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लापरवाही का लालन-पालन

बहुत-से माता-पिता लाड़-प्यार जताने के लिए उनमें बाजार में उपलब्ध तुरंता आहार यानी जंक फूड की आदत डाल देते हैं। इसके चलते बहुत कम उम्र में बच्चों में ऐसी बीमारियां पैदा होने लगी हैं, जो आमतौर पर पहले बड़ी उम्र में होती थीं।
Author November 5, 2017 01:46 am
बचपन में ही खानपान की सही आदत पड़ जाए तो मनुष्य को ताउम्र कई बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ता।

बचपन में ही खानपान की सही आदत पड़ जाए तो मनुष्य को ताउम्र कई बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ता। मगर आज शहरी जीवन में इसका उलट हो रहा है। माता-पिता अपने कामकाजी भागदौड़ की वजह से बच्चों के खानपान पर उचित ध्यान नहीं दे पाते। अक्सर बाजार में उपलब्ध डिब्बाबंद भोजन से उनकी क्षुधापूर्ति करने का प्रयास किया जाता है। बहुत-से माता-पिता लाड़-प्यार जताने के लिए उनमें बाजार में उपलब्ध तुरंता आहार यानी जंक फूड की आदत डाल देते हैं। इसके चलते बहुत कम उम्र में बच्चों में ऐसी बीमारियां पैदा होने लगी हैं, जो आमतौर पर पहले बड़ी उम्र में होती थीं। बच्चों के खानपान पर ध्यान न दिए जाने की वजह से होने वाली बीमारियों और उन्हें लेकर जागरूकता की जरूरत रेखांकित कर रही हैं क्षमा शर्मा।

हाल ही में निकट परिवार की एक बच्ची का जन्मदिन था। यह बच्ची आस्ट्रेलिया में रहती है। इस बच्ची ने स्कूल जाना शुरू ही किया है। इसके माता-पिता ने एक बड़ा केक बनवाया और बच्ची के दोस्तों के साथ उसका जन्मदिन मनाने स्कूल पहुंचे। लेकिन स्कूल वालों ने मना किया कि स्कूल में वे केक लेकर नहीं आ सकते। क्योंकि वे बच्चों को इस तरह चीनी और मीठा खाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। न केवल आस्ट्रेलिया, बल्कि बहुत से पश्चिमी देश बच्चों के जंक फूड खाने और तय मात्रा से अधिक चीनी खाने पर ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है कि चीनी और चिकनाई की अधिक मात्रा खाने से बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ता है। आमतौर पर बच्चों को प्राकृतिक भोज्य पदार्थ जैसे कि फल, फलों के रस, अनाज आदि खाने को प्रेरित किया जाता है।

हमारे यहां आजकल जन्मदिन का मतलब ही केक, पेस्ट्री, चिप्स, बर्गर, पिज्जा, मोमो, चॉकलेट, मिठाई, तले पकवान, नमकीन और इसी तरह की तमाम चीजों को बना दिया गया है। यही नहीं, बाजार में मिलने वाले तमाम डिब्बाबंद खाने के लिए तमाम तरह के आकर्षक विज्ञापन दिए जाते हैं। एक तरह से बच्चों को उन्हें खाने के लिए उकसाया जाता है। जितने भी हाई कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ हैं उनको अच्छे और स्वादिष्ट खानों की तरह पेश किया जाता है। उन्हें बच्चों के मानसिक विकास, शारीरिक विकास और उनकी सफलता से जोड़ा जाता है। कई रिपोर्टों में बताया गया है कि बच्चे आठ-आठ हजार कैलोरी तक खा जाते हैं। इस तरह के खानों में पौष्टिकता या बच्चों के स्वास्थ्य का कोई खयाल नहीं रखा जाता।

