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हिंदी के नए अंदाज

हिंदी करोड़ों लोगों की भाषा होने के बावजूद देश में राजभाषा होने को भले ही तरस रही है, लेकिन इसकी व्यापकता और संप्रेषणीयता ने इसे जन-जन की भाषा बना रखा है। बदलती तकनीक के साथ हिंदी कितना तालमेल बिठा पा रही है और क्या है इसका स्वरूप। अगल-अलग क्षेत्रों में इसकी स्थिति कैसी है? इसकी पड़ताल कर रहे हैं सुधीश पचौरी।

Author December 18, 2016 12:03 AM
हिंदी ‘एकवचन’ नहीं, ‘बहुवचन’ है।

हिंदी ‘एकवचन’ नहीं, ‘बहुवचन’ है। हम हिंदी में नहीं हिंदियों में रहते हैं। कहीं अवधी के टच वाली कहीं भोजपुरी के स्टाइल वाली, कहीं पहाड़ी विनम्रता लिए तो कहींं पश्चिमी उत्तर प्रदेशवाली खड़ी कड़क, कहीं ब्रज का टच लिए मीठी मीठी तो कहीं पंजाबी टच वाली हिंदी, कहीं तमिलिंदी तो कहीं मलयालिंदी, कहीं मराठींदी तो कहीं गुजरिंदी, कहीं राजस्थानी हिंदी तो कहीं मालवींदी, कहीं बुदेलखंडी हिंदी तो कहीं हिंदी विभागों की परिनिष्ठित हिंदी, कहीं हिंदी अखबारों की हिंगलिश-विंगलिश तो कहीं अंग्रेजी अखबारों में रोमनी हिंदी, कहीं हिंदी अखबारों में अंगे्रजी के साथ डांस करती हिंदी, कहीं विज्ञापनों की दनदनाती मिक्स हिंदी, कहीं एफऐमों की सर्राटे-फर्राटेदार हिंग्रेजी, कहीं मोबाइल की मेसेजिंग वाली शार्टकट वाली रोमनी-नागरी हिंग्रेजी, कहींं कहीं फेसबुक वाली हिंदी, कहीं ट्विटर वाली हिंदी, कहीं हिंदी अखबारों की हिंदी-हिंग्रेजी ,कहीं आरजे सिमरन की हिंदी तो कहीं आरजे गिन्नी की हिंदी, कहींं आदी की हिंदी तो कहीं खुरकी की हिंदी, कहीं राजदीप की हिंदी तो कहींं भूपेंद्र चौबे की हिंदी कहींं बरखा की हिंदी तो कहीं अर्णब की हिंदी, कहीं दिबांग की हिंदी तो कहीं रामदेव की हिंदी, कहींं लिटफेस्टों की हिंग्रेजी तो कहीं जावेद अख्तर की हिंदी, कहीं ‘बाअदब बामुलाहिजा’ करती हिंदी तो कहीं प्रणाम को ‘पिरनाम’ कहती हुई हिंदी, कहीं नमस्कार को नमस्कारम् करने वाली संस्कृतीकृत हिंदी तो कहीं कहीं मेट्रो वाली हिंदी हाय हलो वाली हिंदी कहीं ‘अगला स्टेशन मयूर विहार-एक है, दरवाजे बार्इं ओर खुलेंगे, सावधानी से उतरें’ मेट्रो रेल वाली हिंदी। कहीं ‘सावधनी हटी और दुर्घटना घटी’ वाली हिंदी, कहींं डीटीसी के कंडक्टरों- ड्राइवरों की कड़क हरियाणी हिंदी, कहीं ‘जो नमस्कार दे सकता है वो मुष्टि प्रहार नहीं’ वाली पुलिसिया हिंदी, कहीं बाबा रामदेव के विज्ञापनों की हिंदी कि ‘अपने बालों से कहो जुग जुग जियो’, कहीं ‘लडकी ब्यूटी फुल्ल कर गई चुल्ल’ वाली ‘बादशाह’ के गानों की हिंदी, कहीं ‘ठंडा मतलब कोकाकोला’ की हिंदी, कहींं दुकानों पर लिखी ‘टू के बदले फोर’ सेल वाली हिंदी, कहीं नुक्ता हटाकर उर्दू को अपने में समो लेने वाली हिंदी, कहीं एफएम गोल्ड की हिंदी तो कहीं बिग एफएम की हिंदी तो कहीं रेडमिरची की हिंदी। कहीं जीटीवी के सीरियलों की हिंदी तो कहींं स्टारप्लस की हिंदी, तो कहीं डीजे वीजे आरजे वाली की हिंदी, कहीं संसदीय हिंदी कहींं असंसदीय हिंदी।

