ताज़ा खबर
 

भाषा- कब तक होगी प्रतीक्षा

हम हिंदुस्तानी अच्छे से जानते हैं कि जितना सहज हम हिंदी या अपने देशी भाषा में होते हैं, उतनी अन्य किसी भाषा में नहीं।

केरल और महाराष्ट्र का देख लीजिए, ये लोग सम्मान के साथ और खुल कर अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं तो विकास के ग्राफ का स्तर ऊंचा रहता है।

हर साल हिंदी दिवस मनाया जाता है। कितनी सरकारें आर्इं और गर्इं मगर हिंदी को राजभाषा का दर्जा नहीं दिला पार्इं। कोई भी सरकार अब तक हिंदी को राजभाषा का दर्जा नहीं दिला पाई, इसका मतलब कि सरकारें चाहती ही नहीं कि हिंदी में कामकाज हो। हिंदुस्तान आजाद है, फिर भी अंग्रेजी की गुलामी कर रहा है। सरकारों को इसके लिए कौन मजबूर कर रहा है, यह भी सोचने वाली बात है। अंग्रेज चले गए मगर उनकी गुलामी करते-करते हमारा सरकारी तंत्र अभी तक अपनी भाषा में काम निपटाने में सक्षम नहीं हो पाया।
कारण जो भी हो, मगर नतीजा तो यही दिख रहा है कि अंग्रेज चले गए मगर अंग्रेजी आज भी हौव्वा बनी हुई है। जब देश गुलाम था तो भी मुट्ठी भर अंग्रेज यानी अंग्रेजी बोलने वाले इतने बड़े हिंदुस्तान पर शासन करते थे और अब भी करीब-करीब यही हो रहा है। आज के अभिभावक अपने बच्चों पर इस वजह से अंग्रेजी सीखने को अहमियत दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अच्छी नौकरी अंग्रेजी सीख कर ही पाई जा सकती है। वरना हम हिंदुस्तानी अच्छे से जानते हैं कि जितना सहज हम हिंदी या अपने देशी भाषा में होते हैं, उतनी अन्य किसी भाषा में नहीं।

यह भी सच कि भाषा कोई भी बुरी नहीं अगर लोग इसे स्वेच्छा से सीखना चाहें मगर हिंदुस्तानी को जिसने जन्म के साथ हिंदी या भारतीय भाषा में पला-बढ़ा है, उसे आगे चलकर कोई विदेशी भाषा दी जाए, तो अनुचित है। यह भरम फैलाया जा रहा है कि हिंदी बोलने वाले घट रहे हैं। असल में अखबार हो या किताबें, हिंदी में उनका प्रसार बढ़ रहा है। सोशल साइटों पर आज भी हिंदी में लिखने वाले लोग ज्यादा हैं, भले ही उनकी लिपि रोमन होती है। कुछ वर्षों पहले हुए राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण के अनुसार पांच अगुआ अखबारों में हिंदी का केवल एक समाचार पत्र हुआ करता था। मगर यही सर्वे जब (2010) में हुआ तो पता चला कि सबसे अधिक पढ़े जाने वाले पांच अखबारों में शुरू के चार हिंदी के हैं। यानी पहले भी हिंदी में बड़े लेखक पैदा हुए हैं जिन्होंने जनता को जाग्रत करने का काम किया और स्वतंत्रता आंदोलन को जगाए रखने में अपनी मुख्य भूमिका निभाई। आज भी विभिन्न हिंदी लेखक अपने-अपने क्षेत्र में मजबूत लेखन के जरिए जनता को अच्छी दिशा भी दिखा रहे हैं। हिंदी फिल्म उद्योग मनोरंजन के साथ-साथ दिशा दिखाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

हिंदी को किसी से खतरा नहीं है। हिंदी में तमाम पराई भाषा के शब्दों को अपनाया जा रहा है। इससे हिंदी को कोई नुकसान नहीं हो रहा। सब ठीक है, यह बदलाव भी ठीक है। मगर अपने ही देशवासी के ऊपर एक नई भाषा थोपना, जिसे आए वह खुद को खास समझे और जिसे न आए, वह हीनभावना से ग्रस्त हो जाए, किसी भी तरह उचित नहीं है। इसी से जुड़ी एक अन्य बात। वही देश अधिक प्रगति करता है जिसे अपनी संस्कृति और अपनी भाषा से प्यार होता है और प्यार दिखता भी है। अगर प्यार हमारे सरकार को अपनी भाषा हिंदी से है तो वह उसे राजभाषा बनाए और देशवासियों में ऐसा संदेश दे, जिससे जनता भी अपनी संस्कृति, अपनी भाषा के प्रति सम्मान प्रकट कर सके। यह दुखद है कि गोरे अंग्रेजों के चले जाने के बाद काले अंग्रेज अपना शासन चला रहे हैं। जो राष्ट्र अपनी जनता की आवाज न समझ सके, उसकी भाषा को न समझे, वह कतई गौरवशाली नहीं कहला सकता। राष्ट्र का गौरव उसकी जनता के साथ है, अगर सरकार जनता को ही महत्त्व न दे तो जनता हीनभावना से ग्रस्त हो जाएगी।

राज्यों में भी ऐसा है। जो राज्य अपनी भाषा को महत्त्व देता है, उसके विकसित होने की संभावना बढ़ती है। केरल और महाराष्ट्र का देख लीजिए, ये लोग सम्मान के साथ और खुल कर अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं तो विकास के ग्राफ का स्तर ऊंचा रहता है। कुल मिलाकर, प्रगति के लिए अपनी संस्कृति, अपने भाषा से प्यार होना, इसे देश में सम्मान मिलना बहुत जरूरी है। बहुत जरूरी है अपने भाषा के साथ जीवन जीने का माहौल मिलना, रोजगार मिलना ताकि जनता इसे सहज रूप से स्वीकार कर सके और सहजता के साथ जीवन जी सके।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 रंगकर्म- एक नाटक की यात्रा
2 स्मरण- अगले जमाने में कोई मीर भी था
3 कविताएं- प्रमाणपत्र. उम्र और दुख, गपशप, फल्टन