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शिक्षा: कहां गए पुस्तकालय

किसी भी समाज के बौद्धिक विकास में शैक्षिक संस्थानों और पुस्तकालयों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन अफसोसनाक बात यही है कि समाज के विकास में पुस्तकालयों को आज समुचित स्थान नहीं मिल पा रहा है। आजादी के सत्तर साल बाद भी देश में आम जनता तक पुस्तकालयों की पहुंच नहीं बन […]

किसी भी समाज के बौद्धिक विकास में शैक्षिक संस्थानों और पुस्तकालयों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

किसी भी समाज के बौद्धिक विकास में शैक्षिक संस्थानों और पुस्तकालयों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन अफसोसनाक बात यही है कि समाज के विकास में पुस्तकालयों को आज समुचित स्थान नहीं मिल पा रहा है। आजादी के सत्तर साल बाद भी देश में आम जनता तक पुस्तकालयों की पहुंच नहीं बन पाई। उल्टे, हो यह रहा है कि जहां कही पुस्तकालय हैं, वे भी वे जर्जर हैं और बदइंतजामी के शिकार हैं। यों तो विभिन्न शैक्षिक समितियों में पुस्तकालयों की महत्ता के गुणगान किए गए हैं, लेकिन हकीकत यही है कि वह एक कोने और कमरों में सिमटा दिखाई देता है। जब भी किसी नगर का निर्माण किया जाता है तो स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन, बाजार आदि की योजना बनाई जाती है। लेकिन पुस्तकालय के लिए कोई जगह नहीं बनाई जाती। आधुनिक शहरों के वास्तुकार मॉल, फास्ट रेल, यातायात के साधन, वातानुकूलित शॉपिंग सेंटर के बारे में तो सोचते हैं, लेकिन ज्ञान-पुस्तकादि के चाहने वालों को दरकिनार कर दिया जाता है। महानगरों में तो पुस्तकालयों की स्थिति ठीक नहीं है।

कस्बों और द्वितीय श्रेणी के शहरों में पुस्तकालय की तलाश तो और भी कठिन काम है। दिल्ली जैसी जगह को भी पुस्तकालयों के मामले में कोई खास संपन्न नहीं कहा जा सकता। दिल्ली के लाला हरदयाल पब्लिक लाइब्रेरी में आठ हजार से भी ज्यादा अत्यंत पुरानी पांडुलिपियां हैं, लेकिन उनका रखरखाव कठिन होता जा रहा है। इस पुस्तकालय की खासियत है कि यहां अरबी, फारसी, संस्कृत आदि भाषाओं की अत्यंत पुरानी किताबें संरक्षित की गई हैं, लेकिन रख रखाव की कमी की वजह से उनकी हालत खस्ता है। देश के विभिन्न राज्यों में भी कुछ पुस्तकालय कभी खोले गए थे, लेकिन आज वे भी तबाही के कगार पर हैं। पहले राजा रजवाड़े भी अपने महलों में पुस्तकालयों, वाचनालयों आदि की व्यवस्था रखते थे। राजस्थान के कई इलाकों में आज भी प्राचीन पुस्तकालय हैं, लेकिन वहां भी महत्त्वपूर्ण पुरानी पांडुलिपियां धूल फांक रही हैं। अगर उन्हें नहीं बचाया गया तो वे सदा के लिए गायब हो जाएंगी। पटना में खुदाबक्श ओरिएंटल लाइब्रेरी के बारे में कहा जाता है कि वहां पर फारसी, अरबी, पाली, संस्कृत की दुर्लभ पांडुलिपियां हैं। लेकिन इस पुस्तकालय की हालत भी दयनीय है। कर्मचारियों के पद वर्षों से खाली हैं तो उन्हें भरने की कोशिश भी नहीं की जा रही है। खाली पदों की समस्या से लाला हरदयाल पुस्तकालय, कोलकाता का राष्टीय पुस्तकालय आदि भी जूझ रहे हैं। शैक्षिक संस्थानों में शिक्षकों के साथ ही पुस्तकालयों में कर्मचारियों की बेहद कमी है।

