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भाषा: भाषा की कीमियागरी

आज से करीब दस-बारह लाख वर्ष पहले मनुष्य के पूर्वज, होमो-इरेक्टस और होमो-हैबिलस जन्म ले चुके थे।

Author January 15, 2017 2:38 AM
हिंदी ‘एकवचन’ नहीं, ‘बहुवचन’ है।

पवन माथुर

आज से करीब दस-बारह लाख वर्ष पहले मनुष्य के पूर्वज, होमो-इरेक्टस और होमो-हैबिलस जन्म ले चुके थे। उनके मस्तिष्क का आकार हमसे आधा ही था सात सौ सीसी के लगभग। उनके पास एक अविकसित वाणी तंत्र तो था, ‘भाषा’ नहीं थी। भाषा के लिए ‘शब्द’ चाहिए, शब्द के लिए स्वर और ‘स्वर’ के लिए एक विकसित वाणी तंत्र जो ध्वनियों के बड़े फलक को हमें उपलब्ध करा सकता है। इसी के साथ-साथ, नर्व-कोशिकाओं का समूह तंत्र जिनके माध्यम से मस्तिष्क, वाक् को निर्दिष्ट और नियंत्रित करने में समर्थ हो। ‘वाच्य’ का ध्वनि स्रोत हमें ‘कंठ-कक्ष’ (लैरिंक्स) से ही प्राप्त होता है। जब ‘कंठ-कक्ष’ में मौजूद वाक्-परतें (वोकल-फोल्ड्स) कंपित होती है- तब ध्वनि का एक स्थायी, लेकिन जटिल-पैटर्न प्राप्त होता है। इस ध्वनि की मुख्य आवृत्ति, ‘कंठ-कक्ष’ की परतों के प्रकंपन-दर पर आधारित होती है। जब ध्वनि का यह जटिल-आवृत्ति-पैटर्न, ‘कंठ-कक्ष’ के ऊपरी हिस्से में मौजूद ‘वाक्-तंत्र’ के वायु-मार्ग से गुजरता है-उस समय यह वायु-मार्ग, एक प्रकार की ‘ध्वनि-छननी’ (फिल्टर )की तरह कार्य करता है। ध्वनि की विभिन्न आवृत्तियों ( फ्रीक्वेंसीज) में से वह उन्हीं आवृत्तियों को जाने देता है जो ‘वाक्-तंत्र-पथ’ की प्राकृतिक ध्वनि-लिपियां होती हैं। अन्य ध्वनि-आवृत्तियों को वाक्-तंत्र की दीवारें सोख लेती हैं। जो प्राक्-ध्वनि-आवृत्तियां, ‘वाक्-तंत्र-पथ’ से छन कर हमारे होठों तक पहुंचती हैं- उन्हें हम ‘फौरमेंट’ कहते हैं।

एमआरआइ चित्रों से स्पष्ट हो चुका है कि मनुष्य में ‘कंठ-कक्ष’ गले से काफी नीचे स्थित है जिसके कारण हम अन्य स्तन-धारियों के मुकाबले कहीं अधिक बड़े फलक पर ‘फौरमेंट’ प्रकंपित करने में सक्षम हो जाते हैं। यह हमारी वाक् क्षमता के क्षेत्र का विस्तार ही नहीं कर देता, कंठ-कक्ष के नीचे होने के कारण हमारी जिह्वा क्षैतिज और ऊर्ध्व दिशा में भी घूम सकती है। जिसके कारण हम ‘ई’ और ‘ऊ’ जैसे स्वरों को जन्म दे पाते हैं। जिह्वा की सक्रियता के लिए ‘हाइपो-ग्लौस्ल-नर्व’, चाहिए जो जिह्वा की अंदरूनी और बाहरी मांसपेशियों को नियंत्रित करने के साथ-साथ क, ल, त, ट, ड, न, र, इत्यादि ध्वनियों के उत्पादन में भी सहायक होती है। अंगे्रजी के पांच स्वर स्वनिम ( वावेल फोनिम) 200 से 1200 (हटर््ज) की सीमित आवृत्ति वाले मुख्य ‘फौरमेंट’ पर आधारित हैं। ऐसे में क्या यह नतीजा निकालचना चाहिए कि हम प्राक्-ध्वनियों के पूर्व च्यनित भंडार की परिधि से शब्द रचने के लिए विवश हैं। मनुष्य के पूर्वज तथा अन्य-स्तनधारी, जटिल-बुनावट वाले ‘फौरमेंट’ उत्पन्न नहीं कर पाते, जो मनुष्य के ‘वाच्य’ की प्रमुख शर्तों में से एक है। इसलिए कंठ-कक्ष और ‘हाइपो-ग्लोसल कैनाल’ के विकास के साथ-साथ शायद कहीं अधिक ‘क्रांतिक’ (क्रिटिकल) है, मस्तिष्क में उस तंत्रिका-जाल का विकसित होना जो संकेत-संदेश का वाहक बनने के साथ-साथ ‘वाच्य’ को भी नियंत्रित करता है।