कहीं केजरीवाली हिंदी तो कहीं ममता बनर्जी की बंगींदी तो कहीं बहन मायावती की हिंदी, कहीं मोदी की हिंदी तो कहींं वैंकैयानायडू की हिंदी कहींं सोनिया की हिंदी तो कहींं राहुल की हिंदी, कहीं चिदंबरम की ‘खोदा पहाड़ निकली चुइया’ वाली हिंदी, कहीं रणदीप सुरजेवाला की साफ-सुथरी ठहरी हुई हिंदी, कहींं मुलायम की ब्रजिंदी कहींं अखिलेश की लखनवी हिंदी, कहीं साहित्यकारों की हिंदी, कहीं रिक्शे वालों की हिंदी, कहीं ढाबे वालों की हिंदी तो कहीं चाय वालों की हिंदी, कहीं टीवी चैनलों में चर्चाकारों की हिंदी, कहीं वकीलों की हिंदी, कहीं डॉक्टरों की हिंदी तो कहीं केमिस्टों की हिंदी, कहींं बैकों की हिंदी तो कहीं ट्रैफिक पुलिस की हिंदी, कहीं मोबाइलों में चैट करती हिंदी, कहीं इंटरनेट पर लिखी बोली जाती हिंदी, कहीं ग्रामीणों की हिंदी, कहीं बैकों की लाइन में लगे लोगों की हिंदी,कहीं एटीएम से आगे लगे लोगों की हिंदी,कहीं चैनलों के रिपोर्टरों की हिंदी…। आप गिनाते जाइए और महसूस करते जाइए कि एक ही वक्त में आप हजार तरह की हिंदियों से दो चार होते हैं। एक हिंदी होती तो वह खांचे में फिक्स्ड होती। उसका व्याकरण बनता। वह उसकी जकड़बंदी करता और वह उसके अंदर बंधकर कर कब की मर चुकी होती! लेकिन हिंदी बनी ही व्याकरण को फेल करके। वह व्याकरण से बंधकर कभी नहीं चली। जब जब किसी ने व्याकरण बनाया तब तब उसने उससे इनकार किया। अनुशासन के बाहर बनती हुई वह चलती रही, बनती रही, बदलती रही और व्याकरण उसके लिए एक सिर्फ एक आइडिया की तरह बना-अधबना रहा आया।

यों हिंदी में एक व्याकरण सा कुछ है लेकिन वह एकदम न्यूनतम है जो सीबीएसई की छठी कक्षा से आठवी दसवीं कक्षा तक की किताबों में पढ़ाया जाता रहता है। उसी के आधार पर विद्यार्थियों को नंबर मिला करते हैं मगर हिंदी बोलने-बरतने वाले उससे बंधकर नहीं रहते। हिंदी बोलने और सुनने से सीखी जाती है, किसी ‘अष्टाध्यायी’ या ‘लघुसिद्धांत कौमुदी’ से नहीं सीखी जाती। हिंदी एक विराट व्यवहार है!जो भाषाएं व्याकरण के खूंटे से बंधी रहीं, जो शुद्धतावाद की कायल रहीं, वे मारी गर्इं और क्लासिक बनी रह गर्इं, लेकिन हिंदी मिलावट और अशुद्धता की कायल रही और वह जिंदा रह गई। उसका अशुद्ध रहना ही उसकी शुद्धता है। उसका स्टैंडर्ड है। उसका मानक है। उसकी इम्युनिटी है। उसकी अमरता है। वह एक ही वक्त में भाषा और बोली दोनों है। आज की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली इस भाषा का अपना नया शोर है। जितना शोर है उतना ही उसका जोर है। इसीलिए वह हर कहींं ‘वंस मोर’ है! बहुत सी भाषाओं की यात्रा जनता से शास्त्र तक यानी व्याकरण तक हुई है और वे शुद्धतावाद के खूंटे से बंधे हुए ही मर गई हैं। हिंदी अकेली ऐसी भाषा है जो व्याकरण की जगह अपनी जनता के खंूटे से बंधी है और एक न्यूनतम कामचलाऊ व्याकरण से उसका काम चल जाता है, उसके बाद वह आजाद हो जाती है और इस तरह दुनिया के वैयाकरणों को चकित करती रहती है।

