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प्रसंगवश- यहां तदर्थ सुविधा नहीं है

साहित्य का बुनियादी सवाल प्राथमिकता का सवाल है। और यही बस अकेला सवाल है।

प्रतीकात्मक चित्र।

हित्य कोई पेशा नहीं है। कोई कारोबार नहीं है। उद्योग नहीं है। नौकरी तो बिल्कुल ही नहीं है।
जितना यह सच है, उतना ही यह भी सच है कि इन सबसे साहित्य का कोई विरोध नहीं है।
साहित्य का नौकरी से कोई विरोध नहीं है, नौकरी की दीनता से जरूर उसका विरोध है। पद की अहमन्यता से जरूर उसकी अनबन है। साहित्य का सत्ता से कोई विरोध नहीं है, सत्ता के आतंक को वह जरूर इनकार करता है।
साहित्य का कारोबार से कोई मनमुटाव नहीं है, यह जरूर है कि वह किसी भी कारोबार में चालबाजियों का समर्थन नहीं करता। किसी भी उद्योग में वह शुभ से वंचित लाभ को अपनी सहमति नहीं देता। उसके साथ नहीं होता।
साहित्य जीवनयापन का साधन नहीं है। साहित्य जीवनबोध का माध्यम है। माध्यम सिर्फ पहुंचने के लिए होता है। पकड़ने के लिए नहीं होता। पकड़ कर बैठ जाने के लिए तो कतई नहीं। माध्यम जिस तत्परता से पकड़ने में शोभित होता है, उससे अधिक उत्फुल्लता से छोड़ देने में सार्थक होता है। साहित्य, जीवन के विस्तार, जीवन की गहराई और उसकी पेचीदगियों का बोध कराता है। साहित्य कर्म नहीं है। कर्मों में व्याप्त प्रेरणा है।
साहित्य बंधन नहीं है। साहित्य मुक्ति भी नहीं है। मगर साहित्य मुक्ति की प्रेरणा अवश्य है। अवधारणाएं हमें बांधती हैं। हमारी भूख को उकसाती हैं। वे जीवन का मार्ग रोक कर हमें जीवन में प्रवेश नहीं करने देती हैं। साहित्य अवधारणाओं को भेदने की हमें दृष्टि देता है। वह हमें जीवन में प्रवेश का मार्ग देता है।
साहित्य समग्र संवेदना के सतत प्रवाह का वाचक है। साहित्य कोई ठहरी हुई चीज नहीं है। साहित्य केवल भाषा में नहीं है। वह भाषा से पहले भी है। भाषा के बाद भी है। स्मृति से भाषा में और भाषा से स्मृति में जो प्रवाहमान है, वह साहित्य है। इस प्रवाह में जो गति है, वही साहित्य का प्राण है। साहित्य प्राणवान सत्ता है। वह किताबों में बंधा नहीं है। बंद नहीं है। किताबों में सोए शब्द आंखों के छूते ही उछल कर आंखों में समा जाते हैं।
साहित्य जीवन का अंग नहीं है। अवयव नहीं है। उपकरण नहीं है। औजार नहीं है। वह जीवन से भिन्न नहीं है। अभिन्न है बिल्कुल। साहित्य जीवन का पर्याय है। नहीं, पर्याय उतना उपयुक्त नहीं है, साहित्य जीवन ही है।
साहित्य जीवन का बोझ उठाने के लिए नहीं है। वह तो जीवन का बोझ उतारने के लिए है। साहित्य जीवन को भारहीन बनाने के लिए है।
जीवन दूसरी चीज है। जीविका दूसरी चीज है। जीवनयापन के साधन जीवन के लिए हैं। जीवन, जीवनयापन के साधनों का अनुचर नहीं है। वह स्वामी है। हमारी परंपरा में साहित्य स्वामी है। अनुचर नहीं है। सेवक नहीं है। याचक नहीं है। अपनी परंपरा से, अपने मूल से विच्युत होने की अवधारणा से भ्रांत होने के कारण ही, हम साहित्य को जीवन से भिन्न समझने के अभ्यासी बनते जा रहे हैं।
इसी अवधारणा से ग्रस्त होने के कारण हमने साहित्य को ‘पार्ट टाइम काम’ मान लिया है।
साहित्य केवल लिखने की चीज नहीं है। केवल बोलने की चीज नहीं है। एक साहित्यकार जब केवल लिख रहा होता है, बोल रहा होता है, तभी साहित्यकार नहीं होता। इससे इतर भी, जब वह और कुछ भी कर रहा होता है, तब भी साहित्यकार होता है। ऐसा नहीं है कि कोई व्यक्ति घंटे दो घंटे, सुबह-दोपहर या शाम साहित्यकार रहे। बाकी समय कुछ और रहे। यह छूट साहित्य में नहीं है। यहां ‘पार्ट टाइम’ की सुविधा नहीं है। यह ‘फुल टाइम’ का अनुष्ठान है।
