ताज़ा खबर
 

क्या मुमकिन है कोहनूर की घर-वापसी

भारत लंबे अरसे से कोहनूर को ब्रिटेन से वापस लाने के लिए संभावनाएं तलाश कर रहा है। कई मंचों से भी इस बहुमूल्य विरासत की घर-वापसी की मांग उठ चुकी है। स्पष्ट हो चुका है कि कानूनी रूप से यह संभव नहीं है। फिलहाल कोहनूर जिस मुल्क में है यानी ब्रिटेन और भारत, ये दोनों […]

कोहीनूर को भारत वापस लाने की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भारत को कोहीनूर हीरे पर दावा नहीं करना चाहिए।

भारत लंबे अरसे से कोहनूर को ब्रिटेन से वापस लाने के लिए संभावनाएं तलाश कर रहा है। कई मंचों से भी इस बहुमूल्य विरासत की घर-वापसी की मांग उठ चुकी है। स्पष्ट हो चुका है कि कानूनी रूप से यह संभव नहीं है। फिलहाल कोहनूर जिस मुल्क में है यानी ब्रिटेन और भारत, ये दोनों देश यूनेस्को संधि से बंधे हुए हैं। ऐसी स्थिति में भारत कोहनूर के मामले में अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं जा सकता। लेकिन इसमें एक संभावना इसलिए बची हुई है क्योंकि कोहनूर को संधि से पहले ही भारत से ले जाया जा चुका था। कोहनूर की स्वदेश वापसी को लेकर देश के भीतर ही नहीं, विदेशों में कई बहसें और मांग हो चुकी हैं। 2015 में ब्रिटेन की आॅक्सफोर्ड यूनियन में एक वाद-विवाद का आयोजन किया गया, जिसका विषय था कि क्या ब्रिटेन को अपनी पूर्व औपनिवेशक काल की कॉलोनियों को हर्जाना देना चाहिए? इस बहस में ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी के पूर्व सांसद सर रिचर्ड ओट्टावे, ब्रिटिश इतिहासकार जॉन मकेंजी और भारतीय सांसद शशि थरूर ने हिस्सा लिया था। वहां शशि थरूर ने जो विचार सामने रखे थे, उनमें एक उल्लेखनीय टिप्पणी यह थी कि अंग्रेजों ने दो सौ साल तक भारत पर किए शासन के दौरान जो लूटपाट की, उसके एवज में आज ब्रिटेन को कुछ हर्जाना भरना चाहिए।

महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि वह कितना हजार्ना दे, बल्कि अगर प्रायश्चित के रूप में प्रतीकात्मक हर्जाना दे, तो भी शायद उससे संतुष्ट हुआ जा सकता है। थरूर का मत था कि इस प्रतीक के रूप में ब्रिटेन चाहे तो कोहनूर हीरा भारत को वापस लौटा सकता है। उस दौरान, ऐसी ही एक मांग सुप्रीम कोर्ट में अखिल भारतीय मानवाधिकार और सामाजिक न्याय मोर्चे की तरफ से याचिका के रूप में उठाई गई। इस पर अदालत ने सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा था। पर अब मूल सवाल यह है कि क्या भारत सरकार इस संबंध में नए सिरे से कोई प्रयास करेगी या फिर किसी भी सिद्धांत पर अमल करते हुए क्या ब्रिटेन कोहनूर हीरा हमें लौटाएगा? कोहनूर हीरे का मामला दो वजहों से दिलचस्प है। एक तो यह कि खुद भारत की तरफ से इस अनमोल रत्न की वापसी के पुरजोर प्रयास नहीं किए गए हैं और दूसरे यह कि इसकी मांग करने पर भी ब्रिटेन शायद ही कोहनूर लौटाने को कभी राजी हो। यह बात ब्रिटिश सरकार कई बार साफ तौर पर कह चुकी है। 2013 में, भारत दौरे पर आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने साफ कहा था कि उनका देश कोहनूर हीरा लौटाने नहीं जा रहा है।  भारत में जब कभी कोहनूर हीरा और सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति जैसे प्राचीन धरोहरों को लौटाने की मांग उठती है, ब्रिटेन उसे सिरे से खारिज कर देता है। इस बारे में ब्रिटेन अपने एक कानून का हवाला भी देता है जिसके तहत इन चीजों को भारत को नहीं लौटाया जा सकता। ब्रिटेन के फॉरेन एंड कॉमनवेल्थ आॅफिस के मुताबिक ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963 के अंतर्गत ब्रिटेन के नेशनल म्यूजियम को इन ऐतिहासिक और कीमती वस्तुओं को हटाने की अनुमति नहीं है। साथ ही, इस कानून को बदलने की ब्रिटिश सरकार की कोई योजना भी नहीं है। 2010 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई)के महनिदेशक गौतम सेनगुप्ता ने अपील की थी कि ये अनमोल धरोहरें भारत को लौटा दी जाएं।

ऐसी दुर्लभ धरोहरों को फिर से हासिल करने के लिए एएसआई ने उस दौरान यूनेस्को और अन्य देशों की मदद से एक अभियान भी शुरू करने की योजना बनाई थी। उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन में भारतीय मूल के सांसद कीथ वाज भी कई बार कोहनूर का मसला उठा चुके हैं। वैज ने कुछ साल पहले कहा था कि यह बहुत अच्छा रहेगा कि कोहनूर को उसी देश को लौटा दिया जाए, जहां से इसका ताल्लुक है। इसके अलावा ब्रिटेन में कुछ वर्ष पूर्व हाउस आॅफ कामंस ने गेराल्ड काफमैन की अध्यक्षता में यह तय करने के लिए एक समिति गठित की थी कि ब्रिटिश संग्रहालयों में दुनिया भर से लाई गई जो बहुमूल्य धरोहरें रखी हुई हैं, उनका मूल स्थान क्या है। यह समिति यूनान की इस मांग पर गठित की गई थी कि प्रख्यात एलगिन मार्बल्स उसे वापस किए जाएं क्योंकि उनका ताल्लुक यूनानी सभ्यता से है।ब्रिटेन के संग्रहालय उन देशों के अनमोल सांस्कृतिक विरासतों और धरोहरों से अटे पड़े हैं जिन पर कभी अंग्रेजी हुकूमत कायम थी। भारत की तरह ही मैक्सिको, पेरू, चीन, बोलविया, साइप्रस और ग्वाटेमाला आदि मुल्क भी अपनी धरोहरें ब्रिटेन से वापस पाना चाहते हैं लेकिन उन्हें भी कामयाबी नहीं मिली है।