अपने ‘हाइपर-रीयल’ (अत्यंत चंचल) स्वभाव में वह अनिर्वचनीय और अपरिभाषेय सी बन चली है। वह ‘बियोंड ग्रमर’ है। जब तक वह ठहरती नहीं तब तक पकड़ में आती नहीं। और मिजाज से वह स्वयं भी लक्ष्मी जी की तरह ही ‘चंचला’ है। इसीलिए सब उसे चाहते हैं। यही उसका ‘चंचलित स्वभाव’ (हाइपररीयल नेचर) है कि वह न ‘एकमुखी’ है, और न ‘एक कानवाली’ है। वह अनंतमुखी अनंत कानवाली, विविध, ‘जनक्षेत्रा’ (पब्लिक स्फीयर्स) वाली है। इन ‘हिंदियों’ या इनसे मिलकर बनने वाली इस ‘हिंदी’ को कोई एक दो लेखक या पंडित नहीं बना रहे बल्कि उसे ये चार बडेÞ तत्त्व बना और बदल रहे हैं: मीडिया,मनोरंजन उद्योग और राजनीति और हिंदी शिक्षण संस्थान! पहले दोनों तत्त्व एक दूसरे में मिले हुए हैं। इनके अंतर्गत प्रिंट, रेडियो, टीवी, फिल्में, सोशल मीडिया, मोबाइल, मार्केट, विज्ञापन, कंज्यूमरिज्म, म्यूजिक इंडस्ट्री और तमाम तरह की पापुलर कल्चर इंडस्ट्री आदि बहुत सी चीजें शामिल हैं। इनके पीछे बहुत बड़ी पूंजी का बल सक्रिय है। इनके साथ चौबीस बाई सात की राजनीति भी हिंदी को बनाने में बड़ा रोल अदा करती हैं क्योंकि हिंदी जनता सबसे बड़ी वोट बैंक है। इनके अलावा स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग,राष्ट्रभाषा अधिनियम के तहत कार्यरत हिंदी अधिकारी और हिंदी संस्थान आदि भी एक तरह की हिंदी बनाते रहते हैं।
इनमें से किसकी हिंदी गलत है, किसकी सही है या कि कौन सी गलत और कौन सी सही है? ऐसे सवाल एकदम बेतुके हैं। एक मानी में सभी हिंदियां करेक्ट हिंदियां हैं। इन सबसे मिलकर एक बड़ी हिंदी भी बनती है जो अखबारों में चैनलों में रेडियो में लिखी कही सुनी जाती है जो किताबों में लिखी आती है, जो बाजार से लेकर घरों तक में बोली बरती जाती है। अगर वह कम्युनिकेट कर रही है या उसके जरिए अधिकतम लोग कम्युनिकेट कर रहे हैं तो समझिए वह एक सही हिंदी है और जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को कम्युनिकेट कर सके वही असली है। बिना मान्य व्याकरण के भी वही व्याकरणसम्मत है क्योंकि हर भाषा ‘अधिकतम कम्युनिकेशन’ के निहित-व्याकरण से काम करती है जो हर भाषा में होता है। उसे अलग से बनाएं न बनाएं, भाषा की संप्रेषण क्षमता ही उसका असली व्याकरण होती है! इसी प्रक्रिया में वह अपना स्तरीकरण भी करती चलती है। ऐसा स्तरीकरण संभव भी है।

उदाहरण के लिए हिंदी के अनेक विद्यार्थी भी ‘विद्यार्थी’ या ‘विद्यालय’ शब्द को ‘विधर्थी’ या ‘विधलय’ लिखते हैं, कई ‘हैं’ की जगह ‘है’ या ‘हे’ या ‘हें’ लिखकर या तो एक मात्रा खा जाते हैं या आनुनासिक या अनुस्वार की नासिका ही तोड़ देते हैं। कई भोजपुरी के प्रभाव के कारण वाक्य में कर्ताकारक ‘ने’ को ही खा जाते हैं कई फिल्मों में मराठी प्रभाव के कारण ‘मैं मेरे घर गया’ कह-लिखकर ठेठ हिंदी के ‘मैं अपने घर गया’ को भूल जाते हैं। कई ‘एवं’ ‘और’ ‘तथा’ में फर्क नहीं कर पाते, कई ‘किंतु’ को ‘किंतू’ लिखते हैं और ‘पंरतु’ को ‘प्रंतू’ या ‘परंतू’ बोलते लिखते हैं। ‘नहीं’ कहीं कहीं ‘नहि’ या नहिं बना दिया जाता है और बेचारी ‘कि’ को ‘की’ बना दिया जाता है। हस्तलिखित उत्तर पुस्तिकाओं में हिंदी में वर्तनी संबंधी गड़बड़ियों के ऐसे अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं। इसी तरह वाक्य में पूर्ण विराम कहां लगे, कहां अल्पविराम लगे, कहां अर्द्धविराम लगे, कहां कोलन लगे, कहां डैश लगे कहां आॅब्लीक लगे कहां विस्मयादिबोधक चिह्न लगे इनमें बहुत भ्रम है। वाक्य में ‘हैशटैग’ लगे या ‘एट द रेट’ बताने वाला निशान लगे, कि न लगे, इसकी कोई मान्य व्यवस्था नहीं है जबकि ये प्रयुक्त होने लगे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण खोजे जासकते हैं और इनको कुशलता से हतोत्साहित किया जा सकता है। यह काम हिंदी के प्रायमरी से लेकर एमए तक के हिंदी मास्टरों का है, प्रिंट के कापी एडीटरों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में कापी लिखने वालों का है कि वे इन मामूली चूकों पर ध्यान दें। भाषा के स्तरीकरण का पहला चरण भाषा का संपादन होता है। अगर बचपन में ही ठीक करने कराने की आदत पड़ जाए तो लिखित हिंदी में ऐसी गलतियां कम हों और हिंदी का न्यूनतम मानकीकरण भी हो जाए!लेकिन हिंदी करे तो क्या करे? उसके नित्य बढ़ते बदलते विराट् जनक्षेत्रा में वर्तनी और उच्चारण की गड़बड़ियां चलती रहनी हैं। जब हर दिन नए-नए इलाकों से हिंदी बोलने बरतने वाले आएंगे तब बोलने बरतने के बीच इसी तरह की गलतियां चलती रहेंगी। लेकिन ये गलतियां भाषा के विकास की निशानी ही हैं। इन्हीं के चलते इतनी तरह की ‘हिंदियां’ संभव हो रही हैं।ल हिंदी ‘अधिकतम संपे्रषण’ के काम में लगी है। वह ‘न्यूनतम व्याकरण’ से ‘अधिकतम संप्रेषण’ करते हए ‘अधिकतम शब्दकोश’ बना रही है। रोजाना के काम काज में आने वाले अनेक अंग्रेजी शब्द हिंदी में जुड़ते जा रहे हैं-कैशलैस, लैसकैश, डिजिटल, आन लाइन, एटीएम, पेटीएम मोबीक्विक, इ-बटुआ, डिमोनिटाइजेशन, आरबीआई, जनधन अकांउट, बैंलेंस, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअपइंडिया, टूजी, थ्रीजी, एसबीआई, न्यू-नार्मल जैसे शब्द तो पिछले एक महीने में हिंदी में घुस गए हैं।

