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स्मृतिशेष: रंजकता के रचनाकार

चार दशकों तक अपने संगीत सागर में श्रोताओं को डुबकी लगवाने वाले बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत- दोनों जगह अपनी धाक जमाई।

Author December 18, 2016 12:36 AM
प्रसिद्ध गायक एम. बालमुरलीकृष्‍ण। (FILE PHOTO)

पंद्रह अगस्त, 1988 को दूरदर्शन पर राष्ट्रीय अखंडता को समर्पित एक गीत रिलीज हुआ- ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’, जिसमें तमिल में ‘नंबिसेई…’ के बोलों में लगी तान की गूंज पूरे देश में सुनाई दी। 1965 में आई शिवाजी गणेशन अभिनीत फिल्म ‘तिरूविलयादल’ का गीत ‘ओरू नाल पोथुमा’ तो तमिल श्रोताओं में पहले ही बहुत लोकप्रिय हो चुका था, लेकिन ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की उस तान से एम बालमुरलीकृष्ण उत्तर भारत के घर-घर में पहुंच गए। चार दशकों तक अपने संगीत सागर में श्रोताओं को डुबकी लगवाने वाले बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत- दोनों जगह अपनी धाक जमाई। कर्नाटक संगीत के इस लीजेंड ने पहली बार हिंदुस्तानी घराने के दिग्गज संगीतकारों के साथ मशहूर जुगलबंदियां कीं। इस तरह का उनका पहला कार्यक्रम मुंबई में हुआ, जहां उन्होंने पंडित भीमसेन जोशी के साथ स्वरों में सवाल-जवाब किए। पंडित हरिप्रसाद चैरसिया की बांसुरी की तान का जवाब बालमुरलीकृष्ण ने अपने कंठ से तो किशोरी अमोनकर के स्वरों का उत्तर अपने आध्यात्मिक आलापों से दिया।

ब्रिटिशकाल की मद्रास प्रेसीडेंसी (अब आंध्र प्रदेश राज्य का एक हिस्सा) के पूर्वी गोदावरी जिले के शंकरगुप्तम स्थित उस घर की दीवारें चौबीसों घंटे कर्नाटक संगीत के स्वरों को सुनती रहती थीं, जहां 6 जुलाई, 1930 को मंगलमपल्ली बालमुरलीकृष्ण ने जन्म लिया। पिता बांसुरी, वायलिन और वीणा को झंकृत करते थे तो मां वीणा पर स्वर लहरियां बिखेरती थीं। मुरलीकृष्ण शिशु ही थे, तभी मां के आंचल से महरूम हो गए। संगीत प्रेमी पिता ने ही मां बनकर उनको पाला। स्वरों के बीच सांस लेते बालक मुरलीकृष्ण के रोम-रोम में संगीत बस गया। पिता ने यह देखा तो उन्हें त्यागराज की शिष्य परंपरा के वंशज पारुपल्ली रामकृष्ण पंतुलु के सुपुर्द कर दिया और यहीं से मुरलीकृष्ण ने कर्नाटक संगीत की सरगम सीखी। उस समय मुरलीकृष्ण महज आठ साल के बालक थे। विजयवाड़ा के त्यागराज आराधना में कार्यक्रम चल रहा था, जिसमें प्रतिष्ठित हरिकथा वाचक मुसुनुरी सूर्यनारायण मूर्ति भागवतार भी मौजूद थे। मुरलीकृष्ण ने अपना पहला संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किया। मुसुनुरी सूर्यनारायण मूर्ति बच्चे के भीतर संगीत की अद्भुत प्रतिभा देखकर बोल उठे- ‘बाल मुरलीकृष्ण’! और फिर यही उनका नाम पड़ गया- ‘मंगलमपल्ली बालमुरलीकृष्ण’। 15 साल की उम्र तक बालमुरलीकृष्ण ने सभी 72 मेलकर्ता रागों में महारत हासिल कर ली और इन सभी रागों में कृतियों की रचना की। 1952 में जनक राग मंजरी प्रकाशित हुई और संगीता रिकॉर्डिंग कंपनी ने नौ खंडों की शृंखला में रागांग रावली के नाम से इसे रिकॉर्ड किया। युवा बालमुरलीकृष्ण के संगीत कार्यक्रमों की संख्या बढ़ती गई और इसलिए उन्हें अपनी स्कूली पढ़ाई बंद करनी पड़ी। मंगलमपल्ली जिस कार्यक्रम में गाते, उसमें मंगल ही मंगल हो जाता। कर्नाटक संगीत गायक के रूप में स्थापित होने के बाद उन्होंने मृदंगम पर ताल साधी और वायलिन पर अपनी उंगलियों से स्वरों को इस कदर झंकृत किया कि प्रतिष्ठित मंचों पर कई संगीतकारों के साथ उनकी जुगलबंदी हुई। फिर कंजीरा बजाने में भी महारत हासिल की और एकल वायला वादन में तो ख्याति ही अर्जित कर ली।

