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आधी दुनिया- चमकती जिंदगी का अंधेरा

अरबों-खरबों के इस बाजार में मानव शक्ति पर लागू होने वाले नियम दम तोड़ रहे हंै। सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि नाबालिग लड़कियां ग्लैमर के बाजार का तेजी से शिकार बन रही हैं। काम का बोझ और तनाव इन मॉडलों को अपनी जिंदगी खत्म करने को मजबूर कर रहा है।

Author November 26, 2017 2:14 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दुनियाभर में ग्लैमर का बाजार बहुत तेजी से फैल रहा है। पर अरबों-खरबों के इस बाजार में मानव शक्ति पर लागू होने वाले नियम दम तोड़ रहे हंै। सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि नाबालिग लड़कियां ग्लैमर के बाजार का तेजी से शिकार बन रही हैं। काम का बोझ और तनाव इन मॉडलों को अपनी जिंदगी खत्म करने को मजबूर कर रहा है। हाल ही में चीन के शंघाई शहर में चौदह साल की रूसी मॉडल व्लादा डिजूबा ने बारह घंटे लगातार काम करते हुए दम तोड़ दिया। डिजूबा इस कदर थक चुकी थी कि कैट-वॉक करते हुए वह गिर पड़ी और बेहोशी में चली गई। इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया। यह रूसी मॉडल तीन महीने के अनुबंध पर चीन गई थी। तकलीफदेह बात यह है कि जो एजंसी इस मॉडल से काम ले रही थी, उसने उसका बीमा तक नहीं कराया था। मेडिकल रिपोर्ट में साफ कहा गया कि व्लादा डिजुबा काम करते-करते बहुत थक गई थी। उसे आराम की सख्त जरूरत थी। मगर काम के दवाब ने उसे सोने नहीं दिया। इसी वजह से वह दिमागी बुखार की शिकार हुई और बाद में उसके शरीर के तमाम अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।

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व्लादा डिजुबा की मौत पर चीन के काम करने और मॉडल से काम लेने के तौर तरीकों पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। रूस के अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार कानूनी रूप से व्लादा को दिन में केवल तीन घंटे काम करने की इजाजत दी गई थी। लेकिन उससे बारह घंटे काम कराया गया। रूस अब अपनी मॉडल की मौत पर चीन से जवाब मांग रहा है। व्लादा मॉडल की मौत का यह मामला कोई अकेला नहीं है। पिछले दिनों एक जापानी रिपोर्टर की एक सौ उनसठ घंटे लगातार काम करने से हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। आज दुनिया में जिस तरह से फैशन का बाजार बढ़ रहा है उससे युवितयों में भी इस कैरियर को लेकर आकर्षण तेजी से बढ़ा है। रोम, इटली, पेरिस व मिलान जैसे शहर ग्लैमर की दुनिया के पर्याय बन चुके हैं।  अब एक नजर भारत पर डालें। यहां भी मॉडलों की स्थिति कोई अच्छी नहीं है। भारत में फैशन का बाजार तकरीबन चार सौ नब्बे अरब डॉलर का है। यह बाजार छह फीसद सालाना की रफ्तार से बढ़ रहा है। मॉडलों से ही फैशन के बाजार को ताकत मिलती है। मॉडलिंग का कारोबार जितना बढ़ेगा, उसी अनुपात में फैशन का बाजार भी फैलेगा। दरअसल मॉडलिंग का बाजार आज उच्च वर्ग से मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग की महिलाओं की ओर तेजी से बढ़ रहा है। आज मॉडलिंग के वैश्विक बाजार में जो कंपनियां काम कर रही हैं उनका मकसद रहता है कि इस कारोबार में मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग की उन लड़कियों का प्रवेश हो, जिन्हें ‘नेम ऐंड फेम’ के साथ-साथ अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे की भारी जरूरत होती है। शायद यही वजह है कि मॉडलिंग के लिए ठेका लेने वाली कंपनियां बहुत सोच-समझ कर अपनी कारोबारी सोच के तहत ही चौदह साल से इक्कीस साल तक की नाबालिग लड़कियों से अनुबंध करती हैं। असलियत यह है कि ये कंपनियां इन नाबालिग मॉडलों को कम दाम और कम सुविधाएं देकर मोटा मुनाफा कमाती हैं।