पूरे देश भर में पुस्तकालय विज्ञान में हर साल छात्र-छात्राएं स्नातक और परास्नातक, एमफिल और पीएचडी की उपाधि हासिल कर रहे हैं लेकिन वे कहां जा रहे हैं, इसका आंकड़ा कोई नहीं बता रहा। वे सरकारी पुस्तकालयों में तो कार्यरत नजर नहीं आते तो फिर वे कहां हैं? वे निजी शैक्षिक संस्थानों में कम वेतन पर शायद खप रहे हैं। उनकी पुस्तकालय विज्ञान में हासिल दक्षता और कौशल बेकार जा रहा है। पुस्तकालय विज्ञान के पितामह माने जाने वाले एसआर रंगनाथन ने आजादी के बाद पुस्तकालयों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने में अहम योगदान दिया था। रंगनाथन का वर्गीकरण सिद्धांत काफी चर्चित है। इन्होंने कहा था कि पुस्तकालय एक संवर्द्धनशील संस्थान है, हर किताब इस्तेमाल के लिए है और हर पाठक के लिए किताब उपलब्ध होनी चाहिए। पर आज न तो पाठकों के पास किताब पढ़ने की ललक बची है और न पुस्तकालय उपलब्ध हैं। जहां पुस्तकालय की सुविधा है वहां पाठक नहीं हैं और जहां पाठक हैं वहां पुस्तकें नहीं हैं।पुस्तकालय महज किताबों, पन्नों, ग्रंथों का घर ही नहीं होता। पुस्तकालय एक जीता जागता शिक्षण संस्थान होता है। लेकिन आज पाम टॉप, स्मार्ट फोन और विभिन्न गजट की वजह से भी पाठकीयता में कमी आई है। वैसे तो किताबें हजारों की संख्या में हर साल छप रही हैं। कई बार वे पुस्तकालयों तक पहुंच भी जाती हैं, लेकिन फिर भी पाठकों से उनकी दूरी बनी रहती है।

कोलकाता राष्ट्रीय पुस्तकालय मशहूर है। लेकिन इसकी पुरानी इमारत में अब नई किताबों को रखने की जगह ही नहीं है। पुस्तकालय विशेषज्ञ पीबी मंगला का मानना है कि देश और समाज पेपरलेस सोसायटी की ओर बढ़ रहा है लेकिन पेपर हमारी जिंदगी से इतनी जल्दी गायब नहीं हो सकता। किताबें तो रहेंगी ही बेशक उनके रूप बदल जाएं। यह देखने में भी आ रहा है कि आॅन लाइन किताबें खरीदने और पढ़ने वालों का वर्ग बढ़ रहा है। निश्चित ही आने वाले वर्षों में किताबें इलेक्ट्रानिक रूप लेंगी। किताबों का पुराना स्वरूप भी रहेगा, लेकिन तादाद जरूर कम हो जाएगी। पढ़ने और शिक्षित करने के लिए अभियान भी चलाना चाहिए। बिना पुस्तकालय को बचाए हम इसकी परिकल्पना भी नहीं कर सकते कि समाज में पढ़ने की परंपरा बनी रहे। पढ़ने की आदत को बचाए बगैर पुस्तकालयों को नहीं बचाया जा सकता। इससे भी बड़ी बात यह कि पुस्तकालय तो तब होंगे जब पढ़ने वाले बचेंगे। जहां तक पुस्तकालय के स्वरूप का मसला है कि तो ऐसे प्रावधान करने चाहिए कि एक ओर एक जगह पर पुरानी प्रकाशित किताबें रखी हों और दूसरी ओर इ-बुक्स भी मिल जाएं। पुस्तकालयों में भी इ-बुक्स को रखने की व्यवस्था करनी होगी। असल में पुस्तकालयों का खत्म होना विडंबनीय है। इसकी तकलीफ वही समझ सकते हैं जिन्हें किताबों से प्रेम है। ०

 

 

 

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