आखिर ‘भाषा’ को जन्म लेने में लाखों वर्ष क्यों लगे? लघु और बड़े मस्तिष्क वाले स्तनपायी जानवरों पर शोध कार्यों से मालूम चला है कि उनके वलकुट (कोर्टेक्स) में कई परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं। इस परिवर्तन के तीन मुख्य कारण संभव हैं: पटलीय-संरचना: जहां परत-दर-परत का कुंडलन, अंतर्वेधन का प्रारूप बदल देता है। बहु- केंद्रक -साहचर्य- जिसका क्षेत्रफल लगातार बढ़ता है। ऊतकों का घनत्व: यह घनत्व किसी ऐंद्रिय विशेष का कारण बनता है। चूहों में गंध-पहचान विशेषता है, चमगादड़ में श्रव्य-शक्ति, छछूंदर में कायिक-संवेदन और मनुष्य में दृष्टि-शक्ति का। यह परिवर्तन ऊतकों के घनत्व पर निर्भर है।
मनुष्य के पूर्वजों के क्रमिक विकास के दौरान मस्तिष्क के जिस भाग में सबसे अधिक परिवर्तन आया, वह है प्रमस्तिष्क-वलकुट (सेरिब्रेरल कारटैक्स)। यह भाग मस्तिष्क की लगभग दो-तिहाई से अधिक नर्व-कोशिकाओं को धारण करता है और फ्रंटल लोब, पेराइटल लोब, टैंपोरल लोब और आॅक्सिपोटल लोब में बंटा है। विकास के लाखों वर्षों के दौर में, परत-दर-परत कोशिकाएं, खंबों सी नियोजित होती गर्इं। कोशिकाओं के घनत्व, उनका आकार-प्रकट और भिन्नता, कोशिका खंबों की चैड़ाई निश्चित करने लगा। इस कारण न केवल मस्तिष्क का आयतन (वॉल्यूम) बढ़ा बल्कि उसके सतह का क्षेत्रफल भी बढ़ गया। तंत्रिका-वैज्ञानिकों के नए शोध से मालूम चला है कि प्रमष्तिक-वलकुट (सेरिब्रेरल कारटैक्स) की सतह, लाखों वर्षों के विकास के दौरान संवलित (कॉन्वोल्युटिड) यानी रस्सी की तरह बटती गई है। सतह की यह लगातार ऐंठन या संवलन पहले के पूर्वजों की अपेक्षा-बाद के पूर्वजों में बहुत तेजी से बढ़ा। वलकुट (कोरटेक्स) के घुमाव ने मस्तिष्क की सतह को एक नए स्थापत्य में परिवर्तित कर दिया। इसका यह नतीजा हुआ कि बाद के पूर्वजों में कोशिकाओं के अंतरसंबंध-संवाद लाखों गुना बढ़ते चले गए। विशेषत: यह प्रभाव मध्य-वलकुट (मीडियल-कारटैक्स) में अधिक हुआ, जहां ‘भाषा’ और उससे संबंधित उच्च-प्रत्यय बाहरी दृश्य-सूचनाओं से संश्लेषित होते हैं। इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष बीत गए। आज के शब्द की सबसे कच्ची छाप चालीस हजार वर्ष पूर्व ही मिलती है।

हैनरी नामक व्यक्ति मिर्गी से बुरी तरह पीड़ित था। उसकी इस गंभीर हालत के कारण चिकित्सक ने मस्तिष्क में मौजूद अश्वमीन (हिप्पो कैंपस) के दोनों छोरों को ध्वस्त कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि हैनरी की दुनिया से काल लुप्त हो गया। हर क्षण एक नया क्षण बन जाता। घंटे नहीं ‘मिनटों’ में पुरानी स्मृति भी गायब हो जाती। उसकी न्यूरोलोजिस्ट, जो घंटों उसके साथ रहती, उससे वह ऐसे मिलता मानो अजनबी से मिल रहा हो। एक दूसरे विवरण में भी यह पाया गया कि अगर किसी चैतन्य व्यक्ति के हिपोकैंपस को हल्की विद्युत-तरंग से उत्तेजित किया जाए तब स्मृति में खोए हुए पूरे के पूरे उपाख्यान चित्र सजीव हो उठते हैं और व्यक्ति अचानक विगत में स्थानांतरित हो जाता है।

