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चिंता- लापरवाही के शिकार मरीज

प्रसव के लिए की गई सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने पीड़िता रुबीना के गर्भाशय में सुई छोड़ दी थी, जिसके चलते अब वह कभी मां नहीं बन सकेगी।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। फोटो सोर्स- यूट्यूब

दि ल्ली उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीते 11 जून को रोहतक रोड, दिल्ली स्थित एक निजी अस्पताल के खिलाफ चिकित्सीय लापरवाही का आरोप सही पाए जाने पर उस पर तीस लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। प्रसव के लिए की गई सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने पीड़िता रुबीना के गर्भाशय में सुई छोड़ दी थी, जिसके चलते अब वह कभी मां नहीं बन सकेगी। आयोग ने रुबीना को तीन लाख रुपए मुआवजा और दस हजार रुपए मुकदमा खर्च के बतौर अदा करने का निर्देश अस्पताल प्रशासन को दिया है। बाद में उच्च न्यायालय दिल्ली ने भी इसी मामले में अस्पताल के पांच डॉक्टरों के खिलाफ इलाज में लापरवाही बरतने, धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा, साक्ष्य मिटाने और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है।

‘धरती के भगवान’ कहे जाने वाले चिकित्सकों के गैरजिम्मेदाराना रवैए का यह ताजा उदाहरण है। पिछले कुछ सालों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी कई खबरें आ रही हैं, जो चिकित्सा में बरती जा रही घोर लापरवाही की कहानी कहती हैं। इलाज में लापरवाही, आॅपरेशन के दौरान मरीज के शरीर में कैंची-तौलिया आदि छोड़ देना और मरीज की मौत हो जाने के बाद उसके शव के साथ अमानवीय व्यवहार के मामले अक्सर प्रकाश में आते रहते हैं। मौत के बाद अस्पताल प्रशासन मरीज का शव तब तक घरवालों के सुपुर्द नहीं करता, जब तक इलाज की पाई-पाई अदा न हो जाए। बीते 12 जून को उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की एक स्टॉफ नर्स ने अमानवीयता की हद पार कर दी और मृत पैदा बच्ची का शव देने के नाम पर उसके परिवारजनों से बारह सौ रुपए ऐंठ लिए। झारखंड के धनबाद स्थित एक निजी अस्पताल में एक व्यक्ति को अपनी बच्ची का शव पाने के लिए अपनी साइकिल बेचनी पड़ी। महज तेरह सौ रुपये बकाए के चलते उसे शव के पास जाने नहीं दिया गया। गली-गली में खुले नर्सिंगहोमों की हालत और भी बदतर है। अधिकतर नर्सिंग होमों की कार्यप्रणाली यह है कि वे इलाके में और आसपास निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों (वे चाहे डिग्रीधारी हों या झोलाछाप) का नेटवर्क संचालित करते हैं। ऐसे चिकित्सक इन नर्सिंगहोमों के लिए मरीज तलाश कर लाते हैं। पहले वे खुद इलाज करते हैं, जब मामला उनके हाथ से निकल जाता है, तब उन्हें सौंप देते हैं। इनमें उन्हें कमीशन भी दिया जाता है।
अक्तूबर, 2016 में दिल्ली की अंबेडकरनगर निवासी आशा शर्मा ने भारतीय चिकित्सा परिषद और स्थानीय थाने में खानपुर स्थित एक नर्सिंग होम और उसके संचालक के खिलाफ इलाज में लापरवाही बरतने और धोखाधड़ी करने की शिकायत दर्ज की थी। आशा शर्मा को अल्ट्रासाउंड से पता चला कि उनके पित्ताशय में पथरी है। नर्सिंग होम के संचालक ने उन्हें इलाज करने का दिलासा देकर उनसे पच्चीस हजार रुपए जमा करा लिए और कहा कि आॅपरेशन वह स्वयं करेगा। लेकिन, आपरेशन किसी और से कराया गया। कुछ दिनों बाद आशा शर्मा को दर्द बढ़ा, तो वह फिर उसी नर्सिंग होम गर्इं। पता चला कि आपरेशन के टांके टूट गए हैं, जिसके लिए उससे फिर पच्चीस हजार रुपए की मांग की गई। दिल्ली के एक नामी-गिरामी अस्पताल में पिछले दिनों भारत-तिब्बत सीमा बल का एक सब-इंस्पेक्टर एक अदद बेड के लिए तरस गया। बहुत शोरशराबा होने और अखबारों में खबरें छपने के बाद उसे बिस्तर मिला। उत्तर प्रदेश के बांदा जिला अस्पताल में एक लावारिस महिला मरीज को कुत्तों ने नोचकर मार डाला।