इन मॉडलों को पहले रात-दिन लगा कर प्रशिक्षण हासिल करना होता है और फिर उसी थकावट में रैंप पर कैटवॉक करना होता है। अनुबंध करने वाली कंपनियां इन नाबालिग मॉडलों के लिए न तो किसी चिकित्सा सुविधा और बीमे का प्रबंध करती हैं और न ही उनके भोजन व रहने-सहने की बेहतर व्यवस्था होती है। मॉडलिंग के कारोबार में इन मॉडलों को निहायत व्यक्तिगत और अकेले ही जीवन की लड़ाई लड़नी होती है। घर-परिवार से दूर रह कर इन चमक-दमक वाले शहरों में इन मॉडलों का अकेलापन और जीवन का तनाव और दवाब कई बार उन्हें आत्मघात के लिए मजबूर करता है। पिछले दिनों कंडोम का विज्ञापन करने वाली विवेका वनर्जी ने अपने ही घर में पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी थी। इसका कारण काम के दवाब से उनके परिवार से संबंधों का विच्छेद होना रहा था। 2006 में एक नामचीन मॉडल कुलजीत रंधावा ने अपने सुसाइड नोट मे लिखा कि वह मॉडलिंग कारोबार में जीवन के दवाब झेलने में असमर्थ रही है, इसलिए खुद को खत्म कर रही है।

फैशन समन्वयक सुनील मेनन का कहना है कि मॉडलिंग में आने वाली पेशेवर जीवन में आने वाली मुश्किलों का सामना न कर पाने से तनाव का शिकार हो जाती हैं। मुश्किल यह है कि काम करते-करते ये मॉडल बाद में ब्रांड तो बन जातीं हैं, लेकिन जीवन के संघर्ष से हार जाती हैं। दूसरे, मॉडल की परेशानी यह है कि एक बार इस व्यवसाय में आने के बाद इनका पूरा जीवन हमेशा अलर्ट रहने पर ही बीतता है। एक क्षण भी इनका ऐसा नहीं रहता जब ये मॉडल सकून से अपने घर-परिवार, सगे-संबंधियों या यार-दोस्तों से अनौपचारिक संवाद भी कर सकें। एक और खास बात यह कि मॉडलिंग का पेशा धीरे-धीरे विषाद फैलाने वाला कैरियर बन रहा है। यह पूरा का पूरा कारोबार पूरी तरह शारीरिक प्रदर्शन पर ही निर्भर है। इसलिए हर समय पूर्ण सजग रह कर खुद को दुनिया के सामने लाना होता है। अगर मॉडल फैशन की दुनिया से निकल कर फिल्म की ओर बढ़ जाती है तो ऐसी मॉडल खुद को बेहतर मानती हंै। लेकिन जो फिल्मों की मुख्य धारा में नहीं आ पातीं वे अवसाद की शिकार हो जाती हैं।

नए मॉडल के लिए मॉडलिंग का पेशा बहुत ही मुश्किल हालात पैदा करता है। इस कारोबार का सबसे बड़ा और जोखिम भरा पहलू यह है कि इसमें खारिज होने का खतरा बहुत रहता है। फिर, महिला मॉडल के लिए यह जरूरी है कि उसके दिल-दिमाग में चाहे जितना तनाव हो, मगर उसको बाहरी तौर पर हमेशा प्रसन्न मुद्रा में ही दिखाई देना होता है। कहना न होगा कि मॉडलिंग दरअसल फिल्मों की ओर बढ़ने का एक कदम है। पर यह अवसर हर मॉडल को नहीं मिल पाता। जो मॉडल इस अवसर से वंचित हो जाते हैं उन्हें विषाद से गुजरना ही होता है।

मॉडलों से जुड़ी सौंदर्य प्रतियोगिताएं आज ऐसे चौराहे पर आकर खड़ी हो गई हैं जहां अब इन पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत महसूस होने लगी है। सौंदर्य को बाजार तक ले जाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और गोरी चमड़ी के पारखी लोग निश्चित ही अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं। इस सच्चाई को कहने में कोई हिचक नहीं कि मॉडल का सुंदर दिखाई देना उसकी कमजोरी है। नारी की इसी कमजोरी को उसकी सबलता मान कर उसे मात्र देह तक समिति करना समाज का यह फैसला आज भी एकतरफा है। यदि यह फैसला दोतरफा होता तो इन मॉडलों की जिंदगी के इस खुले परकोटे पर तरह-तरह के सवाल न खड़े होते।  कहना न होगा कि सौंदर्य से जुड़ी इस वैश्विक अर्थव्यवस्था के नाम पर खड़ी की गईं सौंदर्य मॉडल के इस नाबालिगढांचे को ध्वस्त करके और इन्हें इनके अधिकार देकर इन मॉडलों को उनकी असली आजादी मिल सकेगी। साथ ही दुनिया में विश्व सुंदरी बनने का स्वप्न देखने वाली युवतियों को शरीर की इस नुमाइश से हटा कर उनके तन के साथ में मन के सौंदर्य को भी पुष्पित और पल्लवित करके ही इन मॉडलों की दुनिया को बेहतर बनाया जा सकेगा। ल्ल

 

 

 

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