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ललित प्रसंग- परदेस को उठे पांव

हमारे गांव के जवान बड़े-बड़े शहरों की छोटी-छोटी फैक्टरियों के मजदूर बन कर अपना मुंह छिपाने को बेबस हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर हुआ है।

संकट है। चहुंओर संकट है। चिड़िया के लिए चारा नहीं, पानी नहीं है। पंथी के लिए छांह नहीं है। आस्था के लिए कहीं कोई आश्वासन नहीं है। जवानों के लिए रोजगार नहीं है। वृद्धों के लिए कोई सहारे का संबल नहीं है। दुधमुंहों के लिए दुलार नहीं है। कहीं कोई हास-हुलास नहीं है।  खेतों के गिरे हुए, बचे हुए अन्न आग के हवाले कर दिए गए हैं। तालाबों, पोखरों के मुंह न जाने कबके सूखे हैं। छांहों के सारे ठांव राजाज्ञा की निगरानी में नजरबंद हैं। आस्था के वृक्ष जंगलराज के ठेकेदारों के हाथ में जा चुके हैं।  चिड़ियां कहां रहें? कैसे रहें? न रहें तो कहां जाएं? जाएं तो कैसे जाएं? बड़ा संकट है। संकट है कि- ‘का खार्इं, का पीहीं, का ले परदेश जार्इं?’ देश में रहना न हो सकेगा, तो परदेश जाना ही पड़ेगा। हमारे समय में पूरे के पूरे गांव ही परदेश जाने को पांव उठाए खड़े हैं। हमारे गांव बड़े-बड़े शहरों के परदेश रोज-रोज जाने का मंसूबा बांधते हैं। जाते हैं, जाकर अपनी पहचान खो देते हैं। गांव शहर में जाकर खो जाते हैं। खप जाते हैं।

हमारे गांव के जवान बड़े-बड़े शहरों की छोटी-छोटी फैक्टरियों के मजदूर बन कर अपना मुंह छिपाने को बेबस हैं। वृद्ध एटीएम का मुंह जोहने को विवश हैं। जो अभी नहीं जा पाए हैं, वे भी जाने को पांव उठाए खड़े हैं। न जाएं तो क्या खाएं? क्या पीएं? जाएं तो, क्या लेकर परदेश जाएं?खेत गिरवी हैं। गहने ब्याज के बंदीगृह में कैद हैं। काम पाने के लिए एजेंटों की चिरौरी-मिनती चालू है। एजेंट पत्थर दिल हैं।  कुल मिलाकर पास में एक चना है। चना दाल दलने के लिए चाकी में डाल दिया गया है। चाकी में एक चने की बिसात ही क्या। दाल चाकी के किल्ले में फंस गई है। अटक गई है। चिड़िया बढ़ई के यहां गुहार लगाती है। बढ़ई किल्ला फाड़ दे, तो दाल निकल आए। मगर नहीं, बिगड़ैल बढ़ई नहीं सुनता।

हमारे समय में फरियाद डालने के लिए भी जुगाड़ की जरूरत है। सिफारिश का जोर चाहिए। फिर फरियाद सुनने के लिए घूस चाहिए। काम पाने के लिए, काम की पगार पाने के लिए पगड़ी चढ़ाने का बूता चाहिए। पगड़ी चढ़ाने के लिए सिर्फ एक चना है। चना चक्की के किल्ले में फंसा है। क्या लेकर परदेश जाएं। परदेश जाना लाजिमी है। मगर क्या लेकर? लेकर जाने को कुछ नहीं है। जो है, चक्की में है। जो है, चक्की के किल्ले में फंसा है। परदेश में कौन, किसका सगा-संबंधी है, कोई नहीं। जिसके बाप में कोई कूबत नहीं है, उसे हर किसी को बाप बनाना है। कोई बाप बने न बने, दीगर बात है। मगर बनाना है। हमारे समय की जवानी लावारिस जवानी है। हमारे समय के बाप बिना कूवत के बाप हैं। अपने बापों की विवशता से कुपोषित जवानी पत्थरों के आगे बाप-बाप चिल्ला रही है। पत्थर सुन नहीं रहे हैं। फिर? बुरा हाल है।

जहां भूख है, भोजन नहीं है। जहां प्यास है, पानी नहीं है। जहां भोजन है, भूख नहीं है। जहां पानी है, प्यास नहीं है। जहां हाथ है, काम नहीं है। जहां काम है, हाथ नहीं है। जहां आंख है, सपने नहीं हैं। जहां सपने हैं, आंख नहीं है। बड़ा विपर्यय है। मगर है। हमारे समय में बहुत कुछ नहीं है मगर विपर्यय हर कहीं है।विपर्यय में ही जीना है। रोज-रोज उधड़ जाती सीवन को रोज-रोज सीना है। फिर भी विकास की घुट्टी हमें पीना है। हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं। हमारे गांवों में उजाड़ का निरंतर विकास हो रहा है। गलियों और चौपालों में सन्नाटे का बराबर विकास बढ़ रहा है। आपस में अपरिचय का, असंवाद का विकास बढ़ रहा है। चौड़ी-चौड़ी सड़कों के विस्तार में दुर्घटनाओं में बेशुमार विकास हो रहा है। दुर्घटनाओं में घायलों और मृतकों के लिए ट्रॉमा सेंटरों का विकास बढ़ रहा है। किसिम-किसिम के स्कूलों में हर साल बढ़ती फीसों का विकास बढ़ रहा है। अलगाव और असुरक्षा का विकास तो बाढ़ की तरह उफन रहा है। भला कौन कह सकता है कि विकास नहीं बढ़ रहा है।

