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समाज-छरहरेपन की सनक

एक निजी प्रकाशक ने बारहवीं कक्षा के लिए हेल्थ ऐंड फिजीकल एजूकेशन से संबंधित पुस्तक में महिला के शरीर को 36-24-36 के मानकों पर सर्वश्रेष्ठ बयाया।

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एक निजी प्रकाशक ने बारहवीं कक्षा के लिए हेल्थ ऐंड फिजीकल एजूकेशन से संबंधित पुस्तक में महिला के शरीर को 36-24-36 के मानकों पर सर्वश्रेष्ठ बयाया। इस पुस्तक पर चर्चा में जोर-शोर से सोशल मीडिया कूद पड़ा। जैसा कि अक्सर होता है, सोशल मीडिया के क्रांतिकारी अक्सर क्रांति से भी आगे की बात करते हैं। मानव संसाधन मंत्रालय ने भी महिलाओं को इस तरह परिभाषित करने को लैंगिक भेदभाव के अंतर्गत माना और पुस्तक की भर्त्सना की। प्रकाशक ने भी कहा कि वह इस पुस्तक को वापस ले रहा है। अब प्रकाशक के खिलाफ मुकदमा भी हो गया है।  कहीं तो इस तरह के भेदभाव और महिलाओं को उनके शरीर के कारण परिभाषित करने की आलोचना हुई! वरना विज्ञापनों, फिल्मों, धारावाहिकों में आजकल कैसी महिलाएं नजर आती हैं! सबकी सब पतली दिखने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं। उन्हें वैसा ही बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

करीना कपूर जब जीरो फिगर बनाती हैं, तो सब उनकी वाहवाही करते हैं। प्रकारांतर से बताया जाता है कि मोटी लड़कियों की ग्लैमर वर्ल्ड में कोई जगह नहीं है। अगर है भी तो टुनटुन, गुड्डी मारुति की तरह, इसलिए कि उनके मोटापे पर हंसा जा सके और उनकी हरकतों को मूर्ख औरतों की हरकत बताया जा सके। पतली तन्वंगी औरत, स्मार्टनेस की पहचान है। विवाह से लेकर नौकरी के बाजार तक उसकी भारी मांग है। जबकि मोटी लड़कियां या औरतें सिर्फ हंसने की चीज हैं। टीवी, इंटरनेट, फिल्मों के प्रभाव में महानगर ही नहीं, छोटे शहरों और कस्बों तक की लड़कियां अपनी पसंदीदा हीरोइनों जैसी पतली दिखना चाहती हैं, जिनकी फिल्में लगातार हिट होती हैं, जिनकी खूबसूरती इसलिए है कि वे पतली हैं और इस पतले होने के कारण उनकी भारी मांग है। मीडिया भी रात-दिन इनके पतले होने के गुणगान में लगा रहता है। अच्छे फिगर का मतलब है पतला होना। अब पतला चाहे अपने स्वास्थ्य की कीमत पर ही हुआ जाए। पतला करने के तरह-तरह के नुस्खे मौजूद हैं। लड़कियों को हर हाल में इन्हें अपनाने और दुनिया की नजर में स्मार्ट बनने की सलाह दी जाती है। ऐसी छवियां समाज में बेहद लोकप्रिय बताई जाती हैं।  एक तरफ वे लोग हैं, जिन्हें दो वक्त का खाना नसीब नहीं, एक तरफ वे हैं जो आकर्षक दिखने के लिए सब कुछ होते हुए भी भूखे मर रहे हैं। लड़कियां भूखे रह कर एनोरोक्सिया नाम की बीमारी का शिकार होकर दम तोड़ रही हैं।

