और दुनिया में पहुंच जाते हों- ‘चरर-मरर, चरर-मरर कर, चले रहट के झूले,/ झूम रहे हैं बच्चे अपनी सारी सुध-बुध भूले।’ इसी तरह माहेश्वरीजी के शिशुगीतों का अलग संसार है। उनके ज्यादातर शिशुगीत पारंपरिक ढंग के हैं, पर उनमें ही सुंदर लय में ढाल कर वे कुछ न कुछ नई बात कहते हैं। ‘चल मेरी ढोलकी’ लोक परिवेश से जुड़ा ऐसा ही सुंदर शिशुगीत है जिसमें बड़ी चुस्ती है, ‘चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम, नानी के घर जाते हम…!’

अटकन-बटकन की तर्ज पर उन्होंने एक बड़ा ही सुंदर और अनोखा खेलगीत लिखा है जिसे बच्चे बहुत पसंद करते हैं- ‘अटकन-बटकन, दही चटोकन, बाबा लाए बरफी,/ एक बरफी टूटी, मुनिया बिटिया रूठी।’ माहेश्वरी जी के ऐसे अनेक शिशुगीत हैं, जो निरंतर बाल-मन में गूंजते हैं और हरदम बच्चों के होठों पर नाचते हैं। उनमें पारंपरिक लय-तान के इस्तेमाल के साथ-साथ कई जगह एकदम नई और ताजगीभरी कल्पनाओं का भी पसारा है। इतना ही नहीं, बच्चों के मस्ती भरे खेल के साथ-साथ उनकी शरारतों को भी थोड़े से शब्दों में आंक पाने में उन्हें सिद्धि हासिल है। उनके ऐसे गीतों में कमाल की क्रियाशीलता, रचनात्मक ऊर्जा और नटखटपन है।

पूसी बिल्ली पर लिखा गया माहेश्वरीजी का यह शिशुगीत उनके शिशुगीतों में सबसे अच्छा तो है ही, हिंदी के कुछ बढ़िया शिशुगीतों में भी इसकी गिनती होनी चाहिए। सबसे खास बात यह है कि यह पूरा शिशुगीत एकदम बोलचाल के अंदाज में लिखा गया है- ‘पूसी बिल्ली, पूसी बिल्ली, कहां गई थी?/ राजधानी देखने मैं दिल्ली गई थी।/ पूसी बिल्ली, पूसी बिल्ली, क्या वहां देखा?/ दूध से भरा हुआ कटोरा देखा।/ पूसी बिल्ली, पूसी बिल्ली, क्या किया तुमने?/ चुपके-चुपके सारा दूध पी लिया मैंने।’ शायद यही वे गीत हैं जिन्होंने एक समय बच्चों के अंत:संसार को रचा था और उन्हें बहुत बारीक, सुकोमल धागों से परंपरा और परिवेश से जोड़ा था और आज भी हवा में उनकी कोमल गूंजें-अनुगूंजें समाई हुई हैं।

माहेश्वरीजी ने जहां एक ओर सुंदर और रसमय गीत लिखे, वहीं खासी नाटकीयता से भरी बड़ी चुस्त और सुंदर कथात्मक कविताएं भी लिखी हैं। खासकर ‘चूहों की सभा’, ‘शेर और चूहा’ तथा ‘हवा और सूरज’ उनकी बड़ी चुस्त और नाटकीय कविताएं हैं।  हिंदी बाल कविता में एक दौर था कि प्राय: सभी कवियों ने कथात्मक कविताएं लिखीं। पर माहेश्वरीजी को इसमें जितनी सफलता मिली, वैसी किसी दूसरे को नहीं मिल पाई। यही कारण है, कि पीढ़ियां बदलती गर्इं, पर इन कविताओं का असर आज भी कायम है।

यही नहीं, माहेश्वरीजी की बाल कविताओं में एक आदर्श संसार का सपना भी है। वे अनायास ही बच्चों को भीतर से सरल बनने और सबको अपनाने की सीख देती हैं। साथ ही ये कविताएं उन्हें बड़े होकर कुछ बनने के लिए भी प्रेरित करती हैं। ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ में यही भाव है- ‘एक धरा की ही गोदी में सारे बच्चे पले हुए हम,/ एक धरा की ही गोदी में सारे बच्चे बढ़े हुए हम।/ एक हमारी आसमान छत, एक हमारी सांस पवन है,/ धूप चांदनी के कपड़ों में ढका हुआ हम सबका तन है।/ हम हैं एक विश्व के नारे, हम हैं सूरज-चांद-सितारे।’

सच तो यह है कि अपनी सीधी-सादी शैली में ही माहेश्वरीजी जो रचते हैं, वह मानो बच्चों के अंत:करण की ही आवाज है। उसे वे न सिर्फ खेल-खेल में दोहराते हुए आनंद लेते हैं, बल्कि उस पर बहुत कुछ निसार करने को तैयार हैं। माहेश्वरीजी ने बच्चों में देशप्रेम और साहस भरने वाली कविताएं भी खूब लिखी हैं। ‘वीर, तुम बढ़े चलो’ उनकी बहुत मशहूर कविता है, जिसकी सामूहिक प्रयाण-गीतों जैसी लय आज भी भीतर झंकार पैदा कर देती है। निस्संदेह द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी बाल साहित्य के शिखर पुरुष हैं, जिन्होंने करीब आधी शताब्दी तक बाल कविता को नए-नए रंग, कल्पनाओं और अपनी उर्वर प्रतिभा से सींचा। वे बच्चों से प्रेम करने वाले ऐसे विलक्षण बाल कवियों में से हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। उनका विनम्र स्वभाव और सरलता देखकर ही उन्हें ‘बच्चों का गांधी’ कहा गया।

 

 

 

जब राहुल गांधी ने की नरेंद्र मोदी की मिमिक्री; अमिताभ बच्चन स्टाइल में किया नोटबंदी का ऐलान

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App