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जो स्वस्थ है, वह मस्त है

सदाबहार यौवन के लिए आखिर कौन नहीं लालायित होगा? बुढ़ापा दूर भगाने के लिए लोग जाने कैसे-कैसे जतन करते हैं, पर नासपीटा बुढ़ापा है कि आकर ही दम लेता है।

Author April 30, 2017 5:24 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Source: Agencies)

सदाबहार यौवन के लिए आखिर कौन नहीं लालायित होगा? बुढ़ापा दूर भगाने के लिए लोग जाने कैसे-कैसे जतन करते हैं, पर नासपीटा बुढ़ापा है कि आकर ही दम लेता है। यह कहावत यों ही नहीं बन गई कि ‘जवानी जाकर आती नहीं, बुढ़ापा आकर जाता नहीं।’ बहरहाल, बुढ़ापे को रोकना भले ही असंभव हो, पर उसे कुछ दूर तो धकेला ही जा सकता है। ऐसे उपाय हैं कि बुढ़ापे में घिसट-घिसटकर मौत का इंतजार करते हुए जीने के बजाय नौजवानों की तरह चुस्त-दुरुस्त रहा जा सके। सदाबहार यौवन के लिए योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और एक्यूप्रेशर की दृष्टि कुछ उपाय बड़े काम के हो सकते हैं। सबसे पहले अपनी दिनचर्या का पुनरावलोकन करना चाहिए। अगर किसी की रात में ड्यूटी करने की मजबूरी न हो तो रात दस-ग्यारह बजे तक सो जाने और चार-पांच बजे तक उठ जाने की आदत बनानी चाहिए। रात में ड्यूटी निभाने वाले लोग भी आनुपातिक दृष्टिकोण अपना कर अपनी दिनचर्या व्यवस्थित कर सकते हैं।

हमारी सेहत का नाश मारने में सबसे बड़ी भूमिका हमारे आहार की है। शरीर को जिन चीजों की जरूरत है उनकी सुलभता के बावजूद आदमी आज फैशन के चक्कर में अपना जायका इतना बिगाड़ चुका है कि बिना चटक-मटक के उसका मन ही नहीं भरता। खुद की तो बात छोड़िए, बच्चों को भी चाहिए दूध तो उसके भी पहले लोग देते हैं चाकलेट और टॉफी। मट्ठा, नींबू की शिकंजी या गन्ने का रस दकियानूसी प्रतीक बन गए हैं। अब आदमी की पसंद हैं तो पेप्सी और कोकाकोला जैसे धीमे जहर। कितनी ही लुभावनी और हरी-भरी क्यों न हो, अपनी सेहत के लिए नुकसानदेह घास को जानवर भी सूंघ कर छोड़ देता है, जबकि जानवर के पास कोई विवेक भी नहीं है। और आदमी, जो अपने विवेकवान होने का दंभ भरता है, उसकी हालत यह है कि वह विज्ञापनी मायाजाल में ऐसा फंस गया है कि लुभावने रैपर देखकर सामान की गुणवत्ता तय करने लगा है। अनाप-शनाप खाद्य पदार्थ और तरह-तरह की नशीली चीजें हलक के नीचे उतारना जिनकी कि शरीर को रत्ती भर भी जरूरत नहीं है, स्वस्थ दिमाग की पहचान नहीं हो सकता। इस विवेकवान आदमी की समझ में इतना भी नहीं आता कि आदमी का फेफड़ा कोई सिगरेट का धुआं भरने के लिए नहीं बनाया गया है।