नहीं बढ़ रहा है, तो पारस्परिक विश्वास नहीं बढ़ रहा है। कर्तव्यबोध नहीं बढ़ रहा है। देशप्रेम नहीं बढ़ रहा है। जीवन की सुरक्षा नहीं बढ़ रही है। आश्वस्ति के आश्रय नहीं बढ़ रहे हैं। मगर इनके बढ़ने, न बढ़ने से हमारा विकास प्रभावित होने वाला नहीं है। लूट का, दलन का, दमन का विकास तो जंगल-जंगल गूंज रहा है। नदी-नदी, पहाड़-पहाड़ गरज रहा है। बहुत लोग हैं, जिनका कहने-सुनने से विश्वास उठता जा रहा है। कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे? जिनसे कहना है, उन्हें सुनने में कोई रुचि नहीं है। जिन्हें सुनना है, वे कान में तेल डाले बोलने के व्यापार में लगे हैं। जो कुछ सुन सकते हैं, उनसे कुछ भी कहना व्यर्थ है। फिर? फिर क्या, जो है सो है।

चिड़िया चाहे जितनी चिल्लाए, कोई सुनने वाला नहीं है। वह जितनी चिरौरी करे कोई पसीजने वाला नहीं है। सुनने वाला कोई नहीं है। चिड़िया की फरियाद कोई नहीं सुनेगा, न बढ़ई, न लाठी, न भाड़, न समुद्दर, न हाथी, न सांप, न रानी। हमारी पुरानी लोककथा की चिड़िया हमारे समय की चिड़िया नहीं है। हमारे समय की चिड़िया, कहानी की चिड़िया से अधिक अभागी है। कहानी के समय से हमारे समय में अभाग का विकास बहुत आगे बढ़ चुका है।  परदेश जाना चाहो, जाओ। कैसे जाना है, तुम जानो। जाना चाहो खाली हाथ चले जाओ। रहना चाहो, खाली पेट रहो। जैसे भी रहना हो, रहो मगर चुप रहो। बस बोलो मत। बोलने से कानून व्यवस्था प्रभावित होती है। कानून-व्यवस्था में बाधा डालना अपराध है। अपराध के लिए सजा है। बोलोगे, तो सजा मिलेगी। और कुछ मिले, न मिले सजा जरूर मिलेगी। हमारे समय में सजा सुलभ है। न्याय दुर्लभ है। जो दुर्लभ है, उसे छोड़ो। जो सुलभ है उसे लो।  वोट दे दो। आश्वासन ले लो। आश्वासन को खाओ। आश्वासन को पीओ। आश्वासन को ले परदेश जाओ। परदेश में खो जाओ। परदेश में खप जाओ।
पता नहीं कैसा समय है। अपने ही देश में जाने कितने-कितने परदेश उगे आ रहे हैं। पनपते जा रहे हैं। अपना देश, परदेश क्यों बनता जा रहा है। सारे जाने-पहचाने अपने, पराए जैसे क्यों बनते जा रहे हैं। अपना गांव अपने गांव जैसा क्यों नहीं है? अपने बाप, बाप जैसे क्यों नहीं हैं? अपनी सरकार अपनी सरकार जैसी क्यों नहीं है?
बहुत से सवाल हैं, गांव-गांव, गली-गली बौड़िया रहे हैं। सवाल बवंडर की तरह उठ रहे हैं। धूल-गर्द फैला रहे हैं। आंखों में भरे आ रहे हैं। आंखें किरकिरा रही हैं। कुछ सूझ नहीं रहा है। सब पहचाने, अनपहचाने से बनते जा रहे हैं।
केवल चिड़िया नहीं, जवान नहीं, जवानी नहीं, केवल बुढ़ापा नहीं, पूरा का पूरा गांव, पूरे के पूरे गांव परदेश जाने को पांव उठाए हुए हैं। हर कोई, हर किसी से पूछ रहा है- ‘का खार्इं, का पीहीं, का ले परदेश जार्इं?’
कोई जवाब नहीं है। कहीं कोई जवाब नहीं है। कहीं से कोई जवाब नहीं उठ रहा है। सवाल उठ रहे हैं। हजार-हजार, लाख-लाख, करोड़-करोड़ सवाल उठ रहे हैं। हमारे समय में आदमी सवाल में बदलता जा रहा है।
हमारे समय में भोजन, सवाल में बदलता जा रहा है। वस्त्र, सवाल में बदलता जा रहा है। दवा, सवाल में बदलती जा रही है। शिक्षा, सवाल में बदलती जा रही है।
हमारे समय में हर आदमी अपने ही घर में प्रवासी बनता जा रहा है। घर-घर में एक परदेश घुसने के लिए पांव उठाए खड़ा है। हर घर, परदेश जाने को पांव उठाए है। ०

 

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