उन्होंने दुनियाभर में लगभग 25,000 संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किए। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, रूस, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि देशों को कर्नाटक संगीत की रंजकता से सराबोर कर दिया। उनकी मातृभाषा तेलुगु थी, लेकिन उनके कंठ से निकले स्वरों ने तेलुगु के साथ कन्नड़, संस्कृत, तमिल, मलयालम, हिंदी, बंगाली, पंजाबी की रचनाओं को भी अमर कर दिया। हर भाषा में उनका उच्चारण इतना स्पष्ट था कि बंगाली में रवींद्रनाथ ठाकुर की सभी रवींद्र संगीत रचनाओं को रिकॉर्ड करने के लिए उन्हें ही चुना गया। ठाकुर के गीतिकाव्य और ब्रिटेन स्थित गोवा संगीतकार डॉ. जोएल के संगीत निर्देशन में ब्रिटिश गायक मंडली के साथ उन्होंने एकल कलाकार के रूप में यादगार ‘गीतांजलि सूट’ पेश किया। बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक स्वर-ताल का मेल-जोल फ्रेंच भाषा से कराया, तो मलेशियाई राजघराने के लिए आयोजित समारोह में अग्रणी कर्नाटक वाद्य शिक्षक टीएच सुभाषचंद्रन के साथ जैज फ्यूजन में भी हाथ आजमाया। फरवरी 2010 में उन्होंने विशाखापत्तनम में तीन दिवसीय एक संगीत समारोह में तीनों दिन अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया।संगीत की सभी विधाओं में अपनी बहुमुखी प्रतिभा, सम्मोहित करने वाली आवाज और रचनाओं के प्रतिपादन के अनोखे ढंग के कारण बालमुरलीकृष्ण कर्नाटक संगीत के लीजेंड बन गए। संगीत की सात विधाओं में आॅल इंडिया रेडियो ने उन्हें ‘टॉप ग्रेड’ आर्टिस्ट घोषित किया। बालमुरलीकृष्ण ने मनोरंजन के लिए लोकप्रिय मांग के साथ परिष्कृत सुर कौशल और शास्त्रीय संगीत के तालबद्ध पैटर्न का मेल किया और पूर्ववर्ती दिग्गजों की आकाशगंगा की तरह अपने तरीके से संगीत की विरासत को सहेजा। कवि, संगीतकार और संगीत वैज्ञानिक के रूप में तीनों की रचनाओं के तत्त्व बहाल किए और कर्नाटक संगीत में एक नए युग की शुरुआत की। स्वयं तेलुगु, संस्कृत और तमिल सहित विभिन्न भाषाओं में चार सौ से ज्यादा संगीत रचनाएं रचीं, जिनमें भक्ति संगीत से लेकर वर्ण, कृति, भावगीत और थिलान तक हैं, तो भद्राचल रामदास और अन्नामाचार्य की संगीत रचनाओं को भी लोकप्रिय बनाया। थिलान में संगथी का प्रवेश कराने में भी उन्हें अग्रणी माना जाता है।