एक बार मशहूर अभिनेत्री रेखा ने कहा था कि अगर वे एक रोटी भी खाती हैं तो उनका वजन बढ़ने लगता है। यानी चाहे जितना कमाओ, भूखे रहकर हमेशा छरहरी दिखना है, प्रोडयूसर, डायरेक्टर और हीरो की नजर में बने रहना है। फिर दर्शकों की कामनाएं जगाने के लिए अगर अच्छा फिगर चाहिए तो भूखों मरना ही पड़ेगा। बहुत-सी स्त्रियां अपने आकर्षक दिखने की खूब तारीफ भी करती पाई जाती हैं। पतला माने सेक्सी। एक बार करिश्मा कपूर ने कहा था कि अगर लोग उन्हें सेक्सी कहते हैं तो उन्हें बहुत गर्व होता है। पतली और सेक्सी दिखने-कहलाए जाने की यह सौगात फिल्मी दुनिया से होते हुए साधारण लड़की तक भी जा पहुंची है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों, कस्बों, गांवों तक में लड़कियों की बुद्धिमानी को कोई नहीं पूछता, वे कैसी दिखती हैं इसी पर जोर अधिक है। अफसोस कि इन छवियों का कोई पुख्ता विरोध होता नजर नहीं आता। जितनी सौंदर्य प्रतियोगिताएं होती हैं क्या मानवसंसाधन मंत्रालय ने उनके मानकों पर गौर किया है। क्या किसी मोटी लड़की तो दूर, गठीले बदन वाली लड़की को भी आज तक किसी ने मिस इंडिया, मिस वर्ल्ड या मिस यूनीवर्स बनते देखा है। इन प्रतियोगिताओं की सच्चाई जाननी हो तो इरा त्रिवेदी की किताब- इस ताज के हीरे चुभते हैं- को पढ़ा जा सकता है। मोटी लड़कियों और महिलाओं को किस घटिया नजर से देखा जाता है।  एक किताब तो आपकी नजर में आ गई। प्रकाशक ने उसे बाजार से हटा भी लिया, मगर युवाओं के मन में फिल्मी दुनिया या विज्ञापनों और धारावाहिकों की दुनिया लड़कियों की जो छवि बनाती है, उसे मजबूत करती है, उसे कैसे रोकेंगे। ये छवियां तो रात-दिन हमारे मन में छाई रहती हैं। क्या ग्लैमर वर्ल्ड में औरतों की ऐसी छवि को पेश करना जायज है। क्या ये लैंगिक भेदभाव से परे हैं। सोनाक्षी सिन्हा और सोनम कपूर ने एक बार कहा था कि फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले वे तो नब्बे किलो की थीं। इतने वजन के साथ फिल्मों में उन्हें कौन काम देता। परिणीति चोपड़ा ने अभी अपना वजन बहुत घटाया है और उनके इंटरव्यू कुछ इस तरह छापे जा रहे हैं कि अब उन्हें काम मिलना बहुत आसान होगा।
अभिनय के लिए अभिनय प्रतिभा नहीं, छत्तीस चौबीस छत्तीस से भी आगे का फिगर चाहिए। मजेदार है कि औरतों पर तो इस तरह कामुक दिखने की छवि हावी कर दी जाती है, मगर पुरुषों पर ऐसा शायद ही कोई मानक लागू होता हो। सोशल मीडिया के वीर इन बातों पर आखिर क्यों चुप रहते हैं। या कि यह मान लिया गया है कि ग्लैमर की दुनिया के लिए सब जायज है और किताब के लिए ही सब कुछ गलत है। आखिर इस लैंगिक भेदभाव को कैसे रोका जाएगा।

सच तो यह है कि स्त्रियों के इस तरह के शरीर को दिखाने और बनाने में तरह-तरह के व्यापार भी जुड़े हैं। तमाम तरह के पार्लर, ब्यूटी इंडस्ट्री, हैल्थ, प्रसाधन व्यवसाय यहां तक कि चिकित्सा जगत के कुछ हिस्से भी सब एकमएक हैं। प्रियंका चोपड़ा के बारे में कुछ दिन पहले बताया गया था कि वे एक लाख रुपए महीने के सौंदर्य प्रसाधन इस्तेमाल करती हैं। हालांकि यह रकम इससे कहीं ज्यादा ही होगी। फिल्म वाले तो करोड़ों में कमाते हैं। अगर वे सौंदर्य पर खर्च न करें, तो कमाएं कैसे। मगर आम लड़की के लिए वे क्योंकर रोल मॉडल बना दिए गए हैं, यह सोचने की बात है। न केवल रोल मॉडल, उन्हें स्त्री सशक्तीकरण का प्रतीक भी बना दिया गया है।  रोकना हो तो फ्रांस की तरह कानून बनाइए, जहां कुछ साल पहले विज्ञापनों आदि में स्किनी मॉडल्स के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। वहां पतली-दुबली मॉडल्स को प्रमोट करने वालों को भी भारी जुर्माना देना होगा।  वहां माडल्स को अपने बाडी मास इंडेक्स का सर्टिफिकेट देना होगा। उनका वजन भी लिया जाया करेगा। अगर इसमें चूक हुई तो पचहत्तर हजार यूरो का जुर्माना भरना होगा और छह महीने की जेल भी होगी। उन लोगों पर भी भारी जुर्माना लगेगा, जो बहुत अधिक पतले होने को आदर्श मानते हैं। पतले होने की वकालत करने वाली वेबसाइटों को न केवल रोका जाएगा, बल्कि दंडित भी किया जाएगा। फ्रांस में अट्ठाइस साल की मॉडल इसाबेल कारो की भूख से होने वाली बीमारी एनोरोक्सिया से मृत्यु के बाद फ्रांस में इस तरह की बहस चली और वहां कानून बनाया गया। अपने यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं है। जबकि अपने यहां भी एक लड़की की पतला होने की चाह में जान जा चुकी है। हां, एक बेचारा प्रकाशक और लेखक मिल गया, जिसे बलि का बकरा बनाना आसान था। ०

 

 

 

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