आहार सुधार की दृष्टि से अपने आहार में तली-भुनी चीजों की मात्रा सीमित करें और रेशेदार कच्ची चीजों को वरीयता दें, जैसे-सलाद वगैरह। भूख से थोड़ा कम खाएं। जैसे -तैसे हलक के नीचे ठूंसने की बजाय शांत मन से चबा-चबा कर खाएं। दो भोजनों के बीच छह-सात घंटे का अंतर रखें। शाम का भोजन जहां तक हो सके सूर्यास्त तक कर सकें तो बेहतर है। सोने से दो-तीन घंटे पूर्व भोजन समाप्त तो कर ही लेना चाहिए। सबेरे उठने के बाद नित्यकर्म से निबटकर डेढ़-दो मील तेज कदमों से पैदल टहलने की आदत सेहत के लिए रामबाण है। आज के युग में हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा ईजाद व्यायाम पद्धतियां, योगासन आदि और प्रासंगिक हो चले हैं। किसी अच्छे विशेषज्ञ से अपने अनुकूल योगासन, व्यायाम और प्राणायाम का चयन करके कम से कम आधे घंटे का समय इनके लिए देना हर हाल में हितकारी होगा। अक्सर सभी नगरों में योगकेंद्र मिल ही जाएंगे। वहां जाकर सलाह ले सकते हैं।
प्राचीन भारत की दबाव चिकित्सा पद्धति (एक्यूप्रेशर) के अनुसार दाएं हाथ की कोहनी और कलाई के बीच एक इंच की गोलाई में स्थित बिंदु पर प्रतिदिन केवल दो मिनट का क्रमश: दबाव देने पर जीवनीशक्ति का अपव्यय रुकता है। बुढ़ापे के कारण होने वाले रोगों और यौवन को सदाबहार रखने के लिए यह अच्छा उपचार है। चालीस वर्ष की आयु के बाद तो यह खास लाभदायक है। लंबे समय तक युवावस्था बनाए रखने में कुछ आयुर्वेदिक उपचार काफी लाभप्रद हैं। भोजन के बाद या सुविधानुसार कभी-भी दो-तीन छोटी काली हरड़ के टुकड़े चूसते रहने से पेट की तकलीफों से निजात मिली रहती है। हरड़ रसायन का काम करती है और यौवन को कायम रखती है। तीन ग्राम त्रिफला (आंवला, हरड़, बहेड़ा समभाग, चूर्ण में छह ग्राम शहद और एक ग्राम तिल का तेल मिलाकर नियमित खाली पेट सुबह-शाम चाटने से तो शरीर में नई शक्ति का संचार होता है। आंवले का अपने आहार में जैसे भी सुविधा हो, नियमित प्रयोग करें, आपको कभी थकान की समस्या नहीं रहेगी।

इसके अलावा यौवन कायम रखने के लिए एक बढ़िया प्रयोग और है। इस प्रयोग के अनुसार सूखा आंवला चूर्ण, भृंगराज चूर्ण, गोखरू चूर्ण और काले तिल का चूर्ण-ये सभी चीजें सौ-सौ ग्राम लेकर मिला लें। अब इसमें चार सौ ग्राम पिसी मिसरी सौ ग्राम गोघृत और दो सौ ग्राम शहद मिलाकर कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में रख लें। इसमें से एक-एक चम्मच सबेरे-शाम खाली पेट निरंतर तीन माह तक सेवन करने से दांत स्वस्थ रहेंगे और बाल काले बने रहेंगे। शरीर में शक्ति संचार होगा और चेहरा दमकदार बनेगा। कोई भी प्रयोग करने से पहले वैद्य की सलाह ले लें तो बेहतर है। इन सबके साथ नियमित तेल मालिश भी जरूरी है। तेल मालिश से पूर्व पूरे शरीर की त्वचा को खूब अच्छी तरह रगड़ना चाहिए। त्वचा की रगड़ के लिए कपड़ा धोने वाले मुलायम ब्रश का भी प्रयोग कर सकते हैं। तेल मालिश एक-दो दिन के अंतराल पर भी कर सकते हैं। ये उपाय नस-नाड़ियों का निक्षेप निकाल फेंकने का काम करेंगे और अंगों की लचक बनाए रखेंगे। मन में स्फूर्ति होगी और सदाबहार यौवन का अहसास आपके पोर-पोर में भर उठेगा। -इंद्रेशा समीर

 

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