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विमर्श- रचना और विचारधारा

सदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में सर्जनात्मक संकट के दौर को लेकर बहुत चर्चाएं और विमर्श हो रहे हैं।

Author January 7, 2018 5:25 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मीना बुद्धिराजा

सदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में सर्जनात्मक संकट के दौर को लेकर बहुत चर्चाएं और विमर्श हो रहे हैं। इनके केंद्र मेंं मुख्य चिंता यही है कि हिंदी मेंं कोई रचना विशेष अपनी वास्तविक अस्मिता और संघर्षशील, समझौता-विहीन भूमिका कैसे अर्जित कर सकती है। हिंदी की रचनाशीलता मेंं वैचारिक नेतृत्व की कमी और जिस चिंतन-विरोधी प्रवृत्ति की बात की जा रही है, उसमें समकालीन द्वंद्व और संघर्ष का गायब होना एक बड़ा प्रश्न है। महत्त्वाकांक्षाओं और सुविधा के नियमों से परिचालित इस समय में रचना और रचनाकार की परिभाषाएं ही मानो बदल गई हैं। यह सच है कि नवपूंजीवाद, भूमंडलीकरण और बाजारवाद के चलते जो संकट सारी दुनिया में उत्पन्न हुआ है, उसका प्रभाव साहित्य और समाज पर भी पड़ा है और लेखन कर्म काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

साहित्य अंतत: मानव मूल्यों को बचाने का ही महत प्रयास करता है। हर युग का साहित्य अन्याय, शोषण और विषमता के प्रतिरोध में खड़ा होता है। एक रचनाकार के लिए अपनी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के यथार्थगत प्रभावों और परिवेश के दबावों से निरपेक्ष रहना संभव नहीं होता। अन्यथा उसका साहित्य अपने रचनात्मक प्रभाव और सार्थकता खोने लगता है। प्रेमचंद ने जब ‘साहित्य को समाज और राजनीति के आगे चलने वाली मशाल’ कहा तो वे साहित्य की परिवर्तनकारी शक्ति को पहचान रहे थे। सदियों से उपेक्षित मानवता के मूक प्रतीक किसान, मजदूर, दलित, नारी, शोषित, वंचित और पीड़ित त्रासद समाज के चरित्र उनकी सशक्त लेखनी से व्यक्त हुए। आज स्थितियां बदली हैं और साहित्यकार से पहले जैसी प्रतिबद्धता का आग्रह नहीं है। विचारधारा के अंत ने साहित्य की स्वायत्तता और प्रतिबद्धता पर अनेक प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। आज लेखक वैचारिक नेतृत्व के लिए किसी दल या संगठन विशेष पर निर्भर नहीं रहना चाहता, क्योंकि जिन मुद्दों पर वह सोच रहा है, जिन सवालों से वह जूझ रहा है, उसके लिए उसका जनसामान्य के यथार्थ से जुड़ना ज्यादा जरूरी और प्रासंगिक है। अब भूमडंलीकरण और नव-उदारीकरण का यथार्थ, आदिवासी, अल्पसंख्यक, दलित और उत्पीड़ित लोगों के अस्मिता विमर्श, स्त्री-मुक्ति, मानवाधिकार, बाजारवाद और मुक्तपूंजी की वैकल्पिक व्यवस्था जैसे अनेक विषय नई सजृनशीलता के साथ और वैचारिक चिंतन के रूप में सामने आए हैं और हिंदी के वर्तमान परिदृश्य में सम्मिलित हैं।

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वर्तमान रचनाशीलता की मुख्य चिंता यही है कि रचना में विचार को हटा कर ‘बाजार या उत्पाद’ को स्थापित करने के प्रलोभन और दिशाहीन भटकाव से उसे कैसे बचाया जाए। अन्याय के प्रतिरोध और अधिकारों से वंचित जनता के लिए संघर्ष और लेखन के वे सरोकार, जो बृहतर समाज से जुड़े हों, यही लेखक के सामने सबसे बड़ा दायित्व होता है। यही ईमानदार प्रयास किसी रचना की जीवंतता और सार्थकता के रूप में उसकी युगीन प्रामाणिकता को साबित करता है। रचनाकार के आत्मसंघर्ष का यह प्रयास सत्ता और बदलाव की शक्तियों के बीच अंतिम और निर्णायक रूप से जनहित में ही होना चाहिए। उपभोक्तावादी मानसिकता और बाजारवादी शक्तियां तो यही चाहती हैं कि समाज की वह चेतना संघर्ष और द्वंद्व रहित हो, जो अतंत: सामाजिक आर्थिक न्याय का आधार बनती है। ऐसी स्थितियों में समकालीन लेखन को विचारहीन, अवसरवादी महत्त्वाकांक्षी, संवेदनहीन, आत्ममुग्ध और विकल्पहीन होने से बचाना ही मुख्य चुनौती है और एक बड़ा उत्तरदायित्व भी। निराला से लेकर मुक्तिबोध ने रचनाकार की जिस ‘आत्मिक स्वतंत्रता’ की बात कही थी वही बाहरी और भीतरी रूप से स्वतंत्र विवेक की सहचर, समानता, न्याय और साहित्य में मानव मुक्ति के लिए संघर्ष का आधार हो सकती है।

