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विमर्श- परंपरा लोककथा की

मानव समाज में प्रचलित लोककथाओं की परंपरा हमें आदिम युग के तहखानों तक ले जाती है।

Author April 30, 2017 5:42 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

 

हरि राम मीणा

भारतीय वांग्मय की दीर्घ परंपरा में बुद्धिजीवियों द्वारा शास्त्रीय गूढ़ता को प्राथमिकता दी जाती रही है। ह्यशास्त्रार्थ के पांडित्यवाद को विशिष्ट स्थान दिए जाते रहने के कारण ज्ञान के वृत्तीय विस्तार में शास्त्रीय जटिलता, व्याकरण के कठोर अनुशासन, भाषिक जार्गन, बौद्धिक ह्यआतंकह्ण से लेकर सब कुछ को जानने के दावों और अहंकार के ब्लैकहोल पैदा होते रहने के संकट सामने आते रहे हैं। इस दशा का दुष्परिणाम यह हुआ कि ज्ञान के संसार में भी एक विशिष्ट प्रकार का भद्र वर्ग अपना वर्चस्व स्थापित करता रहा, जो लोक के असल रूप की अभिव्यक्ति और विश्लेषण में एक तरह से कई किस्म की बाधाएं खड़ी करता गया। मोटे तौर पर शास्त्र पक्ष से जुड़े सीमित समाज और उसकी एकरूप विषयवस्तु के चलते भी उस पर बहुत काम किया गया है, जबकि लोक-समाज की बहुलता और विषय-वैविध्य के बाद भी तुलनात्मक दृष्टि से खोज-परख का काम संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यह स्थिति साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा की बनिस्पत लिपिबद्ध साहित्य में सहजता और स्पष्टता से देखी जा सकती है। इस उत्तर आधुनिक हाई-टेक दौर में तो हम देख ही रहे हैं कि लोक की बहुआयामी समृद्ध परंपरा को किस कदर उपेक्षित किया जा रहा है।

लोक जीवन में कथा, कहानी, गल्प या गाथाओं का मनोरंजन और लोक जीवन के यथार्थ की दृष्टि से बहुत महत्त्व रहा है, जिससे दुनिया का कोई भी अंचल अपरिचित नहीं होगा। लोक साहित्य की इस विधा के सृजन की गत्यात्मकता और कहन के शिल्प की जड़ों को हम मनुष्य की गायन जैसी दूसरी आदिम प्रवृत्ति के रूप में समझ सकते हैं। लोक में प्रचलित जितना भी कलात्मक सृजन हमारे सामने आता है उसे बारीकी से देखने से लोक जीवन के यथार्थ से किसी न किसी हद तक परिचित होने लगते हैं। निश्चित रूप से इन गाथाओं के माध्यम से लोक जीवन को समझने में सहायता मिलती है, बस जहां-जहां अतिशयोक्ति का पुट होता है, वहां हमें अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता पड़ती है। इन गाथाओं में चाहे ऐतिहासिक तथ्यों को अतिरंजित करके पौराणिकता में ढालने की सायास प्रवृत्ति आभासित हो, फिर भी लोक-समाज की सच्चाई तो सामने आती ही रही है।
लोककथा-वाचक समाज के हर वर्ग से पैदा होते रहे हैं। यहां किसी वर्ण, कुल, वंश, वर्ग, जाति का फर्क मालूम नहीं होता। जाहिर है, समाज के प्रत्येक घटक को मिला कर ही व्यापक लोक की सर्जना हुई है, जो हमें एक भावभरी लोक-राष्ट्रीयता का बोध कराती है। हाथरस के गेंदा-लछमन, खिच्चो ह्यचूनेवालेह्ण या ह्यआटेवालेह्ण (अनाज पीसने वाले) और दीपचंद बुकसेलर, सोनई प्रसाद ह्यवल्लभह्ण, गोंडा वाले बुकसेलर अवध बिहारीलाल, कुरुक्षेत्र के योगीश्वर बालकराम, मुंशी मटोलसिंह, गजाधर सिंह वर्मा, बद्रीप्रसाद, मेरठ के एमसी मटरूलाल, कानपुर के कवि मन्नीलाल मिश्र, नौटंकीकार बाबूराम, गोविंदराम (दर्जी), उनके शिष्य अतरसिंह (तेली), तुर्रा-कलंगी के माच खेल वाले नानालाल खिलाड़ी और ह्यचंद्रयानह्ण के रचयिता मध्यकालीन सूफी कवि दाऊद तक से होता है।

मानव समाज में प्रचलित लोककथाओं की परंपरा हमें आदिम युग के तहखानों तक ले जाती है। मिथक, इतिहास और समकालीन विभिन्न मुद्दों को अपने कलेवर में समेटती इन लोककथाओं में जीवन के अनेक रसों की अनुभूति की जा सकती है। इस परंपरा की शैली ह्यकहन-सुननह्ण की पद्धति पर आधारित होती है, इसलिए यह मौखिक-वाचिक परंपरा का साहित्य है। लोककथा का एक रूप हमें दादी-नानी की कहानियों और शिशु-लोरियों में मिलता है, जिसकी किरदार मुख्यत: महिलाएं होती हैं। इस रूप में हमें श्रोता समूह सीमित दिखाई देता है, जो प्राय: बच्चों से ताल्लुक रखता है। इसका महत्त्व शिशुओं को सुलाने, बालक और किशोरों के मनोरंजन तथा उनके व्यक्तित्व निर्माण की दृष्टि से निस्संदेह उपयोगी होता है, फिर भी लोककथा की समृद्ध परंपरा को देखते हुए इस रूप का दायरा सीमित ही कहा जाएगा। मौखिक साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा की दृष्टि से लोककथा की परंपरा हमें और आगे ले जाती है, जब वह छोटे-बड़े लोक समूहों के बीच परंपरागत अनुभवी कथावाचकों द्वारा सुनाई जाती है।