इन वस्तुओं को हासिल करने के लिए ब्रिटेन ने भले ही लूट का सहारा न लिया हो लेकिन छल-कपट से इन बेशकीमती चीजों को अपने कब्जे में अवश्य किया है। अब वह उन पर अधिकार जताता है। उल्लेखनीय है कि जिस तरह ब्रिटेन इन वस्तुओं को नहीं लौटाने के संबंध में ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963 का हवाला देता है, उसी तरह भारतीय संविधान के अनुच्छेद-49 में यह व्यवस्था दी गई है कि यह हर राज्य और प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह देश की अमूल्य धरोहरों को नष्ट होने से बचाए और उन्हें वापस स्थापित करे। आज कोहनूर वापसी की मांग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक से उठ रही है। सभी देश यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बेशकीमती विरासत का संबंध उनके ही देश से है। पाकिस्तान की अदालत में भी यह मामला जोरशोर से चलता रहा है।

वै से भारत के लिए यह साबित करना कोई मुश्किल नहीं है कि कोहनूर हीरे का संबंध इसी देश से है। ग्याहरवीं शताब्दी में गोलकुंडा की खदानों से मिले 105.6 कैरेट के इस हीरे को जब आक्रमणकारी नादिरशाह ने रोशनी का पर्वत कहकर पुकारा था, तो दुनिया इसे देखने को लालायित हो उठी थी। इतिहास के अनुसार 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह बाबर ने इसकी कीमत का अंदाजा लगाते हुए कहा था कि इसके बदले इतनी दौलत मिल सकती है कि सारी दुनिया को ढाई दिन तक भोजन कराया जा सकता है। आधुनिक इतिहास में एक बार ओड़िशा सरकार ने दावा किया था कि कोहनूर हीरा भगवान जगन्नाथ की संपत्ति है, लिहाजा ब्रिटेन से लाकर यह उसे लौटाया जाए। ओड़िशा सरकार ने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखे एक पत्र का हवाला देते हुए बताया था कि 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के शुरूआती वर्षों में उत्तर भारत पर शासन करने वाले महाराजा रणजीत सिंह ने यह हीरा पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में चढ़ावे के रूप में अर्पित करने का आदेश दिया था। हालांकि उनके इस आदेश पर अमल नहीं किया गया और कोहनूर उनके बेटे दलीप सिंह के पास ही पड़ा रहा। अभिलेखागार में रखी एक माइक्रो फिल्म के मुताबिक ब्रिटिश सरकार के एक राजनीतिक एजेंट ने 2 जुलाई, 1829 को खैबर दर्रे के नजदीक मौजूद एक शिविर से भारत के कार्यवाहक सचिव टीए मेडोक को पत्र लिखा था जिसमें 1813 में अफगानी राजा शाहशुजा से छीने गए कोहनूर हीरे को रणजीत सिंह द्वारा भगवान जगन्नाथ मंदिर को सौंपने के आदेश का उल्लेख है।

बाद में, पंजाब ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना तो तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड डलहौजी ने कोहनूर पर कब्जा जमा लिया और इसे तोहफे के रूप में महारानी विक्टोरिया के पास लंदन भेज दिया। तीन जुलाई, 1850 को जब कोहनूर हीरा महारानी के पास पहुंचा, तो सबसे पहले उन्होंने उसे निहारा और उसे अपने राजमुकुट में अन्य हीरों के बीच स्थान दिया। इसके अगले 1851 में राजमुकुट में जड़े कोहनूर को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लंदन में रखा गया और फिर उसे ब्रिटेन के शाही खजाने के हिस्से के रूप में टॉवर आॅफ लंदन में रख दिया गया। तब से लेकर अब तक यह ब्रिटिश राजघराने के खजाने की शोभा बढ़ा रहा है आ जादी के तुरंत बाद 1947 में भारत सरकार ने कोहनूर को अपनी अनमोल विरासत बताते हुए ब्रिटेन से इसकी वापसी की मांग की थी। पाकिस्तान ने लाहौर दरबार के दस्तावेजों का हवाला देते हुए 1976 में इसकी मांग की थी। महारानी ने पाकिस्तान का दावा यह कहकर ठुकराया था कि उन्होंने यह हीरा लाहौर समझौते के तहत पाया है।  उल्लेखनीय है कि रणजीत सिंह की मृत्यु के दस साल बाद उनके उत्तराधिकारी दलीप सिंह (जो उम्र में बहुत छोटे थे) को अंग्रेजों ने लाहौर समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर दिया था। इस समझौते की एक शर्त के तहत ही कोहनूर महारानी विक्टोरिया को भेंट में मिला था। जहां तक भारत की बेशकीमती धरोहरों की स्वदेश वापसी का सवाल है, तो इसकी एक मिसाल 1991 में मिली थी। उस समय लंबी कानूनी लड़ाई के बाद प्रख्यात नटराज की मूर्ति ब्रिटेन से भारत को लौटाई गई थी।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App