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संगीत बनाम शोर

किसी भी विधा के लिए छियासी साल का वक्त कोई बड़ा वक्फा नहीं है। संगीत सैकड़ों साल के लिए होता है, एक दो साल के लिए नहीं।

Author January 29, 2017 1:59 AM
मोहम्मद रफी

चांद खां रहमानी

तेरह मार्च, 1931 को ‘आलमआरा’ से शुरू हुआ फिल्मी संगीत का सफर अविराम जारी है। आलमआरा ने रिलीज होते ही देश में दर्शकों के लिए कौतूहल पैदा कर दिया था। वजह थी हिंदुस्तान में यह पहली बोलती हुई फिल्म, जिसमें कलाकार न सिर्फ चलते -फिरते दिखाई दे रहे थे बल्कि गाना भी गाते दिखाई दे रहे थे। बताया जाता है कि इस फिल्म में कुल सात गाने थे लेकिन दो गाने ही रह गए। बाकी के गानों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये दोनों गाने इस फिल्म में काम करने वाले कलाकारों ने ही गाए थे। एक गीत ‘दे दे खुदा के नाम पर गर इच्छा है कुछ देने की’ वजीर मुहम्मद खान पर फिल्माया गया था। दूसरा गीत एक महिला कलाकार ने गाया गाया था। शुरुआत मे फिल्मी गीतों की कुलजमा यही पूंजी थी। 1931 से लेकर 1944 तक फिल्मी गीतों का शैशव काल कहा जा सकता है। इस दौरान अच्छे गीत-संगीतों की रचना हुई। गुलाम मुहम्मद और अनिल विश्वास जैसे संगीतकार मैदान में आ चुके थे।

ये दोनों ही अपने क्षेत्र के उस्ताद थे। 1944 तक पहुंचते-पहुंचते भारतीय फिल्मी गीत-संगीत किशोरावस्था में आ चुका था। इस समय फिल्म उद्योग में नौशाद जैसे संगीतकार और शकील बदायंूनी जैसे लोकप्रिय गीतकार आ चुके थे। इसके बाद तो लोकप्रिय गीत-संगीत का दौर चल पड़ा जो 1970 तक जारी रहा। यह वह दौर था जब लोग फिल्मी गीत-संगीत पर पूरी तरह फिदा थे। फिल्मी गीत-संगीत पर उंगली उठाना या उसकी आलोचना कम ही होती थी। इसे लोगों ने इसलिए भी सिर आंखों पर बिठाया था क्योंकि यह बेहद मधुर होने के साथ-साथ गुनगुनाया जा सकता था। दूसरे यह कि गीत-संगीत राजा-महाराजाओं के दरबार से निकल कर आम आदमी तक पहुंच गया था। यह वह संगीत था जिसे लोग शास्त्रीय संगीत के नाम से जानते हैं।

किसी भी विधा के लिए छियासी साल का वक्त कोई बड़ा वक्फा नहीं है। संगीत सैकड़ों साल के लिए होता है, एक दो साल के लिए नहीं। शास्त्रीय संगीत सैकड़ों सालों से चला आ रहा है जो आज भी कायम है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज उसकी रफ्तार और चाहने वाले कम हो चुके हैं। लेकिन यह संगीत आज भी हमारे बीच मौजूद है और शान के साथ मौजूद है। आज भी कहीं शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम होता है तो काफी लोग देखने-सुनने जाते हैं। फिल्म संगीत तो आम जनमानस के जेहन पर राज कर चुका है और कुछ हद तक आज भी कर भी रहा है तो बताइ इसकी उम्र कितनी होनी चाहिए। जाहिर है यह फिल्मी-संगीत भी लंबे समय तक चलेगा, ऐसा माना जा रहा है।