इन शोधों से पता चला कि मस्तिष्क का एक अन्यत्र भाग है ‘हिप्पो कैंपस’ ,स्मृति का भंडारघर जहा स्मृतियां संजोई ही नहीं पुर्नजीवित भी की जा सकती हैं। मस्तिष्क में मौजूद अश्वमीन (हिप्पोकैंपस) तथा उससे संपृक्त, वलकुट-सतहों का आधारभूत कार्य, वलकुट(कोरटैक्स) के अलग-अलग हिस्सों में उपलब्ध सूचनाओं को तुरंत एकत्रित कर उनका साहचर्य करना ही है। असंबद्ध पड़ी सूचनाओं के इस सम्मिलन के कारण ही हमें स्मरण की शक्ति प्राप्त होती है। ‘हिप्पोकैंपस’ वलकुट तंत्र के उस संगम पर स्थित है जहां पर उप-वलकुटों के द्वारा सूचनाएं ‘एंटोराहनल’, ‘पेरी-राहनल’ और ‘पोस्ट-राहनल’ के माध्यम से प्राप्त होती हंै। इन तीनों का एकत्र, परा-हिप्पोकैंपस कहलाता है। शोधों से ज्ञात हुआ है कि पोस्ट-राहनल, वलकुट के उन क्षेत्रों से जानकारी प्राप्त करता है जो ‘स्थान’ की केंद्रीय सूचनाओं को प्रक्रमित करते हैं, जबकि ‘पेरी-राहनले वलकुट के उन क्षेत्रों से निवेश प्राप्त करता है जो हमें ‘आकृति की पहचान’ कराने में सक्षम होते हैं। इसलिए हिप्पोकैंपस, परा-हिप्पोकैंपस के माध्यम से हमें स्थानिक और आकृतिगत प्रत्ययों का ज्ञान होता है जो भाषा की उत्पत्ति की पीठिका के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

स्वर-जनित भाषा से जुड़े कार्यों के लिए वलकुट (कोरटैक्स) का पिछला व अंदरूनी हिस्सा कार्यरत रहता है। व्यवस्था, तार्किकता और समस्याओं को सुलझाने के लिए वलकुट का अगला भाग है ही (फ्रंटल-कोरटिकल – लोब)। दृश्य और स्थानिक कार्यों से जुड़ जाता है-मस्तिष्क का एक अन्य भाग-‘भित्तीय पालि’ (पेराइटल लोब)। यही नहीं, श्वेत और धूसर रंग वाले वाले मस्तिष्क के भीतरी पदार्थों का भी ‘मेधा’ और ‘भाषा’ में भरपूर योगदान है। श्वेत पदार्थ मस्तिष्क के दो- अर्धगोलार्द्धों के बीच संवाद स्थापित ही नहीं करता, सूचनाओं का आदान-प्रदान भी करता है। जबकि धूसर पदार्थ (ग्रे मैटर) इकट्ठा हो चुकी सूचनाओं के विश्लेषण में सहायक होता है। भाषा संबंधी विकार जिन मनुष्यों में अत्यधिक हो जाते हैं, उन्हें ‘अफेसिक’ कहा जाता है। यह विकार दो प्रकार के हैं वर्निक और ‘ब्रोका’, जो मरीज व्याकरण की नजर से शुद्ध वाक्य बनाने में तो सक्षम होते हैं, लेकिन उन वाक्यों में अर्थ-सार नहीं गढ़ पाते उन्हें ‘वर्निक’ मरीजों की श्रेणी में रखा जाता है। जबकि वे रोगी जो व्याकरण सम्मत वाक्य नहीं बना पाते, लेकिन उनके वाक्य अर्थ की दृष्टि से सार्थक होते हैं,- उन्हें ‘ब्रोका’ श्रेणी में रखा जाता है। यह जानकारी भी है कि ‘वाच्य’ के यह दोनों महत्त्वपूर्ण हिस्से एक दूसरे से महीन नर्व-रेशों के गट्ठर से जुड़े हुए हैं। अगर आप लिखित शब्द का वाचन करते हैं- तब सर्व प्रथम इसकी जानकारी ‘प्राथमिक-चाक्षुक-वलकुट’ से होती हुई, मस्तिष्क के पिछले अंदरूनी भाग, जिसमें ’वर्निक’ क्षेत्र भी सम्मिलित है, तक प्रेषित हो जाती है। यहां से यह सूचना ‘ब्रोका’ क्षेत्र में आती है और फिर यह ‘प्राथमिक-मोटर-वलकुट’ में स्थानांतरित होती है।

मोटर-वलकुट, कंठ-कक्ष, वाक्-तंत्र और जिह्वा और होठों को उद्दीप्त कर लिखित शब्द को स्वर दे देता है। शब्द को स्मृति से पुनर्प्राप्त करने और उसे एक पूर्वनिर्धारित प्रत्यय से जोड़ने का कार्य मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ा रहता है। क्रियाएं, सर्वनाम सजीव और निर्जीव वस्तुओं के स्मरण में भी भिन्न-भिन्न तंत्रिका-कोशिकाएं क्रियाशील होती हैं। जानी पहचानी क्रियाओं और अनजानी क्रियाओं के भूतकाल की निर्मिति अलग तंत्रिका-क्रिया-विधियों के सहारे होती है। मस्तिष्क में कोई एक संसाधित्र (प्रोसेसर) नहीं है। वह कई जगह विकेंद्रित है। इसलिए शब्द भी मस्तिष्क में विकेंद्रीकृत है।