चिकित्सीय लापरवाही, भयादोहन के जरिए वसूली करने और धोखाधड़ी करके मरीजों को लूटने की घटनाएं रोज ही घटती हैं। ऊपर तो कुछ उदाहरण दिए गए हैं। असल में, अस्पतालों का चाहे वे सरकारी हों या निजी, पूरी कार्यप्रणाली ही अनोखी है। सरकारी अस्तपालों में न दवाएं हैं, न साधन। वहां लाइन भी बहुतें लंबी है। निजी अस्पतालों का ध्यान केवल कमाई पर रहता है। अस्पतालों में अक्सर देखा गया है कि वार्ड ब्वाय और सफाईकर्मियों से इलाज संबंधी ऐसे काम कराए जाते हैं, जिनका उन्हें रंचमात्र ज्ञान नहीं होता। नतीजा मरीजों की मौत होती है। इनकी मनमानी, लापरवाही और अमानवीय व्यवहार के खिलाफ विभिन्न अदालतों द्वारा कई बार दंडात्मक कार्रवाई की जा चुकी है। इसके बावजूद चिकित्सक और अस्पताल इनसे कोई सबक नहीं ले रहे हैं। सात अगस्त, 2015 को पंजाब के अमृतसर स्थित एक निजी अस्पताल और उसके चिकित्सक पर जिला उपभोक्ता अदालत ने पांच-पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। मामला यह था कि चिकित्सक ने अपने नाम का गलत बोर्ड लगा रखा था, जो योग्यता थी ही नहीं, वह लिखा रखा था। रूपेश नामक मरीज का इस चिकित्सक ने गलत इलाज किया। बाद में रुपेश की मृत्यु हो गई। सवाल उठता है कि एक ओर तो केंद्र से लेकर राज्यों तक के अपने कानून हैं, जो हर क्षण मरीजों की भलाई का दावा करते हैं।

मगर, धरातल पर देखें तो हालत बिल्कुल उल्टी है। चिकित्सीय लापरवाही के अलावा और भी कई तरह की कठिनाइयां हैं, जो मरीज और तीमारदार आए दिन झेलते हैं। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक शारीरिक जांच का पूरा उद्योग ही तैयार हो गया है। चिकित्सक छोटी-सी बीमारी होने पर भी इतनी अधिक जांचें लिखते हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं होती। जिन प्रयोगशालाओं में मरीजों को जांच के लिए भेजा जाता है, वहां चिकित्सकों का कमीशन बंधा होता है। इस तरह इस गोरखधंधे को देखा जाए तो यह एक पूरा घोटाला बना चुका है। सरकारों को चाहिए कि वे इस नेटवर्क की गहन जांच कराएं और जल्द से जल्द इस पर रोक लगाएं। वर्ना यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है।

जितने लोग पीड़ित होते हैं, उसके एक-दो प्रतिशत लोग भी शिकायत करने नहीं जाते। जो उपभोक्ता फोरमों में जाते हैं, उन्हें भी सात-आठ साल तक फैसले का इंतजार करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में पीड़ित और भुक्तभोगी चुप लगा कर बैठ जाते हैं। अगर शिकायतों का निस्तारण ही जल्दी हो जाए तो भी मरीजों को कुछ राहत मिले और अस्पताल और चिकित्सकों के मन में कुछ भय पैदा हो, मगर यहां तो सारा मामला ही उलट-पुलट है। जो व्यक्ति पहले ही लुट-पिट चुका होता है, उसमें लड़ने की ताकत नहीं रह जाती। इक्का-दुक्का लोग फोरम में जाते हैं तो वहां भी सालोंसाल मामला चलता है। ऐसे में किससे उम्मीद की जाए, यह एक गंभीर सवाल है। १

 

 

 

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