हाल के दिनों में फटाफट गीत-संगीत का दौर शुरू हुआ है। पहले जो टिकाऊ होता था, अब वह पैदा होते ही आखिरी सांसें गिनने लगता है। आज के फिल्म-संगीत में मधुरता नहीं, शोर की बहुतायत है। इतनी जल्दी इसमें शोर का घुन लग गया है जो मधुर संगीत सुनने वालों के लिए बहुत ही कष्टदायक है।  अस्सी का दशक शुरू होते-होते संगीत के स्तर में गिरावट आने लगी थी। लेकिन तब तक भी मामला इतना अधिक चिंताजनक नहीं था, जितना अब है। अस्सी के दशक में भी कुछ फिल्मों के गीत यादगार बन पड़े थे। ‘निकाह’ इसी दशक की फिल्म है जिसके गीतों ने धूम मचा दी थी। इसके बाद नब्बे के दशक में एक बार फिर संगीत के स्तर में उछाल आया। इस उछाल का श्रेय संगीतकार नदीम-श्रवण की जोड़ी और गीतकार समीर को दिया गया। भले ही नदीम-श्रवण पर संगीत चोरी करने के आरोप लगते रहे लेकिन लोगों ने उनके संगीत को पसंद किया। इसके बाद तो स्थिति लगातार खराब होती गई। जो गीत पचासों साल याद किए जाते रहे हैं वही अब आठ दिन चल जाएं तो उन्हें हिट का दर्जा दिया जाने लगा। आखिर क्या वजह रही कि आज गीत लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ पाते या वे ऐसे क्यों नहीं बन पा रहे कि उन्हें लोग याद रख सकें और जो गुनगुनाए जा सकें।

संगीत के जानकार इसके तीन कारण गिनाते हैं- शायरों को उर्दू का ज्ञान न होना, बेहद जल्दी में गीतों की रचना करना, संगीतकारों को संगीत और रागों की जानकारी न होना। जब तीनों बातें एक जगह इकट्ठी हो जाती हैं तो वहां गीत-संगीत नहीं रह जाता बल्कि शोर का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। आज देखने में आ रहा है कि गायकों के चेहरों पर सुकून नहीं बल्कि तनाव झलकता है। लगता है जैसे कोई किसी पर चिल्ला रहा हो या झल्ला रहा हो। आज के अधिकतर गायक एक स्वर के हैं जिनमें स्वर की विविधता नहीं होती है।
संगीतकार स्वर और साज में रंग नहीं भर पा रहे हैं। जहां गायक बिना जरूरत के हर लाइन को गले के बल खींचता महसूस होता है वहीं संगीतकार का जोर स्केल पर होता है। जब ये दोनों चीजें मिल जाती हैं तो शोर का आयोजन हो जाता है। लोगों को कई बार ऐसा महसूस होता है कि आज के शायर का जज्बात से कोई रिश्ता नहीं रह गया। किसी तरह तुकबंदी कर खानापूरी की जा रही है। लोग जानते हैं कि जब तक शायर खुद जज्बाती रूप से अपने गीतों में शामिल नहीं होगा या संवेदनशील नहीं होगा, तब तक न तो शायरी में दम आएगा न संगीत में। पहले के शायरों में यह बात प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी।

आज के पाठक शायद अबरार अल्वी को न जानते हों। ये वही अबरार अल्वी थे जो गुरुदत्त की फिल्मों के कहानीकार और संवाद लेखक हुआ करते थे। इन्हीं अबरार अल्वी ने बार एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर साहिर लुधियानवी नहीं होते तो शायद ‘प्यासा’ जैसी फिल्म नहीं बन पाती। यही बात गुरुदत्त ने दोहराई थी। पहले शायर और संगीतकार अपनी प्रतिष्ठा के लिए गीत लिखते थे और संगीत की रचना करते थे। आज वही लोग पैसों के लिए काम करते दिखाई देते हैं क्योंकि पहले के शायर और गीतकार फक्कड़ होते थे जबकि आज के लोग जरूरत से ज्यादा भौतिकवादी हो चुके हैं जिनकी जरूरत सिर्फ पैसों से पूरी हो सकती है।इतना ही नहीं, पहले निर्माता-निर्देशकों का भी संगीतकारों पर पूरा दबाव रहता था कि वह संगीत की मधुरता पर जोर दें। पुराने गानों की महत्ता और मधुरता का इससे पता चलता है आज जितने भी गायक हैं वे सब पुरानों की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं। जितने भी गायकी के टैलेंट शो हो रहे हैं उनमें कुछ को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो सभी प्रतियोगी पुराने गीत गा कर वाहवाही लूटते हैं और लूट रहे हैं। ऐसा बहुत कम देखने में आया जब कोई प्रतियोगी नए गायक के गाने को गा कर आगे बढ़ा हो। कोई रफी को गाता है तो कोई लता को तो कोई मुकेश को तो कोई तलत महमूद और मन्ना डे को। ‘अनपढ़’ फिल्म के गीत ‘आपकी नजरों ने देखा प्यार के काबिल मुझे’, पच्चीस से अधिक गायक-गायिका गा चुके हैं। इस बात का प्रमाण यू-ट्यूब पर मिल जाएगा। कई संगीतकार ऐसे हैं, जो मदनमोहन की नकल करने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन उनकी धुन मेंं वह बात नहीं आ पा रही। ०

 

 

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