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स्मरण- अगले जमाने में कोई मीर भी था

गालिब के कोई उस्ताद नहीं थे, लेकिन उन पर मीर के प्रभाव को देखकर कहा जा सकता है कि गालिब ने मन ही मन मीर को ही उस्ताद मान लिया था।

मीर ने अपनी फारसी शायरी में जिस वक्त उर्दू शब्दों का इस्तेमाल शुरू किया था, उस समय उर्दू अपने शुरुआती दौर में थी।

इश्क करो, क्योंकि बिना इश्क जिंदगी वबाल है और इश्क में दिल खोना असल कमाल है।’ अपने सूफी पिता मीर अली मुत्तकी की इस नसीहत को मीर तकी ‘मीर’ ने कुछ इस तरह जीवन में उतारा कि न सिर्फ उनका जीवन बल्कि उनका पूरा कलाम इश्क से सराबोर हो गया। अगर यह कहा जाए कि मीर ने अपने कलाम में जमाने के दर्द को अपना और अपने दर्द को दुनिया का दर्द बना कर पेश किया तो गलत नहीं होगा। मीर के बाद के करीब दो सौ साल के इस लम्बे अरसे में शायरी का अंदाज बदल चुका, अभिव्यक्ति भी बदलाव आए, इसके बावजूद मीर की शायरी आज भी खास-ओ-आम में प्रिय है तो इसकी वजह उनके कलाम की वह खासियत ही है जिसने उन्हें खुदा-ए- सुखन बना दिया। खुद मीर ने कहा भी था,

‘पढ़ते फिरेंगे गलियों में इन रेख्ता को लोग,
मुद्दत रहेगी याद ये बातें हमारियां’

मीर तकी ‘मीर’ का जन्म 1724 को आगरा में हुआ था। मीर के पिता ने दो विवाह किए थे। जब मीर ग्यारह वर्ष के ही थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गई। पिता की सारी संपत्ति पर सौतेले भाई मुहम्मद हसन ने कब्जा कर लिया। ऐसे में मीर के हालात बद्तर होते चले गए और वह रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गए। दिल्ली में बादशाह की ओर से उन्हें वजीफा मिलने लगा। 1739 में दिल्ली पर नादिर शाह के हमले में नवाब सम्सामुद्दौला के मारे जाने से उनका यह सहारा भी खत्म हो गया। मीर लिखते हैं, ‘जो लोग दरवेश (उनके सूफी पिता) के जीवन में मेरे कदमों की धूल को सुर्मा समझ कर अपनी आंखों में लगाते थे, इन हालात में उन लोगों ने भी मुझसे आंखें चुरा लीं।’ बाद में उनके सौतेले भाई के मामा सरताजुद्दीन अली खान ‘आरजू’ ने, जो कि उस समय के नामी शायरों में शुमार थे, मीर को अपने घर में सहारा दिया। मीर ने ‘तजकरा शोरा-ए-उर्दू’ में खान आरजू को अपना उस्ताद माना है। मीर कुछ ही दिन खान ‘आरजू’ के साथ रह पाए। उनके सौतेले भाई ने उनके और खान आरजू के बीच खटास पैदा कर दी थी। हालांकि, कुछ लोग इस विवाद की वजह मीर के प्रेम को बताते हैं। दरअसल, मीर खान ‘आरजू’ की पुत्री से पे्रम कर बैठे थे। इस बात का पता लगने के बाद ही दोनों के संबंधों में दरार आ गई। इस घटना से मीर को भी इतना गहरा आघात लगा कि उन्हें मानसिक उन्माद हो गया। उन्होंने सबसे मिलना-जुलना छोड़ खुद को एक कोठरी में बंद कर लिया। पे्रम के मारे के लिए शब्दों का मरहम सबसे बेहतर दवा है। मीर ने भी यही किया और अपना सारा ध्यान अपनी शायरी पर लगाया। पे्रम की जो पीड़ा उनके दिल को पहुंची थी उससे उनके कलाम में और गहराई आ गई।

उर्दू साहित्य की महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मुकदमा शेअरो-शायरी’ के लेखक ख्वाजा अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ मीर की शायरी के बारे में लिखते हैं, ‘मीर की शायरी सीधी-सादी और प्रकृति के करीब है। इसके बावजूद वह अनोखी है।’ मीर ने गजल, रुबाई, कसीदा, मसनवी आदि उर्दू की सभी विधाओं में लिखा। मगर मुख्यत: वह गजल के शायर थे। उनके कसीदे खास असर छोड़ने में नाकाम रहे, लेकिन उनकी मसनवियों ने उर्दू साहित्य में अपना अलग स्थान बना लिया। इसकी वजह यह भी थी कि उन्होंने सबसे अलग हटकर इश्क को अपनी मसनवियों का विषय बनाया। वह पहले शायर हैं जिन्होंने इश्क को अपनी मसनवियों का विषय बनाया। ‘शोला-ए-इश्क’ उनकी ऐसी ही मसनवी है। इसमें उन्होंने परशुराम की पत्नी की दर्दनाक कहानी को कलमबंद किया है। वहीं कुछ मसनवियां उन्होंने अपने घर की बदहाली और बरसात के हालात पर भी लिखीं।