लोककथा कोई एकांतिक क्रियाकलाप नहीं है। जैसे ही लोककथा का प्रसंग आता है, हमारी आंखों के सामने एक दृश्य उभरने लगता है, जिसमें कथावाचक प्रमुख पात्र के रूप में सामने आता है। इसके अलावा सामान्यत: वह एक सार्वजनिक स्थल पर श्रोताओं के समूह के मध्य प्रस्तुत होता है। कथा वाचन की प्रक्रिया में एक अनूठी सहजता और गत्यात्मकता की झलक मिलती है। यहीं पर लोककथा साहित्य के लिपिबद्ध कथा रूप से भिन्न हो जाती है। लिपिबद्ध कथा में लेखक की अहम भूमिका होती है। उसके निजी भाषिक संस्कार, विराम चिह्न, संवाद संकेत, टिप्पणियां, विचार, पूर्वाग्रह, उद्देश्य आदि हावी होने की पूर्ण संभावना रहती है। इसीलिए यहां कृत्रिमता का समावेश होता है। लेखक को ह्यलिखनेह्ण के प्रारूप और अनुशासन का ध्यान रखना पड़ता है। कथा-वस्तु भी प्राय: लेखक की पसंदीदा होती है। कुल मिला कर सृजन के विचार से लेकर अंतिम प्रारूप तक की प्रक्रिया में लेखक केंद्र में रहता है। इससे पृथक मौखिक परंपरा में चली आ रही लोककथा में विषय परंपरागत होता है, जो किसी लोक मिथक, ऐतिहासिक घटना और काल्पनिक कथा-वस्तु के रूप में ह्यचलाह्ण आ रहा होता है। कथा-वस्तु को नवीन, रोचक और अद्यतन बनाने के लिहाज से कथावाचक के स्तर पर संभव है कुछ संशोधन कर दिया जाएं, मगर मूल स्वरूप यथावत रहता है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि लोककथा परंपरा में कथाकार सामान्यत: अनाम-गुमनाम होता है। सृजनकर्म सामूहिक होता है। कब किसने क्या घटाया-बढ़ाया इसकी पहचान करना मुश्किल होता है।

लोककथा की प्रस्तुति के दौरान मूल कथा के अलावा जो अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं उनमें कथावाचक के हावभाव, संकेत, अभिनय, उच्चारण, काव्यात्मकता और मध्यांतारों में कथेतर लघु प्रसंगों का समावेश होता है, जो मूल कथा की दृष्टि से ह्यअप्रासांगिकह्ण कतई नहीं होते। यह सब कुछ कथा-वाचन की रोचकता को ध्यान में रख कर किया जाता है। यही नहीं, गायन-वादन का पुट भी दिया जाता रहा है। छत्तीसगढ़ी पंडवानी कथा प्रस्तुति का एक उदाहरण है, जहां कथा-वाचन में नाट्य-प्रस्तुति की झलक मिलती है।  लोककथा के संदर्भ में यह भी गौरतलब है कि इस विधा से अनुभवी कथाकार जुड़े होते हैं। कभी-कभी तो ये एक समुदाय या श्रेणी के रूप में समाज में दिखाई देते हैं, जो वंशानुगत भी हो सकते हैं या कहें कि कथा की दीर्घ वाचिक परंपरा की कालयात्रा में ये कथावाचक ह्यविकसित-निर्मित होते चले जाते हैं। इनका पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं। इनमें से कई को सामाजिक घटकों के रूप में चिह्नित किया जा सकता है, जैसे ढाढ़ी, भाट, राव, चारण, जोगी आदि।

लोककथाओं का लिपिबद्ध रूप जातक कथाएं, जैन आगम ग्रंथ, कथा सरित्सागर, पंचतंत्र आदि के रूप में उपलब्ध है। उल्लेखनीय है कि लोककथा के मौखिक स्वरूप को लिपिबद्ध करते ही उसका लचीलापन समाप्त हो जाता है, पर यह अभिलेखीकरण के उद्देश्य से अनिवार्य भी है, अन्यथा समय के साथ इस धरोहर के विलुप्तीकरण का संकट हमारे समक्ष आ उपस्थित होगा। जिस रफ्तार से प्रिंट के साथ सूचना क्रांति के इस दौर में डिजिटल तकनीक का वर्चस्व सर्वत्र दिखाई दे रहा है उस हिसाब से यह संकलन बहुत मूल्यवान हो जाता है।
लोककथा परंपरा केवल मनोरंजन की विधा नहीं है, इससे कथा संदर्भित काल खंड के जीवन से परिचित होने का अवसर मिलता है। तत्कालीन जीवन धाराओं की संरचना, क्रियाकलापों, नैतिक मूल्यों, मनोविज्ञान, व्यवहार, संबंधों, स्मृतियों, स्वप्नों, सामाजिक तानेबाने के दर्शन होते हैं। लोककथाओं के प्रेरणादायक अवदान को रेखांकित करना आवश्यक है। कथा-गायन, बातपोशी या किस्सागोई के रूप में लोककथाओं की प्रस्तुति को विषय-वस्तु के साथ हुनर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। ०

 

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