माताएं अगर बाहर काम करती हैं तो उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे सवेरे बच्चे के लिए कुछ बना सकें। इसलिए अक्सर बच्चे घर से पैसे ले जाते हैं और स्कूल की कैंटीन या किसी दुकान से कुछ खरीद कर खा लेते हैं। कई बार घर से ही लंच बॉक्स में ब्रेड, बिस्कुट देकर काम चला लिया जाता है। हरी सब्जियां, दूध, दही, फल, साबुत अनाज, अंकुरित दालों और अनाज, मोटे अनाज, गुड़, सत्तू आदि का भोजन में क्या महत्त्व है, यह कोई नहीं बताता। हां, जब ये मोटे अनाज विदेश से आकर्षक पैकेट में बंद होकर बाजार में आ जाते हैं तो सब उन्हें हाथों हाथ ले लेते हैं। अपने यहां एक जमाने में बेहद पौष्टिक मोटे अनाज गरीबों का खाना माने जाते थे। आज ये गरीबों की थाली से गायब होकर अमीरों की रसोई और भोजन का हिस्सा बन चुके हैं। एक बार मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने कहा था कि उनके बेटे ने आज तक चॉकलेट का स्वाद नहीं चखा है। वह उसे अदरक और गुड़ खिलाती हैं। उनका कहना है कि उनके बच्चे के लिए पारंपरिक खाना ही अच्छा, महत्त्वपूर्ण और स्वास्थ्यकर है। लेकिन ये ही सेलिब्रिटी आम बच्चे के लिए न जाने कितने तरह के अस्वास्थ्यकर खाने के उत्पादों का प्रचार करते हैं और मोटी फीस वसूलते हैं।
सालों पहले ब्रिटेन में सरकार ने डिब्बाबंद खाना बनाने वाली कंपनियों को चेतावनी दी थी कि वे अपने उत्पादों को इस तरह से न बेचें कि बच्चे बस उन्हें ही खाना चाहें। जिस समय बच्चे अधिक टीवी देखते हैं, उस समय उनके विज्ञापन न दिखाएं। अगर वे इस तरह की मार्केटिंग से बाज नहीं आएंगे तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा, क्योंकि उनके मुनाफे के लिए बच्चों के स्वास्थ्य से नहीं खेला जा सकता।

हाल ही में दिल्ली के डायबिटीज रिसर्च सेंटर ने एक अध्ययन में पाया कि कक्षा पांच तक आते-आते छियासठ प्रतिशत बच्चे फास्ट फूड या जंक फूड पसंद करते हैं। यह पसंद तीसरी कक्षा से ही शुरू हो जाती है। लगभग चौवालीस प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जो प्रतिदिन एक शीतल पेय पीते हैं। सात से दस साल के बच्चे उन्हीं चीजों को खाना पसंद करते हैं जो बाजार में मिलती हैं। ये बर्गर, पिज्जा और तले हुए आलू से बने नमकीन पसंद करते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, इस तरह के खाने की पसंद भी बढ़ती जाती है।
पिछले दिनों दिल्ली में कई स्कूलों में बिकने वाले इस तरह के खाद्य पदार्थों पर रोक लगाई गई थी। मगर सिर्फ स्कूल में रोक लगाने से कुछ नहीं होता। बच्चे बाजार से इन्हीं चीजों को खरीदने की जिद करते हैं। वे घर में पकने वाली दाल, रोटी, सब्जी नहीं खाना चाहते। इसके अलावा इस तरह के खाद्य पदार्थ तो अब छोटे शहरों और गांवों तक भी जा पहुंचे हैं। गांव के घर-घर में शीतल पेय पीने का चलन चल पड़ा है। शर्बत, छाछ या सत्तू पीना जैसे गुजरे जमाने की बातें हो गई हैं।
छोटे बच्चों में न केवल टाइप वन बल्कि टाइप टू डायबिटीज बढ़ रही है। जबकि टाइप टू डायबिटीज बड़ों की बीमारी है। वह यह भी चाहते हैं कि बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में ऐसे पाठ हों, जो उन्हें इस गंभीर रोगों के प्रति जागरूक कर सकें। परिवार को जागरूक करने के लिए मीडिया को अभियान चलाना चाहिए। बच्चों के खान-पान के लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा, इस पर समाज में जागरूकता फैलाने की जरूरत है। डायबिटीज के बारे में तो कक्षा तीन की पुस्तकों में ही बताया जाना चाहिए, क्योंकि इसी उम्र से बच्चे जंक फूड की तरफ आकर्षित होते हैं।

इन मसलों को देखते हुए दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने इस तरह की पहल की है। अब यहां के स्कूलों में विज्ञान की किताबों में डायबिटीज को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए एक पाठ होगा। इसे कामिक स्ट्रिप सुनीता की कहानी के रूप में पेश किया जाएगा। यह एक स्वागतयोग्य कदम है। न केवल दिल्ली के स्कूलों में, बल्कि पूरे देश में इस तरह की जागरूकता फैलाना जरूरी है, ताकि बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाया जा सके। १

 

 

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