बहरहाल, हिंदी का एजंडा संवाद, संचार और संपे्रषण ही है, उसका एक प्रकार का अनिश्चित मानकीकरण भी होता जा रहा है। कई लोग मानते हैं कि वह उच्चतर शिक्षा का माध्यम नहीं बन पाई है न उस तरह से ज्ञान-सक्षम ही हो पाई जिस तरह का ज्ञान पश्चिम बनाता रहता है। कहने की जरूरत नहीं कि अंग्रेजी दिमाग और अंग्रेजी मीडिया इसी तरह से सोचते हैं। ऐसे देसी अंग्रेजों की इस प्रकार की समझ शुद्ध ‘उत्तर-औपनिवेशिक’ (पोस्ट-कॉलोनियल) समझ है। जरा सोचिए: जमीनी राजनीति की भाषा हिंदी है। राजनीति उसी में दिनरात रमती है। अंग्रेजी पत्रकारों तक को हिंदी सीख चुनावी विश्लेषण करने होते हैं। हिंदी राजनीति गढ़ती है तब जाकर विशेषज्ञ राजनीतिक सिद्धांतों को गढ़ पाते हैं। राजनीति बनाए हिंदी और गढें अंग्रेजी वाले! जब कभी देसी अंग्रेज हिंदी समाज को समझने में अटक जाते हैं हिंदी से ही काम चलाते हैं। और इन दिनों तो हालात ये है कि अंग्रेजी के जाने माने पत्रकार तक हिंदी अखबारों में अनूदित होकर और छपकर ही अपने को धन्य समझते हैं। अगर हिंदी आपकी अंग्रेजी के ‘स्तरीय ज्ञान निर्माण’ में इतनी ही ‘अक्षम’ है तो हिंदी पाठक आपको समझेगा कैसे सर जी! काहे हिंदी में आने को ललचते रहते हैं! कृपा कर हिंदी को उसके हाल में मस्त रहने दीजिए । आपके बिना भी वह जिंदा है और अपनी कथित ‘अक्षमता’ में भी आपको ललचाने की ‘क्षमता’ रखती है! यकीन करें जनाब कि एक दिन यह सब भी हिंदी में होने लगेगा। तब आपकी ये अंग्रेजी दुकान बंद हो जाएगी! कुछ हिंदी वाले भी ऐसा मानते हैं कि हिंदी में ज्ञान की सामग्री नहीं बनती! यह कुछ हिंदी विद्वानों की अपनी ही अक्षमता का स्वीकार है। उनको हार्वर्ड-आक्सफोर्ड का तैयार माल ऐसे में ‘मेक इन हिंदी’ करने की क्या जरूरत है? खुद हिंदी में बनाते नहीं और कहते हैं कि हिंदी में बनता नहीं। आप बनाओगे तो बनेगा! इसमें हिंदी का क्या दोष? दोष है तो हम सब का!
ऐसी ही निराली है हमारी हिंदी यानी हिंदियां! ०

 

 

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