जीवनयापन के ढंग से नहीं, ढर्रे से साहित्य की उपस्थिति और अनुपस्थिति का निर्धारण हो सकता है। कबीर जीवनयापन के लिए सूत कातते थे। कपड़े बुनते थे। रैदास जूते गांठते थे। रहीम राज्य संभालते थे। सैन्य संचालन करते थे। इनके ढंग अलग-अलग थे, मगर ढर्रे बिल्कुल एक जैसे थे। अलग-अलग ढंग के कारण वे अलग तरह के कवि नहीं है। छोटे-बड़े कवि नहीं है। इसलिए कि उनके समूचे जीन में कविता व्याप्त है। उनकी प्राथमिकता कविता की प्राथमिकता है। सबसे पहले भी और सबसे बाद में भी वे कवि हैं। वे कवि होकर ही और कुछ भी हैं। कुछ और होकर कवि नहीं हैं। जो कवि है, हमेशा कवि है। नींद और स्वप्न में भी।
साहित्य का बुनियादी सवाल प्राथमिकता का सवाल है। और यही बस अकेला सवाल है। सबसे पहले नंबर पर किसी भी स्थिति और परिस्थिति में, जिसके लिए साहित्य है तो पहले नंबर पर है। नहीं तो फिर नहीं है। साहित्य नहीं है, वह जो पहले नंबर के बाद है। साहित्य का झांसा हो सकता है। लासा हो सकता है, कुछ फांसने का। मगर साहित्य नहीं हो सकता। नहीं, दूसरे नंबर पर साहित्य का विज्ञापन हो सकता है। साहित्य की दुकान हो सकती है। साहित्य का धंधा हो सकता है। साहित्य का तमाशा हो सकता है। साहित्य नहीं हो सकता।
साहित्य, खंड में समाहित होने वाली चीज नहीं है। वह अखंड बोध की अभिव्यक्ति है। जो बोध कभी खंडित नहीं होता, जो कभी टूटता नहीं है। जो कभी छूटता नहीं है, उसमें ही साहित्य व्यक्त होता है। साहित्य, संवेदना का स्वरूप है। जगह बदलने से बदल जाने वाली संवेदना में साहित्य जन्म नहीं ले सकता। साहित्य समर्पण में जनमता है।
साहित्य की मांग समर्पण की मांग है। वह और कुछ नहीं मांगता आदमी से। उसे बल नहीं चाहिए। बुद्धि नहीं चाहिए। अधिकार नहीं चाहिए। ऐश्वर्य नहीं चाहिए। वैभव नहीं चाहिए। विलास नहीं चाहिए। यह सब उसके काम की चीज नहीं है। उसे सिर्फ समर्पण चाहिए। अपने को पूरा-पूरा दे दीजिए। अपने को पूरा-पूरा देकर, उसे पूरा-पूरा पा लीजिए। आधा नहीं, अधूरा नहीं। पूरा-पूरा। वहां आधा देना, टुकड़ा देना, न देने के बराबर ही है। पूरे से कुछ भी कम देना, साहित्य के लिए बेमतलब है। व्यर्थ है। आपने जो भी दिया, अकारथ हो गया।
मगर हमारा स्वभाव बड़ा विचित्र है। हम कहीं भी जाते हैं, अवधारणा लेकर जाते हैं। साहित्य अवधारणा का क्षेत्र नहीं है। उसमें अवधारणा का प्रवेश ही नहीं है। वहां कोई भी सूत्र सही नहीं है। अपने में घटित हुए बिना किसी भी सूत्र का कोई मतलब नहीं है। अपने में कुछ भी घटित हुए बिना साहित्य का प्रगट होना संभव नहीं है।
एक दिन मैं अपने एक मित्र के यहां बैठा था। मेरे मित्र अधिकारी हैं। सज्जन हैं। सुशील हैं। कविता लिखते हैं। कहानी लिखते हैं। विचार करते हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं के संरक्षक हैं। कितनी ही साहित्यिक संस्थाओं के संचालक हैं। अच्छे-भले हैं। मेरे वहां होते ही उनके कुछ और मित्र वहीं आ गए। फिर उन्होंने आगंतुकों को मेरा परिचय दिया। मेरे परिचय में उन्होंने बताया कि मैं उनका साहित्यिक मित्र हूं।
मित्र के लिए साहित्यिक विशेषण मैं पचा नहीं पाया। हमारा जीवन खंडित जीवन है क्या? हमने अपने को टुकड़ों में बांट रखा है क्या? हम अपने को टुकड़े-टुकड़े में बांट सकते हैं, क्या?
मेरा मन उदास हो गया। अपने मित्र के प्रति भी और मित्र के साहित्य के प्रति भी। ०

 

 

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