दरअसल, गैरपरंपरागत, प्रयोग की भावना और असीम रचनात्मकता ही मुरलीकृष्ण की संगीत यात्रा की विशेषता रही। उन्होंने कर्नाटक संगीत परंपरा को बरकरार रखते हुए कई नवाचार किए। गणपति, सर्वश्री, सुमुखम, लावंगी जैसे राग उनके स्वर-ज्ञान सागर से ही निकले, जिनमें आरोह और अवरोह पैमाने तीन या चार ही नोट हैं। उनके द्वारा रचित महाती, लावंगी, सिद्धि, सुमुखम में केवल चार और सर्वश्री, ओंकारा, गणपति में तीन नोट हैं। बालमुरलीकृष्ण ने ताल की वर्तमान पद्धति के हिस्से ‘सशब्द क्रिया’ (तालों की वे क्रियाएं, जो ध्वनि-शब्द उत्पन्न कर सकती हैं) में ‘गति बेदम’ को शामिल किया और ताल पद्धति की एक नई शृंखला शुरू की। वैसे संत अरुंगिरिनादर भी अपने प्रसिद्ध तिरुपुगाज में ऐसी पद्धतियों को शामिल करते थे, लेकिन केवल संधाम के रूप में। बालमुरलीकृष्ण ने ऐसे संधामों को अंगम और परिभाषा के साथ एक तार्किक लय में ढाला। त्रिमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी और नवमुखी प्रारंभिक वर्गीकरण हैं, जिनका नामकरण उन्होंने अपनी नई ताल पद्धति के लिए किया।नए रागों के आविष्कार के लिए बालमुरलीकृष्ण की आलोचना भी हुई। रूढ़िवादियों ने इसे अपवित्र करने वाला काम माना, लेकिन वास्तव में नए रागों का नवप्रवर्तन त्यागराज की विरासत को परिभाषित करने वाली खासियत थी।

तभी तो त्यागराज कृत नागोमोमू की भावुक व्याख्या के लिए बालमुरलीकृष्ण को खूब वाहवाही मिली और वह आज भी लोकप्रिय है। बालमुरलीकृष्ण की रुचि जब संगीत चिकित्सा के प्रति तेजी से बढ़ी तो उन्होंने संगीत से सेहत सुधार पर काम शुरू किया। बालमुरलीकृष्ण ने एवीएम प्रोडक्शंस के बैनर तले 1967 में बनी तेलुगु फिल्म ‘भक्त प्रह्लाद’ नारद की भूमिका के साथ अभिनय की जमीन पर भी कदम रखा था, जिसमें उन्होंने अपने गीत भी गाए। उन्होंने तेलुगु और तमिल की कुछ अन्य फिल्मों में भी अभिनय किया और तेलुगु, संस्कृत, कन्नड़ द्न तमिल की अनेक फिल्मों में अपनी आवाज दी। वह एकमात्र कर्नाटक संगीतकार रहे, जिन्हें तीन राष्ट्रीय पुरस्कार- सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक, सर्वश्रेष्ठ संगीतकार और सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के रूप में मिले और फ्रांस सरकार की ओर से चेविलियर्स आॅफ द आर्डर डेस आर्ट्स एट डेस लेटर्स मिला। भारत के तीनों पद्म पुरस्कार- पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण के साथ संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, यूनेस्को से महात्मा गांधी रजत पदक और ग्लोबल इंडियन म्यूजिक एकेडमी की ओर से लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड उनकी झोली में गिरकर खुद सम्मानित हो गए। 22 नवंबर, 2016 को बालमुरलीकृष्ण की सांसों की लय की गति बेदम हो गई और फिर सम पर न आ सकी, लेकिन कृष्ण की मुरली की-सी बालमुरलीकृष्ण की तान संगीत प्रेमियों की स्मृतियों में सदैव गूंजती रहेगी। ०

 

 

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