मीर ने अपनी फारसी शायरी में जिस वक्त उर्दू शब्दों का इस्तेमाल शुरू किया था, उस समय उर्दू अपने शुरुआती दौर में थी। उस समय का कलाम फारसी शब्दों से बोझिल था जिसे समझना आम हिंदुस्तानियों के लिए आसान नहीं था। मीर ने माहौल और लोगों के स्वभाव के मुताबिक उर्दू-फारसी का इस्तेमाल किया और इसमें हिंदी के शब्दों को भी शामिल किया। यही वजह है कि उस दौर में भी उनका कलाम हिंदी के करीब और लोगों के मिजाज के मुताबिक नजर आता है। उनके कलाम की ही खासियत है कि फिल्मी परदे पर भी उनकी गजलों ने प्रशंसा बटोरी। फिर चाहे, ‘दिखाई दिये यूं कि बेखुद किया, हमें आपसे भी जुदा कर चले’ जैसी गंभीर गजल हो या फिर, ‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है’, जैसा पे्रम को व्यक्त करता उनका कलाम। दो सदियों पहले लिखी उनकी शायरी आज भी प्रासंगिक है। शायर का कलाम उसके दौर का आईना होता है। मीर की शायरी का ज्यादातर हिस्सा उनकी आपबीती है। वह कहते हैं-

हमको शायर न कहो ‘मीर’ कि साहिब हमने,
दर्दो-गम कितने किए जमा तो दीवान किया।

सरल और आसान शब्दों में कलाम कहना मीर की खासियत थी। उनकी इन्हीं खूबियों ने उन्हें खुदा-ए-सुखन बना दिया। आज के दौर में भी जब गालिब का कलाम युवाओं की पसंद बना हुआ है, उन्हीं गालिब के शुरुआती कलाम को देखते ही मीर ने कहा था, ‘अगर इस लड़के को काबिल उस्ताद नहीं मिला तो यह अर्थहीन शेर कहने लगेगा।’ मीर के शब्दों में आने वाले समय के गालिब की तसवीर नजर आती है। आगे चलकर गालिब उर्दू शायरी के उस्ताद शायर हुए। खुद गालिब के कोई उस्ताद नहीं थे, लेकिन उन पर मीर के प्रभाव को देखकर कहा जा सकता है कि गालिब ने मन ही मन मीर को ही उस्ताद मान लिया था।

गालिब मीर के कलाम से बहुत प्रभावित थे। वह कहते हैं-
‘गालिब’ अपना यह अकीदा है बकौले-नासिख,
आप बे-बहरा हैं जो मोतकिद-ए-मीर नहीं।

यानी, अगर आप मीर को शायरे-उस्ताद नहीं मानते तो आपको शायरी का अलिफ भी नहीं आता। एक जगह कहते हैं-
रेख्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो ‘गालिब,
कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था।

जिस दौर में पे्रम की उमंगें शायरों के कलाम पर हावी नजर आती हैं, उसी दौर में मीर ने दर्दो-गम से भरा कलाम पेश किया। अपने दर्द भरे इसी कलाम के बूते मीर ने दिलों पर राज किया। वह शायरी में गंभीरता के पैरोकार थे और तमाम उम्र इसी तर्ज पर लिखते रहे। मीर के कलाम की इसी खूबी ने उन्हें शायरी में अमर बना दिया। मीर के लिए शायरी दिल बहलाने का सामान नहीं थी, बल्कि वह इसे जीवन का अहम हिस्सा मानते थे। इसलिए हर किसी को शागिर्द बना लेना उन्हें मंजूर नहीं था।

मीर के कलाम की अहमियत को अपने दौर के तमाम उस्ताद शायरों ने स्वीकार किया था। चाहे मिर्जा मुहम्मद रफी ‘सौदा’ हों, गÞालिब हों, या फिर नासिख, अकबर और हसरत मोहानी जैसे शायर। इन सभी ने मीर को उस्ताद शायर माना। अंगे्रजी हुकूमत पर अपने तीखे कलाम से प्रहार करने वाले शायर अकबर ‘इलाहाबादी’ ने मीर के सामने अपनी शायरी को भी कम महत्त्व का करार दिया और कहा-
मैं हूं क्या चीज जो इस तर्ज पे जाऊं ‘अकबर’,
नासिखो-जौक भी जब चल न सके मीर के साथ।
वहीं ‘हसरत’ मोहानी ने अपने कलाम को मीर के कलाम के सामने यह कहकर कमतर बताया है-
शेअर मेरे भी हैं पुरदर्द व लेकिन ‘हसरत’,
मीर का शैवा-ए-गुफ्तार कहां से लाऊं।
जौक ने मीर के कलाम की अहमियत कुछ इस तरह व्यक्त की है-
न हुआ पर न हुआ ‘मीर’ का अंदाज नसीब,
‘जौक’ यारों ने बहुत जोर गजल में मारा।

दिल्ली पर बार-बार होते हमलों, मार-काट से उनका दिल उकता चुका था और उनका शायर दिल सुकून चाहता था। इसलिए अवध के नवाब के बुलावे पर मीर दिल्ली छोड़कर लखनऊ जा बसे। इस दौर में आकर मीर को संघर्ष से मुक्ति मिली और तंगी के हालातों से छुटकारा भी। मीर के आने से लखनऊ में भी उर्दू साहित्य की महफिलों में जान आ गई। अक्सर उनके संरक्षण में शेअरो-शायरी की महफिलें सजने लगीं। वह अपने समय के प्रसिद्ध शायरों में शुमार थे।  लखनऊ की अवाम ने भी मीर के कलाम को सिर-आंखों पर बिठाया। यहीं पर उन्होंने अपना जीवन चरित्र ‘जिक्रे-मीर’ के नाम से लिखा। ‘निकात उल शोअरा’ भी उनके निजी जीवन पर आधारित पुस्तक है। वह विभिन्न दरबारों और रईसों के संरक्षण में रहे थे इसलिए उस दौर के सियासी हालात पर भी उन्होंने विस्तार से लिखा। तमाम उम्र वह लखनऊ के होकर रहे और यहीं 20 सितम्बर 1810 को उनकी मृत्यु हो गई। उनके छह गजल संग्रह और ‘कुल्लियाते-मीर’ के नाम से एक संकलन उपलब्ध है। १

 

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