सवाल है कि क्या ‘भाषा’ को हम गलती कर-कर के सीखते हैं-या हमारे मस्तिष्क में पहले से ही कोई ‘भाषा-का-अपूर्व’ विद्यमान रहता है जिसका जैविक आधार होता है? भाषा सीखने के संबंध में यह तथ्य तो सार्वजनीन है कि जब तक हमें शब्द, स्वर का ज्ञान बाहर से निवेश नहीं किया जाता, तब तक हम ‘भाषा’ सीख नहीं पाते। भाषा-सीखने की इस प्रक्रिया को अगर हम यौवनावस्था तक टाल देते हैं- तब हम किसी भी ‘स्वर-जनित भाषा’ को सीखने में असमर्थ हो जाते हैं। हमारा दृष्टि-तंत्र भी इसी प्रकार से कार्यरत है। एक शोध में बिल्ली के नवजात बच्चे की आंख पर काली पट्टी बांध दी गई। जब वह पट्टी आठ-हफ्ते के बाद हटाई गई तो उस बच्चे का दृष्टितंत्र पूरी तरह विकसित नहीं हो सका। स्पष्ट है कि ‘भाषा’ हो या ‘दृष्टि’, जन्म के बाद मस्तिष्क के उस तंत्र के पूर्णविकास के लिए बाह्य-क्रियाएं अत्यंत आवश्यक हैं। इन बाह्य-उद ्दीपकों के बिना, मस्तिष्क के भाषा-तंत्र के लिए जरूरी, नर्व-कोशिकाओं के मध्य ‘सूत्र-युग्मन-गांठ’ बनने की रासायनिक-प्रक्रियाएं अधूरी रह जाती हैं, जो मस्तिष्क के ’भाषा’ तंत्र’ के लिए जरूरी हैं। किसी पूर्व-निर्धारित जैविक-घड़ी के बीत जाने के बाद यह प्रक्रियाएं सुप्त हो जाती हैं-और हमारी ‘भाषा’ सीखने की क्षमता क्षतिग्रस्त हो जाती है। यह निष्कर्ष देना ठीक है कि जैविक प्रक्रियाएं भी ‘भाषा’ सीखने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

मानव मस्तिष्क में सौ-करोड़ से अधिक नर्व कोशिकाएं हैं। एक वर्ग-इंच में मौजूद इन कोशिकाओं को जोड़ने वाली महीन तांत्रिकाओं को अगर खोल दिया जाए तो वे दस हजार मील पहुंच जाएंगी। इन कोशिकाओं की भाषा एक क्षणिक-विद्युत-तरंग का विस्फोट होती हैं। आंख के सामने दिखाई देती आकृति का अक्स ज्यों का त्यों मस्तिष्क तक नहीं पहुंच जाता। आंख की ग्राही कोशिकाएं दीप्ति और अंधकार के ऐसे संयोजनों को ढूंढ़ती है- जिससे आकृति की कोर या परिसीमा का आकलन हो सके। दृश्य-जगत किसी एलबम की तसवीरों- सा हमारे मस्तिष्क की दराजों में रखा मिल नहीं जाता। वह दर्जनों प्रकार के नक्शों में तब्दील हो जाता है।

अगर एक नक्शा रंगों का है तो दूसरा खुशबुओं का, तीसरा रोशनी का, चौथा गति का…। इसीलिए मस्तिष्क में चोट से बहुत कुछ खो जाता है। ऐंद्रिय-जगत, कई बेहद जटिल रूपों में हमारे मस्तिष्क में अवस्थित है। अचरच की यह है कि कोई एक ‘जटिल-रूप’ दृश्य-जगत से अनुरूपता नहीं रखता। इसका तात्पर्य यही है कि किन्हीं जैविक प्रणालियों द्वारा मस्तिष्क-यथार्थ का पुनर्सृजन करता है- इस पुनर्सृजन की सीमाएं क्या हैं-? अर्थवान संयोजनों को गढ़ने के पीछे जो कोशिका विज्ञान है उस के पास भले ही निर्णायक उत्तर न हो – लेकिन यह निश्चित है कि हम जिस ‘भाषा’ का प्रयोग करते हैं- वह इसी पुनर्सृजन पर ही आधारित है। हम इस ‘जैविक-भाषा’ की परिधि और बाधाओं के बीच अपना रचना संसार रचने को बाध्य हैं। ०

 

 

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