वर्तमान समय जिस जटिल और बहुआयामी यथार्थ तथा उपभोगवादी संस्कृति के दौर से गुजर रहा है उसने मानवीय जीवन की मूल्य व्यवस्था के हर पहलू को ध्वस्त किया है। ऐसी विध्वंसक स्थितियों में साहित्य की उर्वरता और अस्तित्व को स्थायी रखने और रचनाकार की अस्मिता को सामाजिक सरोकारों और मूल्यों का पक्षधर बनाए रखना एक बड़ा प्रश्न है। सर्जना के संकट के इस दौर में जब तक साहित्य में कोई विराट तनाव, अथक संघर्ष, कोई दुर्निवार अभिव्यक्ति नहीं आती, तब तक उसकी प्रासंगिकता और उपादेयता स्पष्ट नहीं हो सकती। जब रचनाकार अपने समय और परिवेश की समस्याओं, अतंर्विरोधों, विसंगतियों और त्रासदियों को बारीकी से देख पाता है, तो रचना और पाठक के बीच जो संबध स्थापित होता है। वह एक जीवंत उपस्थिति और संवादधर्मिता के रूप में स्वंय ही प्रचारतंत्र से ऊपर उठ कर कालजयी साहित्य का निर्माण करने में संभव होता है। जैसा कि ‘फिदेल कास्त्रो’ ने कहा है कि ‘इस समय संघर्ष का सबसे बड़ा मोर्चा संस्कृति है।’ भाषा, साहित्य और कला जैसे क्षेत्र निश्चित रूप से इस व्यापक चिंता के प्रश्न में आते हैं। इसके अतंर्गत मानव-अस्तित्व की प्रत्येक गतिविधि शामिल है, जो बाजारवाद की विकृतियों के निरंतर दबाव से संवेदना और विचार के स्तर पर सर्वाधिक आघातों का सामना कर रही है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और बाजारवादी संस्कृति के कुटिल प्रयासों से बचा कर साहित्य की विश्वसनीयता को स्थापित करना जहां आज रचनाशीलता की चुनौती है, वहीं जाति, क्षेत्रवाद, व्यक्तिगत राग-द्वेष और संगठनों के सत्ता-केंद्रों से साहित्य के परिदृश्य को संचालित करने से यह संकट और भी बढ़ जाता है। पतनशील मूल्यों के समय में साहित्य को किसी निश्चित फार्मूलेबाजी, गुटबंदी की राजनीति और प्रायोजित विमर्शों से बचाना उसके सर्जनात्मक मूल्यों को बचाना भी है।

निस्संदेह समकालीन दौर में भी अनेक रचनाकार अपने लेखन में प्रतिरोध की जीवनीशक्ति को बनाए रख कर साहित्य के जनंतात्रिक विस्तार की लड़ाई लड़ रहे हैं, साथ ही मानवीय और सामाजिक सरोकारों को भी वे आंखों से ओझल नहीं करते। यथास्थितिवाद तथा निरंतर कठिन और निर्मम होते समय से टकराते हुए रचनाकार की प्रतिबद्धता जहां अपने पाठक और समाज के प्रति होती है, वहीं अपनी वैचारिक स्वतंत्रता और सृजनशीलता को बचाए रखना भी उसके लिए जरूरी है। इतिहास और विचारधारा के अंत की घोषणा भी अंतत: एक नए विचार-युग की शुरुआत ही मानी जा सकती है। क्योंकि साहित्य मनुष्यता और सघंर्ष की परिभाषा है और लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता ही इसका आधार है, जिसे वह अपनी सूक्ष्म दृष्टि, समझ-बूझ, व्यक्तिगत ईमानदारी और रचनात्मक दायित्व के रूप में अपनी रचना में अभिव्यक्त करता है। ०

 

 

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